नई दिल्ली. हिन्दी दिवस को लेकर हर साल तरह-तरह के वादे किए जाते हैं, घोषणाएं की जाती है, आश्वासन दिए जाते हैं. लेकिन दिवस या सप्ताह के बीतते ही सब कुछ अगले साल होने वाले हिन्दी दिवस के लिए समेट कर रख दिया जाता है. ऐसी स्थिति से हम हिन्दी बोलने वालों को जितना कष्ट पहुंचता है, उससे कहीं ज्यादा दर्द हिन्दी साहित्य से जुड़े साहित्यकारों को होता है. इसलिए हिन्दी दिवस के मौके पर ही सही ये साहित्यकार समाज और सरकार को राष्ट्रभाषा के प्रति आगाह करते रहे हैं. आज हिन्दी दिवस के मौके पर आइए पढ़ते हैं हिन्दी साहित्य के चुनिंदा साहित्यकारों की हिन्दी के बारे में राय. ये बातें  भले वर्षों पहले कही गई हों, लेकिन हिन्दी की स्थिति को देखते हुए आज भी समीचीन हैं. Also Read - यादों में कृष्णा सोबतीः 'काल तो उनका शरीर ले गया, वह हमेशा समकालीन ही रहेंगी'

राजेन्द्र यादव – सत्ता का संरक्षण मिले Also Read - हिंदी दिवस 2018: मिलिए उनसे, जो कहलाते हैं शब्दों के सच्चे दोस्त, तय कर रहे रोमांचक 'शब्दों का सफ़र'

Rajendra-Yadav
समाज में अभिजात्य वर्ग जिस भाषा का प्रयोग करता है, वही सम्मानीय हो जाती है. निश्चित रूप में आज हिन्दी अभिजात्य वर्ग की भाषा नहीं रह गई है. हमारे देश में शुरू से ही अंग्रेजी को सत्ता का संरक्षण प्राप्त रहा है. इससे पूर्व अरबी, फारसी, उर्दू तथा इससे पहले संस्कृत को यह संरक्षण प्राप्त था. यद्यपि हिन्दी हमारी मातृभाषा है, पर दुर्भाग्य से इसे सरकारी संरक्षण प्राप्त नहीं है. ऐसे में हमें मानना पड़ेगा कि हिन्दी हमें जोड़ तो सकती है, लेकिन प्रतिष्ठा या अच्छी नौकरी नहीं दिला सकती. हिन्दी को सम्मान दिलाने की जहां तक बात है, तो यह देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक हैसियत पर निर्भर करता है. हिन्दी को सरकारी स्तर पर प्राथमिकता देनी होगी. विदेशी राज्याध्यक्षों और प्रतिनिधियों की तरह हमारे नेताओं को भी देश और विदेश में हिन्दी बोल कर गौरव हासिल करना चाहिए. Also Read - हिंदी दिवस 2018: उपराष्ट्रपति बोले- क्षेत्रीय भाषा के साथ हिन्दी में मिले प्राथमिक शिक्षा

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ममता कालिया – मठाधीशों ने किया कबाड़ा

Mamta-Kalia
जितने भी महत्वपूर्ण प्रयास हो रहे हैं या जितनी भी समस्याएं हमारे सामने हैं, वे एक दिवस के रूप में सिमट गई हैं- जैसे गांधी जयंती, हिन्दी दिवस, हिन्दी पखवाड़ा आदि. इसे मनाने वाले लोग सोच लेते हैं कि हमने प्रश्नों का हल ढूंढ लिया. हिन्दी के साथ भी कुछ ऐसा ही है. आज ऐसा नहीं है कि हम हिन्दी को छोड़कर कोई और भाषा सीख रहे हैं, बल्कि हम हिन्दी को अन्य भाषाओं के मुकाबले रखने में शर्म महसूस कर रहे हैं. नौकरी की दृष्टि से हिन्दी को लेकर अमूमन 1960 तक सरकारी प्रयास ठीक थे, लेकिन हिन्दी से संबंधित सरकारी पदों पर बैठे लोगों ने मठाधीशों की भूमिका निभानी शुरू कर दी. इन्होंने ही हिन्दी का सबसे ज्याद बेड़ागर्क किया है.

केदारनाथ सिंह – भारतीय भाषा दिवस मनाएं

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मेरा मानना है कि यदि देश, देश की जनता और समाज से जुड़ा कोई सवाल हो तो उसे रस्मी नहीं बनने देना चाहिेए. दूसरी बात यह है कि हिन्दी दिवस के नाम पर थोड़ी बहुत बदअमली भी की जाती है. भारत में हिन्दी से इतर दूसरी भी कई भाषाएं हैं. हमें इस बात के प्रति सर्वथा सतर्क रहना चाहिए कि गैर हिन्दी भाषी तबकों में हिन्दी दिवस का गलत संकेत न जाए. उन्हें ऐसा भान नहीं होना चाहिए कि सारा जोर हिन्दी पर है और उन्हें उपेक्षित किया जा रहा है. मगर दुख की बात यह है कि सरकार इसके प्रति सचेत नहीं है. वह इस बात पर सोचती ही नहीं कि अगर अंग्रेजी का वर्चस्व तोड़ना है तो यह काम हिन्दी अकेले नहीं कर सकती. उसे दूसरी भारतीय भाषाओं का सहयोग लेना ही पड़ेगा. इसीलिए अपने लेखों के मार्फत मैं हमेशा यह सुझाव देता हूं कि 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के बजाय भारतीय भाषा दिवस के रूप में मनाना चाहिए.

कृष्णा सोबती – अभी बहुत कुछ करना होगा

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हिन्दी की मौजूदा स्थिति को लेकर हमें चिंतित होने की जरूरत नहीं है. हिन्दी राष्ट्र की संपर्क भाषा के रूप में स्थापित है. यह अखिल भारतीय नागरिक मुखड़े को विश्वसनीयता से प्रस्तुत करती है. हिन्दी अपनी जीवंत भाषाई ऊर्जा और सामर्थ्य से अन्य भारतीय भाषाओं की अस्मिता और घनत्व भी अपने में समेटने की क्षमता बना रही है. ये कहना कि इसका जमाना लद गया है एक ऐसी मनोवृत्ति को उजागर करता है जो अपनी सीमाओं और कमियों के लिए दूसरों को जिम्मेवार ठहराते हैं. आज मीडिया और फिल्मों ने निस्संदेह हिन्दी को अंग्रेजी के समक्ष खड़ा कर दिया है. परंतु अंग्रेजी की तरह विकसित और विस्तार पाने के लिए हम हिन्दी वालों को अभी बहुत कुछ करना होगा. दरअसल, हिन्दी की व्याधि उसके प्रसार-प्रचार की कमी में नहीं है. कमी उस मानसिकता में है जो अपनी स्थानीय सोच को टटोलने और खंगालने के लिए तैयार नहीं.

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विष्णु प्रभाकर – हिन्दी को लेकर चिंता न करें

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हिन्दी भारत की आत्मा है. देश-विदेश की कोई भी भाषा इस पर अपना प्रभाव नहीं कायम कर सकती. हिन्दी का काफी तेजी से विकास हुआ है. भले ही कुछ और वक्त लगे, लेकिन देश की राजभाषा हिन्दी ही होगी. हिन्दी के भविष्य को लेकर चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. अंग्रेजी कभी हिन्दी का स्थान नहीं ले सकती. अंग्रेजी के जिस प्रभाव को देखकर आज चिंता की जा रही है वह तात्कालिक है. वर्तमान पीढ़ी पर अंग्रेजी का फैशन चढ़ा है जिनकी आबादी भी भारत की आबादी की तुलना में काफी कम है. यह प्रभाव भी बहुत कम समय का है और धीरे-धीरे लोगों का यह भ्रम भी टूटेगा कि हिन्दी के सापेक्ष अंग्रेजी की बहुत अधिक महत्ता है.

(इनपुट साभार: राष्ट्रीय सहारा ‘हस्तक्षेप’, 14 सितंबर 2002)