नई दिल्ली. पश्चिम एशियाई देश ओमान (Oman) की साहित्यकार जोखा अल्हार्थी (Jokha Alharthi) ने इस साल का प्रतिष्ठित मैन बुकर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार (Man Booker International prize) जीता है. अल्हार्थी ने यह पुरस्कार जीतकर ओमान में इतिहास रच दिया है, क्योंकि वह पहली महिला उपन्यासकार हैं, जिन्हें उनकी अरबी भाषा में लिखे गए उपन्यास ‘कैलेस्टियल बॉडीज’ (Celestial Bodies) के लिए यह मशहूर पुरस्कार मिला है. अल्हार्थी की यह जीत इस मायने में भी खास है क्योंकि उनकी रचना मूल रूप से अरबी में है और इसके अंग्रेजी में अनुवाद को बुकर पुरस्कार की चयन समिति ने चुना है.

जोखा अल्हार्थी को बुकर पुरस्कार में जीत के स्वरूप 50 हजार पाउंड यानी 44 लाख रुपए से ज्यादा की रकम मिलेगी. इस रकम को उन्होंने अपने उपन्यास ‘कैलेस्टियल बॉडीज’ की अनुवादक अमेरिका की मर्लिन बूथ के साथ बांटने का फैसला किया है. ओमान की तीन बहनों पर केंद्रित मूलतः अरबी में लिखे गए इस उपन्यास का मर्लिन ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है. ‘कैलेस्टियल बॉडीज’ उपन्यास में तीन बहनों- मय्या, अस्मा और ख्वाला की कहानी जो एक मरुस्थली देश में रहती हैं. उपन्यास में तीनों बहनों के दासता के अपने इतिहास से उबर कर जटिल आधुनिक विश्व के साथ तालमेल करने की जद्दोजहद का वर्णन किया गया है.

यह भी पढ़ें – साहित्य, संगीत और पर्यटन से याद कर सकते हैं विश्वगुरु को

ब्रिटेन के अखबार द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, बुकर पुरस्कार चयन समिति के एक जज इतिहासकार बेट्टानी हफ्स (Bettany Hughes) ने कहा कि अंग्रेजी साहित्य में इस तरह की रचनाधर्मिता हमें शायद ही देखने को मिलती है, जैसी कि जोखा अल्हार्थी के ‘कैलेस्टियल बॉडीज’ में पढ़ने को मिली है. यह उपन्यास दासता, लैंगिक भेदभाव और रूढ़ियों को लेकर लिखे गए तमाम साहित्य से इतर है. बुकर पुरस्कार के जजों की समिति इस पुस्तक की इन्हीं खूबियों को दुनिया के सामने लाना चाहती है. इस उपन्यास को पढ़ने के बाद आपको मजा आ जाएगा.

जोखा अल्हार्थी के उपन्यास ‘कैलेस्टियल बॉडीज’ का बुकर पुरस्कार के लिए चयन किया जाना भी अपने आप में अनोखा है. बुकर पुरस्कार को लेकर अल्हार्थी का मुकाबला कई ख्यातिनाम और पुराने विजेताओं से भी था. इनमें ओल्गा टोकरजुक, फ्रांस की साहित्यकार एनी एर्नॉक्स और कोलंबिया की युआन गैब्रियल वैस्केज से था. अनुवाद की श्रेणी में काल्पनिक कथा लेखिकाओं के बीच अल्हार्थी का चयन मुश्किल तो था, लेकिन पुरस्कार चयन समिति की पारखी नजरों ने काफी सोच-विचार के बाद आखिरकार उनके नाम पर मुहर लगा ही दी.

हिंदी दिवस 2018: हिन्दी को फैलाने वाले वो जासूसी और रोमांटिक उपन्यास, जिन्हें पढ़ते वक्त भूख-प्यास नहीं लगती थी

हिंदी दिवस 2018: हिन्दी को फैलाने वाले वो जासूसी और रोमांटिक उपन्यास, जिन्हें पढ़ते वक्त भूख-प्यास नहीं लगती थी

गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, बुकर पुरस्कार के लिए ‘कैलेस्टियल बॉडीज’ के अंतिम सूची में चयन होने के बाद इसकी अनुवादक मर्लिन बूथ ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें इस बात को लेकर बहुत खुशी है कि ओमानी साहित्य को अब दुनियाभर की नजरों से गुजरने का मौका मिलेगा. ओमान में लिखी गई कहानी को साहित्यप्रेमियों की व्यापक दुनिया तक पहुंचने का मौका मिलेगा. मर्लिन ने इंटरव्यू में इस बात को भी रेखांकित किया था कि अरबी भाषा में लिखी गई किताब से वहां का साहित्य दुनियाभर तक पहुंचने वाला है. मर्लिन के अनुसार जोखा अल्हार्थी का यह उपन्यास, अरब की दुनिया को लेकर एक फैंटेसी में जीने वालों को वहां की वास्तविकता को समझने का मौका देगा.