नई दिल्ली: Google Doodle लेखिका इस्मत चुगताई का 107वां बर्थ-डे मना रहा है. चुगताई को उर्दू साहित्य की सर्वाधिक विवादास्पद और सर्वप्रमुख लेखिकाओं में से एक माना जाता है. उन्होंने महिलाओं के सवालों को नए सिरे से उठाया. निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम तबके की जवान होती लड़कियों की मनोदशा को उर्दू कहानियों और उपन्यासों में सच्चाई के साथ बयान किया. वे अपनी ‘लिहाफ’ कहानी के कारण खासी मशहूर हुईं. 1941 में लिखी गई इस कहानी में उन्होंने महिलाओं के बीच समलैंगिकता के मुद्दे को उठाया था. उस दौर में किसी महिला के लिए यह कहानी लिखना एक दुस्साहस का काम था. इस्मत को इस दुस्साहस की कीमत अश्लीलता को लेकर लगाए गए इलजाम और मुकदमे के रूप में चुकानी पड़ी. Also Read - Google Doodle: कोरोना ने पकड़ी रफ्तार तो Google ने फिर लगाया 'मास्क', Doodle में दिया यह खास संदेश

पद्मश्री से सम्मानित
1976 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. इससे पहले 1974 में गालिब अवॉर्ड, टेढ़ी लकीर पर साहित्य अकादमी पुरस्कार इक़बाल सम्मान, मखदूम अवार्ड और नेहरू अवार्ड से सम्मानित किया गया. डायरेक्टर और स्क्रीनराइटर शाहिद लतीफ से शादी करने के बाद उन्होंने फिल्मों में भी अपनी किस्मत अजमाई. फिल्म जिद्दी लिखने में उन्होंनें अपने पति की मदद की. उन्होंने अनेक चलचित्रों की पटकथा लिखी और जुगनू में अभिनय भी किया. उनकी पहली फिल्म छेड़-छाड़ 1943 में आई थी. वे कुल 13 फिल्मों से जुड़ी रहीं. उनकी आख़िरी फ़िल्म गर्म हवा (1973) को कई पुरस्कार मिले.उर्दू साहित्य में सआदत हसन मंटो, इस्मत, कृष्ण चंदर और राजेन्दर सिंह बेदी को कहानी के चार स्तंभ माना जाता है. इनमें भी आलोचक मंटो और चुगताई को ऊंचे स्थानों पर रखते हैं क्योंकि इनकी लेखनी से निकलने वाली भाषा, पात्रों, मुद्दों और स्थितियों ने उर्दू साहित्य को नई पहचान और ताकत बक्सी. Also Read - कौन हैं Prof. Udupi Ramachandra Rao? गूगल ने बनाया डूडल

महिलाओं को अपनी जुबान दी
उन्होंने ठेठ मुहावरेदार गंगा जमुनी भाषा का इस्तेमाल किया जिसे हिंदी उर्दू की सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता. उनका भाषा प्रवाह अद्भुत है और इसने उनकी रचनाओं को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने स्त्रियों को उनकी अपनी जुबान के साथ अदब में पेश किया. उनकी रचनाओं में सबसे आकर्षित करने वाली बात उनकी निर्भीक शैली थी. उन्होंने अपनी रचनाओं में समाज के बारे में निर्भीकता से लिखा और उनके इसी दृष्टिकोण के कारण साहित्य में उनका खास मुकाम बना. Also Read - International Women's Day: Google ने महिलाओं के सम्मान में बनाया Doodle, Facebook ने किया यह काम

खुद को मुख्य प्लॉट बनाकर लिखा उपन्यास
इस्मत का कैनवास काफी व्यापक था जिसमें अनुभव के विविध रंग उकेरे गए हैं. ऐसा माना जाता है कि टेढी लकीरे उपन्यास में उन्होंने अपने ही जीवन को मुख्य प्लॉट बनाकर एक स्त्री के जीवन में आने वाली समस्याओं और स्त्री के नजरिए से समाज को पेश किया है. उन्होंने आज से करीब 70 साल पहले पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों के मुद्दों को स्त्रियों के नजरिए से कहीं चुटीले और कहीं संजीदा ढंग से पेश करने का जोखिम उठाया. उनके अफसानों में औरत अपने अस्तित्व की लड़ाई से जुड़े मुद्दे उठाती है.

स्त्री विमर्श को 70 साल पहले उठाया
साहित्य और समाज में चल रहे स्त्री विमर्श को उन्होंने आज से 70 साल पहले ही प्रमुखता दी थी. इससे पता चलता है कि उनकी सोच अपने समय से कितनी आगे थी. उन्होंने अपनी कहानियों में स्त्री चरित्रों को बेहद संजीदगी से उभारा और इसी कारण उनके पात्र जिंदगी के बेहद करीब नजर आते हैं. महिलाओं के सवालों के साथ ही उन्होंने समाज की कुरीतियों, व्यवस्थाओं और अन्य पात्रों को भी बखूबी पेश किया. उनके अपसानों में करारा व्यंग्य मौजूद है. 1991 में 80 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.

रचनाएं
कहानी संग्रह: चोटें, छुईमुई, एक बात, कलियां, एक रात, दो हाथ दोजखी, शैतान
उपन्यास: टेढी लकीर, जिद्दी, एक कतरा ए खून, दिल की दुनिया, मासूमा, बहरूप नगर, सैदाई, जंगली कबूतर, अजीब आदमी, बांदी
आत्मकथा: ‘कागजी हैं पैराहन’