हिन्दी दिवस आगामी 14 सितंबर यानी शुक्रवार को मनाया जाएगा. इस अवसर पर हिन्दी भाषा का गुणगान होगा, लोग हिन्दी के महत्व पर भाषण देंगे, साहित्य जगत में हिन्दी की बढ़ती या घटती प्रतिष्ठा को लेकर चर्चाएं होंगी. ऐसे में ‘हिन्दी की शोकसभा’ पढ़ना कहां तक उचित है, कहा नहीं जा सकता. लेकिन हिन्दी की वर्तमान स्थिति को देखते हुए ‘हिन्दी की शोकसभा’ शीर्षक से व्यंग्य लिखने वाले साहित्यकार राजकिशोर की यह रचना, भले अर्सा पहले लिखी गई हो, आज भी प्रासंगिक और सामयिक जान पड़ती है. इसलिए हिन्दी दिवस से पहले आइए पढ़ते हैं ‘हिन्दी की शोकसभा’. Also Read - हिंदी दिवस 2018: मिलिए उनसे, जो कहलाते हैं शब्दों के सच्चे दोस्त, तय कर रहे रोमांचक 'शब्दों का सफ़र'

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साल : 2015 से 2020 के बीच का कोई साल. दिन : 14 सितंबर. स्थान : जवाहरलाल नेहरू सभागार, दिल्ली. समय : सायं 6 बजे. उपस्थिति : 12 पुरुष (उम्र 65 और 75 के बीच) और दो महिलाएं (दिखने में अधेड़, उम्र अननुमेय). विषय : हिन्दी की शोक सभा. वक्ता : एक मंत्री, एक लेखक, एक प्रोफेसर और एक प्रकाशक. अध्यक्ष : वही (कुछ वर्षों से अस्वस्थ रहने के कारण स्ट्रेचर पर लाए गए हैं, पर बोलते समय सीधे खड़े हो जाते हैं. बोल चुकने के बाद फिर स्ट्रेचर पर जाकर लेट जाते हैं). प्रेस दीर्घा : खाली. टीवी कैमरे : नदारद. Also Read - हिंदी दिवस 2018: 1949 में आज ही के दिन मिला था हिंदी को राजभाषा का दर्जा

आज मातृभाषा दिवस पर पढ़िए कुछ खास कविताएं

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प्रोफेसर : आप सबको ज्ञात ही है कि हम यहां किसलिए इकट्ठा हुए हैं. जब मुझे इस कार्यक्रम की सूचना दी गई, तो पहले तो मैं अवाक् रह गया. क्या ऐसा हो सकता है? क्या हिन्दी जैसी जीवंत भाषा कभी मर सकती है? लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मैं देख रहा हूं कि हिन्दी विभाग में एडमिशन नहीं हो रहे हैं. इस साल एमए (हिन्दी) में कुल पांच छात्रों ने प्रवेश लिया है, जबकि रिक्त पदों को छोड़ दिया जाए तो हिन्दी पढ़ाने वालों की संख्या पंद्रह है. एक-एक छात्र को तीन-तीन प्राध्यापक कैसे पढ़ाएंगे? यही स्थिति बनी रही तो प्राध्यापकों में पढ़ाने को लेकर मारपीट भी हो सकती है. क्लास लेने के उद्देश्य से छात्रों का, खासकर छात्राओं का, अपहरण भी हो सकता है. पिछले सात सालों में हिन्दी में एक भी पीएचडी सबमिट नहीं हुई. मैं हिन्दी माता को श्रद्धा के फूल चढ़ाते हुए मांग करता हूं कि सरकार हिन्दी को पुनर्जीवित करने के लिए एक आयोग बैठाए. इसके साथ ही, मैं यह स्पष्ट कर दूं कि इस प्रस्ताव में मेरा कोई निहित स्वार्थ नहीं है. मेरे दोनों बेटे स्टेट्स में सेटल हो चुके हैं. बेटी डेनमार्क में है. लेकिन मैंने हिन्दी का नमक खाया है. इसलिए मैं हिन्दी की अकाल मृत्यु नहीं देख सकता.

तो इसलिए मनाया जाता है हिंदी दिवस

लेखक : मैंने बहुत पहले ही पहचान लिया था कि हिन्दी का कोई भविष्य नहीं है. फिर भी मैं हिन्दी में लिखता रहा, क्योंकि मैं अंग्रेजी में नहीं लिख सकता था. मेरे कई महत्त्वाकांक्षी लेखक मित्रों ने लिखने के लिए उसी तरह अंग्रेजी सीखी, जैसे चंद्रकांता संतति को पढ़ने के लिए हजारों लोगों ने हिन्दी सीखी थी. वे हिन्दी से अंग्रेजी में वैसे ही गए, जैसे प्रेमचंद उर्दू से हिन्दी में आए थे. लेकिन हमारे इन मित्रों को कोई बड़ी सफलता नहीं मिली. कारण, वे जो अंग्रेजी लिखते थे, वह हिन्दी जैसी ही होती थी. फिर बुकर वगैरह मिलने का सवाल ही कहां उठता था? बहरहाल, मुझे हिन्दी में लिखने का कोई अफसोस नहीं है. अफसोस इस बात का है कि मुझे अपने घर से पैसे खर्च कर अपनी किताबें छपवानी पड़ीं. अगर मेरे बड़े भाई पुलिस महानिदेशक न होते तो मैं अपने बल पर इस खर्च का प्रबंध नहीं कर सकता था. रॉयल्टी मिलने का कोई सवाल ही नहीं है. उलटे, प्रकाशक कहता है कि जगह महंगी हो गई है, इसलिए आप या तो अपनी किताबें अपने घर ले जाइए या गोदाम का किराया दीजिए. इसलिए मैं इसे हिन्दी की मृत्यु नहीं, उसकी मुक्ति कहता हूं.

प्रकाशक : हिन्दी की शोक सभा में शामिल होना मुझे कतई अच्छा नहीं लग रहा है. आखिर यह मेरी भी मातृभाषा है. हिन्दी में किताबें छाप कर एक जमाने में मैंने कितना कमाया था. मेरा घर, मेरी गाड़ी, मेरे लड़के-लड़कियों की विदेश में पढ़ाई – यह सब हिन्दी की बदौलत ही संभव हुआ है. इसके लिए मैं अनेक हिन्दी-प्रेमी सरकारी अधिकारियों का ऋणी हूं. लेकिन हिन्दी से मेरा रिश्ता व्यावसायिक है. जब हिन्दी की किताबें बिकती ही नहीं, तो मैं उन्हें क्यों छापूं? इसीलिए मैं समय रहते अंग्रेजी में शिफ्ट कर गया. जो प्रकाशक अभी भी हिन्दी में पड़े हैं, जरा उनकी हालत देखिए. कल गाड़ी में चलते थे, अब स्कूटर के लिए पेट्रोल जुटाना भी मुश्किल हो रहा है. हां, सरकार हिन्दी को पुनर्जीवित करने के लिए कुछ विशेष प्रयास करे और हिन्दी किताबों की थोक खरीद फिर शुरू कर दे, तो मैं वादा करता हूं कि हिन्दी में प्रकाशन फिर शुरू कर दूंगा. आखिर यह मेरी भी मातृभाषा है.

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मंत्री : आज सचमुच बड़े शोक का दिन है. जिस हिन्दी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में निर्णायक भूमिका निभाई थी, वह आज भारत की समृद्धि देखने के लिए जीवित नहीं है. लेकिन मित्रो, मैं निराशावादी नहीं हूं. लोग कहते हैं कि संस्कृत इज ए डेड लैंग्वेज. लेकिन हमने संस्कृत को अभी तक बचा कर रखा है. रेडियो पर अभी भी संस्कृत में समाचार पढ़ा जाता है. इसी तरह हम हिन्दी को भी बचा कर रखेंगे. क्षमा करें, आज कई जगहों पर हिन्दी की शोक सभाएं हैं और उनमें मुझे बोलना है. लेकिन मैं यह आश्वासन देकर जाना चाहता हूं कि मैं संसद के अगले सत्र में हिन्दी को बचाने के लिए एक निजी विधेयक जरूर लाऊंगा.

अध्यक्ष : आज का दिन एक ऐतिहासिक दिन है. दुनियाभर में यह एक विरल घटना है कि एक भाषा को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए सभा का आयोजन किया गया. वह श्रेय न संस्कृत को मिला, न पाली को, न अपभ्रंश को और न किसी यूरोपीय या अन्य एशियाई भाषा को. इस दृष्टि से हिन्दी विशेष रूप से गौरवशाली है. लेकिन मित्रो, यह स्वाभाविक मृत्यु नहीं, शहादत है. दरअसल, हिन्दी शुरू से ही शहादत की भाषा रही है. मुझे महादेवी जी की पंक्तियां याद आती हैं : मैं नीर भरी दुख की बदली, उमड़ी कल थी, मिट आज चली. वैसे भी, किसी खास भाषा से मोह रोमांटिकता है. मैंने हिन्दी आलोचना में शुरू से ही रोमांटिकता का विरोध किया है. हमें यथार्थवादी बनना चाहिए. आज का यथार्थ यही है कि हिन्दी नहीं रही. अतः इस पर शोक मनाना अतीत के शव की पूजा करना है. हिन्दी नहीं रही तो क्या हुआ, उसका साहित्य तो है. हमें इस विपुल साहित्य का पठन-पाठन, चिंतन-मनन करना चाहिए. यही हिन्दी को साहित्य प्रेमियों की सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

साभारः हिन्दीसमय.कॉम