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नई दिल्ली. देश की आजादी का महोत्सव हो या गणतंत्र दिवस, कवि प्रदीप बरबस याद आ जाते हैं. वही कवि प्रदीप, जिनके लिखे असंख्य देशभक्ति गीत हम इन मौकों पर सुना करते हैं. ‘चल चल रे नौजवान…’, ‘आज हिमालय की चोटी से…’, ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं…’ जैसे देशभक्ति गीत और ‘ऐ मेरे वतन के लोगों…’ जैसी अमर रचना, कवि प्रदीप को हिन्दी सिनेमा में देश और देशभक्ति गीतों का माहौल बनाने के लिए याद किया जाता है. भारत-चीन युद्ध के बाद दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में लता मंगेशकर के ‘ऐ मेरे वतन के लोगों…’ गीत गाने के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के रो पड़ने का किस्सा तो आपको मालूम ही होगा. लेकिन इस गीत से जुड़ा एक और किस्सा है, जिसे सुनकर आपके मन में कवि प्रदीप के प्रति श्रद्धा और बढ़ जाएगी. जी हां, इस गीत को लिखने से पहले ही कवि प्रदीप ने रिकॉर्ड कंपनी से यह करार करा लिया था कि गाने की रॉयल्टी से मिलने वाला सारा पैसा सैनिक कल्याण कोष में दिया जाएगा. लेकिन रिकॉर्ड कंपनी ने उनकी बात नहीं मानी. इसका कवि प्रदीप को जीवनभर अफसोस रहा. लेकिन उनके परिवार ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर अंततः पूरे 10 लाख रुपए सैनिक कल्याण कोष में जमा कराए.
गाने पर अंग्रेजों ने आपत्ति की फिर भी डरे नहीं प्रदीप
कवि प्रदीप की जीवनगाथा के बारे में हिन्दी के प्रसिद्ध विद्वान धर्मवीर भारती की पत्नी पुष्पा भारती ने अपनी किताब ‘यादें, यादें…’ में विस्तार से लिखा है. इस पुस्तक में कवि प्रदीप के देशभक्ति गीत लिखने से जुड़ा एक रोचक अंश है. दरअसल, अंग्रेजों के खिलाफ महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के समय एक फिल्म बनी ‘किस्मत’. इस फिल्म का एक गाना तब खूब चर्चित हुआ था- ‘आज हिमालय की चोटी से फिर दुश्मन ने ललकारा है…’. यह कवि प्रदीप की हिम्मत ही थी कि ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने वाला गाना उन्होंने लिख डाला. फिल्म के रिलीज होने के साथ ही तत्कालीन स्वाधीनता संग्राम के माहौल में यह गाना प्रसिद्ध हो गया. सिनेमाहॉलों में दर्शकों की फरमाइश पर फिल्म को रिवाइंड कर के यह गाना बजाया जाता था. जाहिर है, अंग्रेज सरकार की नजर पड़नी ही थी, सो पड़ गई. कवि प्रदीप सेंशर बोर्ड में तलब किए गए. लेकिन कवि प्रदीप ने गाने के बचाव में ऐसी दलील दी कि अंग्रेज सरकार के अधिकारी चारों खाने चित हो गए. बोर्ड के सामने कवि प्रदीप ने अपनी बात रखते हुए कहा कि यह गीत तो सरकार के हित में है. हमारे देश पर भूतकाल में भी अनेक आक्रमण हो चुके हैं और हमने हर बार दुश्मन को ललकारा है. इसलिए गाने की लाइनों में मैंने ‘फिर’ शब्द का इस्तेमाल किया है. प्रदीप ने बोर्ड को बताया कि उन्होंने गाने की पंक्तियों में साफ लिखा है, ‘तुम न किसी के आगे झुकना, जर्मन हो या जापानी’. प्रदीपजी का तर्क काम कर गया और इसके बाद पूरे देश में यह गीत धड़ल्ले से बजता रहा.
जब कवि प्रदीप का गीत बना नौजवानों का मार्चिंग सांग
कवि प्रदीप के देशभक्ति से भरे गानों में इतने सरल शब्द होते थे कि ये आसानी से लोगों की जुबां पर चढ़ जाते थे. एक बार सुनकर ही ये गाने लोगों को याद हो जाते थे, इन्हें दोबारा सुनने की जरूरत नहीं होती थी. कुछ ऐसा ही संयोग उनके गाने ‘चल चल रे नौजवान…’ के साथ भी हुआ. वर्ष 1940 के आसपास रिलीज हुई फिल्म ‘बंधन’ का यह गाना इतना चर्चित हुआ था कि देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक बिल्कुल आंधी की तरह उड़कर लोगों की जुबान पर चढ़ गया. स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय पंजाब की यूथ लीग से जुड़े नौजवान इस गाने से ऐसा प्रेरित हुए थे कि उन्होंने इसे मार्चिंग सांग बना लिया. वहीं, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने, जो उस समय बहुत छोटी थीं, एक वानर सेना बनाई थी. इंदिरा गांधी की वानर सेना प्रतिदिन प्रभातफेरी के समय इस गाने को गाया करती थी. दरअसल, यह कवि प्रदीप की कलम का ही कमाल था कि उन्होंने जितने भी गाने लिखे, वे कालजयी हो गए. सरल व सहज भाषा, आसान से बोलचाल वाले शब्दों में रची-बुनी गई रचनाएं जब संगीत के सुरों के साथ लोगों के कानों तक पहुंचती थी, तो लोग उसे बिना गुनगुनाए रह नहीं पाते थे. यही वजह है कि आज भी ये गाने इसलिए खूब सुने जाते हैं. आपने फिल्म ‘जागृति’ के गाने तो सुने ही होंगे. चाहे वह ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दुस्तान की…’ हो या फिर महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और उनके जीवन पर लिखा गया गाना ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल…’. इन गानों की मधुरता, इनके शब्दों की वजह से ही है.
(साभारः पुष्पा भारती लिखित ‘यादें ! यादे ! और यादें !’)
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