इरफ़ान खान नहीं रहे. 54 साल की उम्र में उन्होंने अलविदा कह दिया है. आज मुंबई में इरफ़ान ने आखिरी सांस ली. इरफ़ान के प्रशंसक हों या हिंदी सिनेमा, कोई भी इसकी कल्पना भी नहीं कर रहा था. 1988 में ‘सलाम बॉम्बे’ से शुरू हुआ ये सफ़र ‘द वॉरियर, हासिल, मक़बूल, लाइफ इन ए मेट्रो, लाइफ ऑफ़ पाई, ये साली जिंदगी, पीकू, लंच बॉक्स, पान सिंह तोमर और हिंदी मीडियम जैसी फिल्मों के बाद अंग्रेजी मीडियम’ पर थम गया. इरफ़ान खान दुनिया के गिने-चुने अभिनेताओं में से थे, जो आँखों से भी संवाद कर लेते थे. शायद ही कोई हो जिसने एक अभिनेता के तौर पर इरफ़ान खान को पसंद न किया हो. कई लोग ये मानते हैं कि वह सर्वश्रेष्ठ कलाकार बनने की ओर थे. अब तक उनका सफ़र भी ऐसा ही था. इरफ़ान की हर फिल्म पर काफी कुछ लिखा और कहा जा सकता है. कई हक़ीक़त के किरदार ऐसे हैं, जिन्हें लोग इरफ़ान खान की वजह से याद करेंगे. ‘पान सिंह तोमर’ एक ऐसी ही फिल्म थी. पान सिंह तोमर का किरदार इरफ़ान ने निभाया ज़रूर था, लेकिन फिल्म देखने के बाद कई लोगों को ऐसा लगा था जैसे इरफ़ान खान ही पान सिंह तोमर हैं. Also Read - इरफान खान के निधन के एक महीने बाद पत्नी सुतापा सिकदर ने शेयर किया इमोश्नल पोस्ट, लिखा- 'फिर मिलेंगे, बातें करेंगे'

25 अप्रैल 2017. यही दिन था जब मैं एक ऐसे घर के दरवाज़े के बाहर खड़ा था, जिसका इतिहास अच्छा था या बुरा, जिसकी ज़िन्दगी स्वर्णिम रही या अंत बुरा, ऐसे किसी नतीज़े पर पहुँचने से पहले न जाने कितने हालात, तथ्य और कहानियाँ दिमाग में थीं. मैं सेना में सूबेदार होने की छवि दिमाग में ला रहा था. अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी होना भी ज़ेहन में था और उसके बाग़ी हो जाने को भी बार-बार सोचे जा रहा था. दरअसल, मैं बार-बार पान सिंह तोमर को याद कर रहा था, लेकिन इस घर के दरवाज़े पर खड़े होकर मुझे कोई सबसे अधिक याद रहा था तो वह थे इरफ़ान खान. मैं पान सिंह तोमर से परिवार के मुख़ातिब होने को था और जब भी पान सिंह तोमर को सोचता तो बरबस इरफ़ान खान का चेहरा ही याद रहा था. Also Read - ऋषि कपूर-इरफान खान पर शर्मनाक कमेंट करना कमाल राशिद खान को पड़ा भारी, FIR दर्ज

पान सिंह तोमर के बेटे ने दरवाज़ा खोला. बात हुई और उन्होंने मुश्किल से हमें अन्दर आने की इजाज़त दी. मैं बातचीत और अपने सवालों को लेकर बेहद सावधान था क्योंकि कुछ कारणों से वह पहले ही बात नहीं करना चाह रहे थे. मेरा सबसे पहला सवाल था कि फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ कैसी लगी. पान सिंह तोमर की पत्नी इंदिरा सिंह तोमर चुप ही रहीं. आर्मी से रिटायर हो चुके उनके बेटे शिवराम सिंह तोमर के पहले शब्द थे… ‘इरफ़ान खान ने अच्छी एक्टिंग की है. वह ऐसे ही थे.’ मैंने डकैत शब्द का इस्तेमाल किया तो बेटे शिवराम ने बीच में टोकते हुए कहा- ‘सूबेदार साहब डकैत नहीं थे, बाग़ी थे. उन्होंने जो किया वह मजबूरी में किया.’ ये सुनकर मुझे फिल्म का वो डायलॉग याद आया, जिसमें पान सिंह तोमर के रूप में इरफ़ान ने कहा था कि ‘चम्बल में बागी होते हैं, डकैत तो संसद में होते हैं.’ Also Read - इस बॉलीवुड एक्ट्रेस का बड़ा खुलासा, 'हार मान लिया था मगर इरफ़ान ने नहीं छोड़ने दी थी एक्टिंग'

मैं झांसी के बबीना इलाके में पान सिंह तोमर के परिवार के सामने बैठा था. पान सिंह तोमर की पत्नी, बेटे और परिवार के अन्य सदस्य भी सामने थे. और पूरी फिल्म मेरे दिमाग में घूम रही थी. शुरुआती बातचीत इरफ़ान खान और फिल्म पर ही केन्द्रित रही. मैं जानना चाह रहा था कि इरफ़ान खान के किरदार को ये परिवार पान सिंह तोमर के कितना करीब पाता है. इस बारे में पान सिंह तोमर के परिवार ने बहुत अधिक कुछ नहीं कहा… सिवाय इसके कि इरफ़ान ने सूबेदार साहब को जीवंत किया. फिल्म अच्छी है.’ हालाँकि उन्होंने फिल्म में कुछ जगहों पर तथ्यों से छेड़छाड़ की बात ज़रूर कही, लेकिन इसमें इरफ़ान पर कोई टिप्पणी शामिल नहीं रही.

मैं उस परिवार से मिलने के आधे घंटे तक पान सिंह तोमर को इरफ़ान खान में ही खोजता रहा. लग रहा था जैसे इरफ़ान ही पान सिंह तोमर हैं. जबकि सेना में सूबेदार और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के एथलीट रहे पान सिंह तोमर की कई शानदार तस्वीरें मेरे सामने थीं. मुझे इरफ़ान खान से इतर पान सिंह तोमर को समझने में थोड़ी देर लगी. मेरे कई सवाल थे, जो इरफ़ान द्वारा निभाए गए किरदार और फिल्म के दृश्यों से निकले थे. जिनके जवाब भी जैसे इरफ़ान और फिल्म के इर्द-गिर्द ही मिले थे.

पान सिंह तोमर के बारे में मैंने काफी बातचीत की. जिंदगी के उतार-चढ़ाव के बारे में कई बातें थीं जो उमड़-घुमड़ रही थीं. जब इस परिवार से विदा लेकर मैं निकला तब भी पान सिंह तोमर को सोचते हुए मेरे ज़ेहन में फिल्म वाले पान सिंह तोमर यानी ही इरफ़ान खान थे. तब इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि उस तारीख के ठीक 3 साल बाद इरफ़ान खान को दुनिया खो देगी. निश्चित ही पान सिंह तोमर का परिवार भी इरफ़ान के जाने से दुखी होगा. 1 अक्टूबर, 1981 में पान सिंह तोमर का एनकाउंटर हुआ था. इरफ़ान खान के रूप में इस परिवार ने अपने पान सिंह को करीब 39 साल बाद आज 29 अप्रैल 2020 को शायद दूसरी बार खो दिया है.

चम्बल को लेकर कई शोध करने वाले एक्टिविस्ट शाह आलम कहते हैं- इरफ़ान खान स्टार और कलाकार में अंतर बताने के साथ-साथ बीहड़ और संसद का फर्क भी बखूबी समझा गए.