नई दिल्ली : किसी भी देश के विकास में उसकी भाषा का बड़ा योगदान होता है. किसी देश की भाषा आमजन की भाषा होती है जो कि विश्व स्तर पर वहां के लोगों को अलग पहचान देती है. लेकिन हमारे देश की कोई राष्ट्र भाषा नहीं है. इंग्लैंड, चीन, अमेरिका और जर्मनी जैसे विश्व के तमाम देशों ने अपनी भाषा के विकास के लिए उसे राष्ट्र भाषा घोषित किया. लेकिन भारत की अभी तक कोई भी आधिकारिक राष्ट्र भाषा नहीं है. इसके लिए हिन्दी से जुड़े तमाम लोगों ने प्रयास किए, जो कि सफल नहीं हो पाए. बात करते हैं उन मसलों की जिनकी वजह से हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा नहीं मिल पाया…

देश की आजादी के पहले से ही राष्ट्र भाषा को लेकर चर्चा शुरू हो गई. इसमें हिन्दी को प्रबल दावेदार माना जा रहा था. लेकिन भारत के दक्षिणी और कुछ पूर्वी क्षेत्रों हिन्दी नहीं बोली जाती थी और न ही वहां लोग इसे समझते थे. लिहाजा हिंदी की जगह अंग्रेजी को 15 साल तक के लिए भारत की संवैधानिक भाषा घोषित कर दिया गया. हालांकि आजादी के सालों बाद भी अभी तक हिंदी को संवैधानिक भाषा का दर्जा नहीं मिल सका है.

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देश के जानमाने लेखक और शोधकर्ता रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब ‘भारत गांधी के बाद’ में इस पर विस्तार से लिखा है. उन्होंने इसमें बताया कि किस तरह से हिन्दी का विरोध होने पर भारत की संवैधानिक भाषा अंग्रेजी को लागू किया गया.

गुहा ने भारत ‘गांधी के बाद भारत’ में लिखा है कि, संविधान सभा में सबसे विवादास्पद विषय भाषा था. आजादी के पहले से ही इस बात पर विवाद था कि राज-काज की कौनसी भाषा होगी. 10 दिसंबर 1946 को जब सदन की कार्यवाही पर चर्चा की जा रही थी तब संयुक्ता प्रांत से चुनकर आए आर.वी. धूलेकर ने एक संशोधन प्रस्ताव पेश किया. इस दौरान उन्होंने प्रस्ताव को हिंदुस्तानी में पढ़कर सुनाया. लेकिन तभी उस सभा के अध्यक्ष ने कहा कि यहां बहुत से लोग ऐसे हैं जो हिंदुस्तानी नहीं समझते हैं. इस धूलेकर ने टिप्पणी करते हुए कि जो लोग हिंदुस्तानी नहीं समझते हैं उन्हें देश में रहने का कोई हक नहीं है. इस पर सभा में काफी विवाद हुआ और अंतत: हिन्दुस्तान को मान्यता नहीं मिल सकी.

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दरअसल हिंदुस्तानी उत्तर भारत की जनभाषा थी. यह हिंदी (जो कि देवनागरी लिपि में लिखी जाती है) और उर्दू (जो कि संशोधित अरबी लिपि में लिखी जाती है) का मिश्रित रूप थी. हालांकि इसे भी दक्षिण भारत के लोग समझते नहीं थे. लेकिन एक मुश्किल परिस्थिति में हिंदी और उर्दू भाषा के लोग दूर होने लगे और ये दोनों भाषाएं अलग हो गईं.