नई दिल्ली. कल हिन्दी दिवस है. दिनभर हिन्दी बोलने, पढ़ने, सुनने, बांचने, गाने के राग गाए जाएंगे. कुछ ही दिनों बाद फिर यह हमारे बातचीत की भाषा की स्थिति में आ जाएगी. हम हिन्दी में बोल लेंगे, बच्चों को हिन्दी सीखने की सीख दे देंगे और चंद किताबें पढ़ लेंगे…बस हो गया. ऐसा नहीं है कि हिन्दी को लेकर ऐसी स्थिति कुछ दिनों में बनी है, बल्कि पिछले कई वर्षों तक अंग्रेजी को महिमामंडित करने और हिन्दी को कमतर-दर-कमतर साबित करने के ‘अथक’ प्रयासों के बाद ही यह स्थिति आई है. इसलिए हिन्दी साहित्य के प्रख्यात विद्वान और आलोचक डॉ. नामवर सिंह (Dr. Namwar Singh) ने अपने एक लेख में हिन्दी को लेकर अनोखा व्यंग्य किया था. वर्ष 2002 में हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी अखबार राष्ट्रीय सहारा के परिशिष्ट ‘हस्तक्षेप’ में लिखे एक आलेख में डॉ. सिंह ने कहा था कि हिन्दी की स्थिति देखकर लगता है कि इसकी स्थिति ‘राष्ट्रपति’ जैसी है और अंग्रेजी को ‘प्रधानमंत्री’ की हैसियत प्राप्त है. आज हिन्दी दिवस के अवसर पर पढ़िए डॉ. नामवर सिंह के इसी आलेख के प्रमुख अंश. Also Read - हिंदी दिवस 2018: मिलिए उनसे, जो कहलाते हैं शब्दों के सच्चे दोस्त, तय कर रहे रोमांचक 'शब्दों का सफ़र'

हिन्दी को त्रिशंकु बना दिया
आज हिन्दी की स्थिति त्रिशंकु की है. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उसे राष्ट्रभाषा बनाने की मांग हुई और स्वाधीन भारत की वह राजभाषा बना दी गई. जैसे त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग जाने के लिए कहा गया था, लेकिन उसे अचानक बीच में इस तरह रोक दिया गया कि न वह स्वर्ग जा सका और न धरती पर वापस आ सकता था, वैसे ही हिन्दी को बना दिया गया है. वह न तो राजभाषा का दर्जा पाकर स्वर्ग जा सकती है और न ही गिरकर धरती पर आ सकती है. कभी-कभी तो लगता है कि भाषा के क्षेत्र में हिन्दी की स्थिति भारत के ‘राष्ट्रपति’ जैसी है और अंग्रेजी को ‘प्रधानमंत्री’ की हैसियत प्राप्त है. हिन्दी एक सम्मानजनक पद पर तो है, पर व्यवहार में दूसरे दर्जे पर है और सारे अधिकार ‘अंग्रेजी’ के पास हैं. यह एक ऐसी हकीकत है जिसे बदलने का कोई तरीका फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रहा है. ऐसे में हमारा समूचा देश दि्वभाषी होने के लिए अभिशप्त है. Also Read - हिंदी दिवस 2018: उपराष्ट्रपति बोले- क्षेत्रीय भाषा के साथ हिन्दी में मिले प्राथमिक शिक्षा

त्रिभाषा फॉर्मूला आज भी प्रासंगिक
कोई भाषा किसी दूसरी भाषा का विकल्प नहीं हो सकती और मातृभाषा का तो कोई विकल्प हो ही नहीं सकता. यह माना गया है कि मां के दूध के साथ परिवार में जो भाषा सीखी जाती है, उसकी जगह कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती. जो भी कोई दूसरी भाषा सीखेगा, वह ‘अतिरिक्त’ होगी, ‘विकल्प’ नहीं. मैं तो कहता हूं कि जो अपनी बोली भूल जाता है वह कभी अच्छी हिन्दी न तो बोल पाता है और न लिख पाता है. इसलिए आज अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों को बोलियां सिखाने की जरूरत है, ताकि वे अच्छी हिन्दी सीख सकें. इस लिहाज से ‘त्रिभाषा’ फॉर्मूला आज भी प्रासंगिक है, हर व्यक्ति को अपनी मातृभाषा के अलावा हिन्दी और अंग्रेजी का ज्ञान होना चाहिए. Also Read - हिंदी दिवस 2018: 1949 में आज ही के दिन मिला था हिंदी को राजभाषा का दर्जा

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‘नकली हिन्दी’ से मिले मुक्ति
हिन्दी का नाम लेते ही उसके दो रूप सामने आते हैं. एक, राजभाषा हिन्दी और दूसरी, वह हिन्दी जो बोलचाल या हमारे लोकप्रिय साहित्य में दिखती है. अधिकांश विरोध राजभाषा को लेकर किया जाता है. मजाक उड़ाते हुए उसे ‘नकली हिन्दी’ की संज्ञा दी जाती है. चूंकि यह भाषा सरकार ने बनाई है और सरकारी सत्ता-प्रतिष्ठान पर अंग्रेजी वालों का दबदबा है, इसलिए राजभाषा के नाम पर जो भी लिखा जाता है, वह अंग्रेजी का अनुवाद होता है. ‘अनुवाद’ हमेशा ‘मूल’ की छाया ही होता है और इसलिए वह हमेशा नकली ही रहेगा. मुझे तो लगता है कि सत्ता-प्रतिष्ठान पर काबिज अंग्रेजीदां अफसरों ने ही राजभाषा को नकली बना दिया. सरकार को चाहिए कि वह राजभाषा को अंग्रेजी के अनुवाद से मुक्ति दिलाए.

व्यावसायिक हितों के टकराव से नुकसान
हिन्दी के विरुद्ध दुष्प्रचार सबसे ज्यादा उन माध्यमों ने किया, जिन पर अंग्रेजी का वर्चस्व है. हिन्दी विरोध से इनका व्यावसायिक हित जुड़ा है. यह अनायास नहीं है कि आज विश्व के जिन देशों में सबसे ज्यादा अंग्रेजी के लेखक पैदा हुए हैं, उनमें भारत सबसे ऊपर है. सिर्फ साहित्य ही नहीं बल्कि समाज, राजनीति, अर्थ और ज्ञान-विज्ञान के अन्य विषयों पर दुनिया के सारे बड़ेप्रकाशक भारतीय लेखकों की अंग्रेजी पुस्तकें छाप रहे हैं और भारत को इसका एक बड़ा बाजार बनाने के अभियान में जुटे हैं. 1947 के पहले भारत में अंग्रेजी में लिखने वालों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती थी, लेकिन आज यह संख्या सैकड़ों पार कर चुकी है. मुल्कराज आनंद, राजाराव, आर.के. नारायण के बाद नाम तलाशना पड़ता था, लेकिन आज दर्जनों नाम ऐसे हैं जो अंग्रेजी के बड़े-बड़े पुरस्कार पा रहे हैं. पहले अंग्रेजी लिखने वाले भारतीय लेखकों के ज्यादातर प्रकाशक भारत के ही होते थे, लेकिन अब विदेशी प्रकाशकों की पैठ बढ़ गई है. चूंकि हिन्दी की लोकप्रियता को घटाए बगैर भारत में अंग्रेजी का बाजार नहीं बढ़ेगा, इसलिए देश का अंग्रेजीदां तबका हिन्दी का विरोध कर रहा है.

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ग्लोबलाइजेशन का तर्क
एक यह भी तर्क दिया जा रहा है कि ग्लोबलाइजेशन के युग में अब राष्ट्र-राज्य की अवधारणाएं लगभग खत्म हो गई हैं. भारत भी अब एक राष्ट्र नहीं रहा. वह कई क्षेत्रीय अस्मिताओं का पुंज है. चूंकि एक राष्ट्र की बात ही खत्म हो रही है और उसके टुकड़े ज्यादा महत्वपूर्ण हो रहे हैं, तो फिर एक भाषा की जरूरत क्यों? हिन्दी को क्यों राष्ट्रभाषा माना जाए? जरूरत एक संपर्क भाषा की है जो अंग्रेजी ही हो सकती है. चूंकि यह अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाषा भी है, इसलिए इसे भारत की संपर्क भाषा बनाने से फायदा ही होगा. राष्ट्र-राज्य को समाप्त मानने वाली यह धारणा दुर्भाग्य से उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष अंग्रेजीदां बौद्धिकों की है जिन्होंने दो दशक पहले ‘सबॉल्टर्न स्टडीज’ के नाम से इतिहास लेखन के क्षेत्र में एक नए ‘स्कूल’ की स्थापना की थी. ये लोग अंग्रेजी में सोचते हैं और अंग्रेजी का ही खाते हैं. पश्चिम की नकल करते हैं और अपने समाज से कटकर वहीं के समाज में अपनी जड़ें तलाशते हैं. इस तबके ने जो नया दर्शन गढ़ा है उसे मैं ‘खंड-खंड पाखंड’ कहता हूं. यह दर्शन न सिर्फ अंग्रेजी के वर्चस्व और पश्चिमी विचारधारा की रक्षा करता है बल्कि परोक्ष रूप से नवउपनिवेशवाद का हिमायती भी है. इसलिए हिन्दी का प्रश्न सिर्फ अपनी भाषा के प्रति मोह का नहीं है बल्कि एक नए किस्म के उपनिवेशवादी सोच के विरुद्ध लड़ने से भी है.