नई दिल्ली. कुछ ही दिन पहले मध्यप्रदेश के कान्हा राष्ट्रीय अभयारण्य से एक बाघ को ओडिशा के सतकोसिया टाइगर रिजर्व में भेजा गया. चूंकि सतकोसिया टाइगर रिजर्व में दो मादा बाघ ही बचे हैं, इसलिए कान्हा राष्ट्रीय पशु उद्यान से एक बाघ को ओडिशा ले जाया गया, ताकि देश के पूर्वी इलाके में भी बाघों की संख्या बढ़ सके. अंतरराष्ट्रीय पत्रिका टाइम के साथ बातचीत में कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के फील्ड डायरेक्टर संजय शुक्ला ने बताया कि बाघ संरक्षण की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है. दरअसल, 2006 तक बाघों की आबादी में जबर्दस्त गिरावट आई थी. लेकिन इसके बाद भारत सरकार के टाइगर प्रोजेक्ट के तहत चले जागरूकता अभियानों के कारण वर्तमान में दुनिया की आधी से ज्यादा बाघों की आबादी भारत में है. पिछले 10 साल में भारत में बाघ की आबादी में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. आज International Tiger Day है. ऐसे में एक आंकड़ा हर भारतवासी को गर्व की अनुभूति कराएगा कि पूरी दुनिया में जहां सिर्फ 3890 बाघ जिंदा हैं, उसमें से 2,226 भारत में हैं. लेकिन इस आंकड़े को अभी और बढ़ाने की जरूरत हैं. Also Read - International Tiger Day: भारत में अब 3 हजार के करीब पहुंची बाघों की संख्या, पीएम मोदी ने जारी की रिपोर्ट

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बाघों के लिए पिछली सदी रही खतरनाक

20वीं सदी बाघों के लिए सबसे खतरनाक सदी रही है, जब दुनियाभर में हजारों की तादाद में जंगल के इस सबसे शानदार पशु का शिकार किया गया. इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार 100 वर्षों में 97 प्रतिशत से ज्यादा बाघ मार डाले गए. अंतरराष्ट्रीय पत्रिका टाइम के अनुसार, भारत में अंग्रेजों के राज के दौरान बाघ को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया गया. वर्ष 1911 में किंग जॉर्ज पंचम के भारत दौरे के दौरान सिर्फ 10 दिनों में ही 39 से ज्यादा बाघों का शिकार किया गया. भारत से लेकर नेपाल तक के जंगलों में बाघों के शिकार की यह सबसे बड़ी घटना थी. बाघ के शिकार का यह चलन आजादी के बाद तक जारी रहा. नौबत यह आई कि 1970 के दशक तक देश में सिर्फ 1800 बाघ ही बचे. इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1973 में बाघ संरक्षण के लिए देशव्यापी टाइगर प्रोजेक्ट की शुरुआत की. देश में कई जगहों पर बाघों के लिए जंगलों को सुरक्षित किया गया. सरकार की इस सकारात्मक पहल का नतीजा दिखा और बाघों की आबादी में सुधार हुआ. लेकिन 20वीं सदी के आखिरी वर्षों में एक बार फिर बाघों पर संकट आया और 2006 में देश इनकी संख्या घटकर मात्र 1411 रह गई.

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बाघों की गणना का सबसे बड़ा अभियान

भारत में चूंकि दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले सबसे ज्यादा बाघ पाए जाते हैं, इसलिए वर्ष 2006 के बाद भारत सरकार के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर बाघों को बचाने की पहल हुई. एक बार फिर विश्व का ध्यान बाघों को बचाने की ओर गया. इसका नतीजा रहा कि अगले 10 वर्षों में बाघों के शिकार की घटनाओं में कमी आई और जंगलों में इनकी संख्या में सुधार हुआ. 2014 में जारी भारत सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक देशभर के अभयारण्यों में कुल 2,226 बाघ हैं. इसके बाद के वर्षों के लिए सरकार ने एक बार फिर बाघों की गणना शुरू कराई है. टाइम पत्रिका के अनुसार, अभी बाघों की गणना का सबसे बड़ा अभियान चल रहा है, जिसकी रिपोर्ट जनवरी 2019 में आएगी. अधिकारियों को उम्मीद है कि बाघों के सेंशस के संबंध में इस रिपोर्ट के आंकड़े चौंकाने वाले होंगे. अधिकारियों को भरोसा है कि देश के 50 राष्ट्रीय पशु अभयारण्यों में बाघों की संख्या 3 हजार से भी अधिक हो सकती है.