चेन्नई. द्रविड़ आंदोलन के अग्रणी नेताओं में शामिल एम. करुणानिधि के निधन से राज्य में शख्सियत आधारित द्विध्रुवीय राजनीति के समाप्त होने के संकेत नजर आ रहे हैं. दरअसल, राज्य की राजनीति में पिछले पांच दशकों में चिर प्रतिद्वंद्वी द्रमुक और अन्नाद्रमुक के करिश्माई नेताओं का वर्चस्व रहा है. चाहे जयललिता रही हों या करुणानिधि, दोनों नेताओं के इर्द-गिर्द ही राज्य की राजनीति घूमती थी. लेकिन अब आगे क्या? यह एक सवाल है, जिसके जवाब का आज की तारीख में पूरा देश इंतजार कर रहा है. आप भी अंदाजा लगाएं कि क्या करुणानिधि के पुत्र स्टालिन या वर्तमान नेता पन्नीरसेल्वम या फिर पलानीसामी, इनमें से कोई राज्य की सियासत का अगला वारिस होगा या फिर वे दो नए अभिनेता! जी हां, राज्य की राजनीति में हाल के दिनों में तमिल सिनेमा की दो हस्तियों- कमल हासन और रजनीकांत ने भी कदम रखा है. कमल हासन जहां अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन कर चुके हैं, वहीं दिग्गज अभिनेता रजनीकांत को अभी अपना दल बनाना है. जिस तरह सिनेमाई व्यक्तित्वों का तमिलनाडु की राजनीति में प्रभाव रहा है, उसे देखते हुए सियासी जानकार इन दोनों हस्तियों के तेजी से उभरने के संकेत देख रहे हैं. बहरहाल, करुणानिधि के निधन के बाद तमिलनाडु की सियासत पर आज देश की नजरें टिकी हुई हैं.

Live:करुणानिधि की अंतिम यात्रा निकली, मरीना बीच पर होगा अंतिम संस्कार

एमजीआर, करुणानिधि और जयललिता
वे करुणानिधि और एमजीआर (एमजी रामचंद्रन) ही थे, जो शुरुआती दौर में लोगों के बीच प्रभावशाली रहे थे. बाद में, द्रमुक नेता एवं एमजीआर की उत्तराधिकारी एवं दिवंगत जे. जयललिता प्रभावशाली रहीं. दिलचस्प है कि वर्ष 2016 में जयललिता और करुणानिधि, दोनों ही चर्चा में कम रहने लगे. 75 दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद जयललिता की मृत्यु हो गई, जबकि डीएमके प्रमुख बीमारी से ग्रसित हो गए और उससे वह अपने निधन तक उबर नहीं पाए. करुणानिधि के गले में सांस लेने के लिए एक ट्यूब डाली गई थी, जिसके चलते उनकी आवाज चली गई थी. द्रमुक संस्थापक सीएन अन्नादुरई के निधन के बाद 1969 में राज्य के मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले करुणानिधि धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूर होते गए. कल शाम 94 वर्ष की आयु में उनका निधन होने तक वह सार्वजनिक रूप से नहीं के बराबर दिखे थे. बीमारी की वजह से द्रमुक प्रमुख गोपालपुरम स्थित अपने आवास से बाहर नहीं निकलते थे और उनके बेटे एमके स्टालिन ने पार्टी का रोजाना का कामकाज संभाल लिया तथा कार्यकारी प्रमुख का एक नया पदभार संभाला.

जयललिता की तरह करुणानिधि को भी दफनाया क्यों जा रहा है?

Jaya-Karuna

दो नेताओं के वर्चस्व में होती रही सियासत
करुणानिधि से मतभेदों को लेकर द्रमुक से बाहर किए जाने पर एम.जी. रामचंद्रन ने अन्नाद्रमुक का गठन किया था. वर्ष 1977 के आम चुनाव में अपनी पार्टी को द्रमुक के खिलाफ भारी जीत दिलाई. इसके अगले 10 वर्षों तक एमजीआर और करुणानिधि, इन दोनों नेताओं के इर्द-गिर्द तमिलनाडु की राजनीति घिरी रही. एमजीआर का 1987 में निधन होने तक भी राज्य की राजनीति में इन्हीं दोनों नेताओं का वर्चस्व था. एमजीआर के बाद करुणानिधि की नई प्रतिद्वंद्वी के रूप में राजनीतिक फलक पर जयललिता उभरीं. जे. जयललिता के उभरने के साथ राज्य में एक बार फिर दो नेता हो गए. इसके अगले चार दशक तक राज्य में द्विध्रुवीय राजनीति की प्रवृत्ति देखने को मिली. हालांकि, एमजीआर के निधन के बाद अन्नाद्रमुक में विभाजन भी हुआ, तीसरे धड़े की संभावनाओं ने जन्म भी लिया, लेकिन जयललिता ने एमजीआर के नाम पर दोनों धड़ों को एकजुट कर लिया. यानी द्विध्रुवीय राजनीति चलती रही.

करुणानिधि के उदय के साथ ही तमिलनाडु में खत्म हो गई कांग्रेस

तीसरा दल बना, मगर अप्रभावी रहा
तमिलनाडु की राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही करुणानिधि ने चुनावी मोर्चे पर कई बार प्रतिकूल परिणामों का सामना किया हो, लेकिन वह कभी नहीं झुके. यही वजह है कि तमिलनाडु की जनता अपने कलैगनार का साथ देती रही. जयललिता और करुणानिधि के वर्चस्व वाले राजनीतिक परिदृश्य में एक दृश्य ऐसा भी बना जब विजयकांत और डीएमडीके जैसे तीसरे दल राज्य की राजनीति में सामने आए. इन दलों ने कुछ चुनावों में प्रभावशाली प्रदर्शन किए, जिससे लोगों को लगा कि दोध्रुवीय राजनीतिक संस्कृति में बदलाव आएगा, लेकिन इन दलों का प्रभाव क्षणिक ही रहा. ये पार्टियां अपना प्रभाव बढ़ा नहीं पाईं और द्रविड़ राजनीति का द्विध्रुवीय स्वरूप बना रहा. लेकिन अब? करुणानिधि और जयललिता के निधन के बाद राज्य की राजनीति में एक शून्य पैदा हो गया है. सियासी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नेता के लिए उनके करिश्मे और राजनीतिक प्रभाव की बराबरी कर पाना एक चुनौती होगी. इसलिए, राज्य में शख्सियत आधारित राजनीति का पटाक्षेप हो सकता है.

पत्नी और प्रेमिका के साथ जीने वाले करुणानिधि, 5 बार सीएम तो 13 बार विधायक बने, कभी चुनाव नहीं हारे

Rajni-Kamal

कमल हासन और रजनीकांत के लिए माकूल स्थिति
कमल हासन और रजनीकांत जैसे प्रख्यात अभिनेताओं ने तमिलनाडु की राजनीति में आने की धमक जरूर दिखाई है, लेकिन अभी उनके सियासी प्रदर्शन का मुजाहिरा होना बाकी है. फिर भी, करुणानिधि के निधन के बाद इन दोनों अभिनेताओं के लिए नेता के रूप में अपने को स्थापित करने का सुनहरा मौका है. इन दोनों में से कोई एक भी इस राजनीतिक शून्यता को भर सकता है. कमल हासन ने अपनी पार्टी मक्कल नीधि मइय्म लॉन्च कर दी है. वहीं रजनीकांत को अभी अपने दल की घोषणा करनी है. सियासी जानकारों का मानना है कि रजनीकांत और कमल हासन, तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि की तरह राजनीति के दो चेहरों के तौर पर उभर सकते हैं. करुणानिधि और जयललिता जिस तरह व्यक्तिगत तौर पर भी एक-दूसरे के विरोधी रहे, उसके विपरीत इन दोनों अभिनेताओं का आपसी मित्र होना भी सुखद संयोग है. यह तमिलनाडु में सकारात्मक राजनीति के लिए अच्छा है. इसलिए अगर आने वाले कुछ दिनों में इन दोनों हस्तियों ने सही कदम उठाए तो भविष्य में तमिलनाडु को राजनीति के दो बड़े सूरमा मिल जाएंगे. हालांकि रोचक बात यह भी है कि इन दोनों अभिनेताओं के नेता बनने के बाद एक बार फिर दोध्रुवीय राजनीति की यह परिपाटी राज्य में कायम रहेगी.