लखनऊ. हिंदी पर बातें होती हैं. पखवाड़ा, दिवस मनता है. चिंता हो रही है. कोई कहता है कि हिंदी सिमट रही है. किसी ने कहा कि हिंदी ख़त्म हो जाएगी. किसी ने हिंदी को वेंटिलेटर पर बता दिया, लेकिन एक ऐसे शख्स भी हैं, जो कहते हैं कि हिंदी कभी मारी नहीं जा सकती. जिस हिंदी ने अंग्रेजों की अंग्रेज़ी से 200 साल से ज़्यादा समय तक लड़कर खुद को बुलंद रखा, वह हिंदी भला कैसे मर सकती है. यह कहते हुए अजित वडनेरकर ‘शब्दों का सफ़र’ का ज़िक्र करते हैं. एक ऐसा सफ़र जिसकी रूह तो हिंदी है, लेकिन इसमें मराठी, अरबी, फ़ारसी, तिब्बत, उर्दू, ईरानी, पुर्तगाली, जर्मन सहित दुनियाभर के ऐसे शब्द समाए हुए हैं, जिनकी पहचान हिंदी में तो होती है, लेकिन वो शब्द दरअसल हैं कहीं और के. ऐसे ही हिंदी के शब्दों की खोज, व्युत्पत्ति को लेकर ‘शब्दों का सफ़र’ नाम से उनकी तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. चौथा खंड लगभग पूरा हो चुका है, पांचवां खंड 2019 में आएगा. पांचवां खंड आते ही करीब पांच हजार शब्दों की यात्रा पूरी हो जाएगी. लक्ष्य 10 हजार शब्दों के संकलन का है.

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शब्दों के सफ़र में चलने वाले देश के संभवतः पहले शख्स
अजित वडनेरकर संभवतः देश के पहले ऐसे शख्स हैं, जो शब्दों के सफ़र से भाषा को अलग स्तर पर ले जा रहे हैं. मध्य प्रदेश में 1962 में जन्मे अजित वडनेरकर पिछले 31 सालों से पत्रकारिता में हैं. ज़ी न्यूज़ सहित अजित वडनेरकर देश के लीडिंग इलेक्ट्रॉनिक/प्रिंट मीडिया संस्थानों में उच्च पदों पर रहने के बाद वर्तमान में राष्ट्रीय हिंदी अख़बार अमर उजाला के संपादक हैं. राजकमल प्रकाशन से अब तक तीन खंड में प्रकाशित हुई पुस्तक ‘शब्दों का सफ़र’ के बारे में वह बताते हैं कि यह सिर्फ कोई शब्दकोष नहीं है, बल्कि शब्द कहां से उत्पन्न हुए, की एक लंबी गाथा है. हिंदी में इस्तेमाल किए जा रहे इन शब्दों की उत्पत्ति कहां हुई और शब्द हिंदी में कैसे शामिल हो गया, के बारे में रोचक तरीके से बता रहे हैं.

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अजित वडनेरकर.

अजित वडनेरकर.

इस तरह हुई शब्दों से दोस्ती, भाषा के भ्रष्टाचार को पकड़ने की कोशिश
वह बताते हैं कि करीब 31 साल पहले वह जब पत्रकारिता में आए तो देखा कि लोग ग़लत भाषा का इस्तेमाल करते हैं. इसके बाद से ही शब्दों की पत्रकारिता को अपना उद्देश्य बना लिया. वह कहते हैं कि शब्दों का सफ़र एक भावना है, एक कौतूहल है, एक जिज्ञासा है. शब्दों से दोस्ती के बीच भाषा में जो भ्रष्टाचार है, उसे पकड़ने की कोशिश है. वह यकीन के साथ कहते हैं कि भाषा और शब्दों से जिसने दोस्ती कर ली, जिसने भाषा को गहराई से समझ लिया, उसकी नज़र में हिंदू और इस्लाम या मज़हब एक ओर हो जाएगा. भाषा की यात्रा सबसे आगे आ जाएगी क्योंकि धर्मों से पहले शब्द आये. और शब्दों का तो कोई मज़हब नहीं था. भाषा के स्तर पर लड़ने के मुद्दे नहीं होने चाहिए. भाषा में तो इज़ाफ़त होनी चाहिए. भाषा दुनिया को कट्टर होने से बचाती है. राम, कृष्ण हो या पैगंबर, सबने भाषा के जरिये ही चीजों को संभाला.

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हिंदी में समाई कई भाषाओं की खोज भी है मकसद
वह कहते हैं कि लाखों सालों में जैसे इंसान ने धीरे-धीरे अपनी शक्ल बदली, सभ्यता के विकास के बाद से शब्दों ने धीरे-धीरे अपने व्यवहार बदले. एक भाषा का शब्द दूसरी भाषा में गया और अरसे बाद एक तीसरी ही शक्ल में सामने आया. जैसे अलमारी शब्द हिंदी में इस्तेमाल होता है, लेकिन खोजने पर पता चला कि ये तो पुर्तगाली शब्द है. जब इसकी व्युत्पत्ति के बारे में शोध किया तो मालूम हुआ कि ये शब्द तो पुर्तगाली में मैग़ज़ीन या ख़ज़ाना शब्द से जुड़ता है. और हमारे देश में अलग ही तरह से इस्तेमाल होता है. अजित वडनेरकर कहते हैं शब्दों का सफ़र का अचानक आगे नहीं बढ़ रहा. शब्दों को सहेजने और उस पर रिसर्च करने में काफ़ी समय लग जाता है.

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शब्दों के लिए बी. कॉम के बाद किया एमए
पत्रकार के अलावा भाषाविद् के तौर पर पहचान बनाने वाले अजित वडनेरकर बताते हैं कि वह बी. कॉम कर चुके थे, लेकिन फिर भी हिंदी से एमए करने का फैसला किया. एमए में वह क्लास में अकेले छात्र थे. और उन्हें अध्यापकों द्वारा अकेले ही पढ़ाया जाता था. इस प्रेरणा के पीछे परिवार के कई लोगों का हाथ रहा. मां, बहन, नाना, मामा के कारण बचपन से वह पढ़ने-लिखने वाले माहौल में रहे. ख्यात भाषाविद् डॉ. सुरेश वर्मा, कोशकार अरविंद कुमार और प्रसिद्ध साहित्यकार उदयप्रकाश का भी साथ मिला. वह बताते हैं कि दो साल में रिटायरमेंट हो रहा है. इसके बाद वह चाहेंगे कि सरकार के माध्यम से वह उन्हें ‘शब्दों के सफ़र’ को स्कूल-कॉलेज में ले जाने का मौका मिले. वह इस सफ़र को नई पीढ़ी तक ले जाना चाहते हैं.

 

हिंदी जिंदा है और रहेगी, देश को हिंदी ने बांधा है
भाषाशास्त्री के तौर पर कहते हैं कि हिंदी मारी नहीं जा सकती है. ये हमेशा जिंदा रहेगी. मैं नहीं मानता कि हिंदी आगे नहीं बढ़ी. हिंदी का दायरा बढ़ा है. गूगल हिंदी में लिखने और हिंदी में ही खोजने की सुविधा दे रहा है. अंग्रेज़ी या दूसरी भाषा में ऐसा नहीं. साइंस, इंजीनियरिंग हिंदी में समझाई-पढ़ाई जा रही है. गांव के एक किसान को भी गूगल हिंदी में जानने की आजादी देता है. खेती कैसे होगी… कौन सी फसल कैसे होगी… इतना लिखने भर से हिंदी में ही जानकारी मिल रही है. देश को हिंदी ने बांधा है. वह कहते हैं कि हिंदी को किसी दिवस की जरूरत नहीं. हिंदी डूबने के कोई उदाहरण ही नहीं हैं. दरअसल, सरकारें अपना काम नहीं कर पायीं. इसलिए हिंदी दिवस का प्रचार और एलान कर दिया.