Story Of Jagannath: जगन्नाथ रथयात्रा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 23 जून को कुछ सावधानियों के साथ रथयात्रा की अनुमति दे दी गई है. इस दौरान राज्य सरकार को सावधानी बरतने को भी कहा गया है. लोगों की भीड़ भी कम इक्ट्ठा होगी. गौरतलब है कि जगन्नाथ धाम हिंदू धर्म व पुराणों के आधार पर चार धामों में से एक है. जगन्नाथ धाम को धरती पर वैकुंठ भी कहा गया है. आपको बता दें कि यहां भगवान विष्णु ने तरह तरह की लीलाएं की थीं. जगन्नाथ धाम भाई-बहन के पवित्र रिश्तों का भी बखान करती है.Also Read - भारत में 2 सालों में पेड़, वन क्षेत्र में 2261 वर्ग KM की बढ़ोतरी हुई : ISFR Report

रथ यात्रा की परंपरा Also Read - Panchayat Elections News: ओडिशा में 16 फरवरी से 5 चरणों में होंगे त्र‍िस्‍तरीय पंचायत चुनाव

बता दें कि जगन्नाथ धाम में भगवान श्रीकृष्ण, उनकी बहन सुभद्रा और उनके बड़े भाई बलराम की मूर्ति की पूजा यहां की जाती है. वहीं रथयात्रा निकालने की परंपरा की बात करें तो पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्नान पूर्णमा के दिन भगवान जगन्नाथ का जन्मदिन होता है. इस दिन भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलराम औप बहन सुभद्रा को रत्म सिंहासन से उतारकर मंदिर के समीप बने एक मंडप में ले जाया जाता है. यहां इन्हें स्नान कराया जाता है. यह स्नान 108 कलशों के माध्यम से कराया जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार अब भगवान बी हो जाते हैं. इनका शरीर तपने लगता है. इसके बाद इन्हें एक खास कक्षा में रखा जाता है. यहां भगवान 15 दिनों तक रहते हैं. Also Read - 7th Pay Commission: कर्मचारियों को मिला नए साल का तोहफा, DA में 3 फीसदी की बढ़ोतरी, बकाये पर भी आया फैसला

इस दौरान प्रभु के कक्षा में जाने की अनुमति सिर्फ मंदिर के प्रमुख सेवकों और वैद्यों को ही होती है. इनके अलावा विशेष कक्षा में जाने की अनुमति किसी को नहीं दी जाती है. इस बीच भगवान जगन्नाथ के प्रतिनिध अलारनाथ की प्रतिमा को स्थापित कर पूजा पाठ शुरू की जाती है. 15 दिन विशेष कक्ष में भगवान समय बिताकर जब भगवान कक्ष से बाहर निकलते हैं तो वे लोगों को दर्शन देते हैं. इसे नव यौवन नैत्र उत्सव कहा जाता है. इसके बाद भगवान जगन्नाथ बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलरा के साथ बाहर आते हैं और अपने रथ पर विराजमान को होकर भ्रमण करने निकलते हैं.

रथ खींचने का अधिकार

भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के रथ को कोई भी भक्तगण खींच सकता है. इसका नमून आपको हर साल रथ यात्रा में देखने को मिल सकता है. क्योंकि हर साल भगवान के रथ को खींचने के लिए भक्तों में होड़ लगी रहती है. सभी इस रथ को खींचकर पुण्य का भागी बनना चाहते हैं. कहते हैं कि भगवान के रथ को खींचने से लोगों को जीवन काल के चक्र से मुक्ति मिल जाती है. अगर हिंदू धर्म की बात करें तो भगवान के लिए सभी एक समान हैं. इसलिए रथयात्रा में किसी धर्म, जाति विशेष जैसी चीजों को स्थान नहीं दिया जाता है. बल्कि इस साल सुप्रीम कोर्ट में रथयात्रा निकालने को लेकर एक मुस्लिम शख्स ने गुहार लगाई थी.

मंदिर स्थापना एक रोचक कथा

इस मंदिर की स्थापना मालवा के राजा इंद्रदयुम्न ने कराया था. इनके पिता का नाम भारत और माता का नाम सुमति था. पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा को एक बार सपने में भगवान जगन्नाथ के दर्शन हुए थे. सपने में भगवान ने राजा से अपनी एक मूर्ति को नीलींचल पर्वत की गुफा में ढूंढने और मूर्ति को एक मंदिर बनवाकर स्थापित करने को कहा. इस मूर्ति को भगवान ने नीलमाधव बताया. इसके बाद राजा अपने सेवके के साथ नीलांचल पर्वत की गुफा में भगवान की मूर्ति ढूंढने निकल पड़ते हैं. राजा के साथ जो लोग निकले थे उनमें से एक ब्राह्मण का नाम विद्यापति था. विद्यापति को सबर कबीले के लोगों के बारे पता था जो नीलमाधव की पूजा करते हैं.

विद्यापति को यह भी मालूम था कि भगवान नीलमाधव की प्रतिमा को गुफा के अंदर सबर कबीले के लोग छिपा कर रखते हैं. इस कबीले का मुखिया विश्ववसु भगवान का उपासक था. हालांकि भगवान की मूर्ति पाने के लिए मुखिया का आदेश सर्वोपरि था और मुखिया भगवान का उपासक. वह किसी भी हाल में भगवान की मूर्ति देने को तैयार न होता. इस कारण विद्यापति ने चालाकी से मुखिया की बेटी से विवाह कर लिया. अपनी पत्नी के सहारे विद्यापति उस गुफा तक पहुंचने में कामयाब हो गए जहां भघवान नीलमाधव की मूर्ति रखी गई थी. विद्यापति ने नीलमाधव की मूर्ति को चुरा लिया और राजा को सौंप दिया.

कहते हैं कि विश्ववसु अपने भगवान की मूर्ति के चोरी होने से काफी दुख हुआ. इस कारण भगवान को भी काफी दुख हुआ कि उनका उपासक दुखी है. इस कारण नीलमाधव वापस गुफा में लौट गए और राजा इंद्रदयुम्न से वादा किया कि वह एक दिन उनके पास जरूर लौंटेंगे लेकिन राजा उनके लिए एक मंदिर बनवा दे. इसके बाद राजा ने मंदिर बनवाकर भगवान से विराजमान होने के लिए कहा लेकिन तभी भगवान ने कहा कि द्वारका से तैरकर पुरी की तरफ आ रहे बड़े से पेड़ के टुकडे़ को लेकर आओ. इससे तुम मेरी मूर्ति बनाओ. राजा व उनके लोग फौरन पेड़ के टुकड़े के तलाश में निकल पड़े. लकडी का टुकड़ा उन्हें मिल गया लेकिन वो उठाकर लाने में असक्षम थे. तभी राजा को कबीले का मुखिया विश्ववसु याद आया. राजा ने विश्ववसु की सहायता ली. विश्ववसु लकड़ी को उठाकर मंदिर तक ले आए और फिर भगवान की मूर्ति बनाई गई.