Kaifi Azmi 101th Birth Anniversary: उर्दू शायरी की दुनिया का एक ऐसा नाम जिसकी बुनियाद में सामाजिक व्यथाओं का एक भंडार है. 20वीं सदी के लोकप्रिय कवियों और मशहूर शायरों की फेहरिश्त में एक ऐसा जगमगाता नाम जिसनें अपनी शायरी को आवाम की आवाज़ बना दी. हम बात कर रहे हैं उर्दू साहित्य के अज़ीम शायर कैफ़ी आज़मी की. आज यानी मंगलवार को इस शायर की 101वीं जयंती है (Kaifi Azmi’s 101st Birthday).

साल 1919 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में जन्मे कैफ़ी आज़मी का असली नाम सैयद अतहर हुसैन रिज़वी था. कैफ़ी आज़मी ने अपनी शायरी से हर उम्र को छुआ था. लेखनी ऐसी जिसकी वजह से इन्हें प्रगतिशील शायर का उपसर्ग मिल गया. कहते हैं हर शायर के अंदर कई किस्म के लोग सांस लेते हैं और ऐसा ही मंज़र कैफ़ी आज़मी के साथ था. जब उन्होंने वतन की मोहब्बत को लफ़्ज़ों में बांधना चाहा तब उनके कलम ने ‘कर चले हम फिदा, जान-ओ-तन साथियों’ जैसा नगमा दुनिया को दे दिया और जब इस शायर ने इश्क़ के पेचीदा मसाइल पर बात कहनी चाही तब उनके कलम ने ‘ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नही’ जैसा मशहूर और सुपरहिट गाने से दुनिया को सराबोर कर दिया.

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कैफ़ी आज़मी और उनकी पत्नी शौक़त आज़मी (फाइल फोटो)

बचपन से ही शायरी का शौक़ रखने वाले इस शायर ने अपनी पहली कविता 11 साल की उम्र में लिखी थी और तब से इन्होंने खुद को इसी रंग में ढाल लिया. महज़ उर्दू अदब या महफ़िलों तक इस शायर ने खुद को बांध कर नहीं रखा बल्कि फिल्मों की दुनिया में भी अपनी लेखनी का जौहर दिखाया. हीर राँझा और कागज के फूल जैसी फिल्मों में गीत लिख कर कैफ़ी आज़मी ने खुद को आवाम का चहेता बना दिया था.

इस बाकमाल शायर ने साल 1943 में अपनी पहली कविता Jhankar को प्रकाशित किया और प्रभावशाली प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य बने जहां से उन्होंने सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर अपने विचार रखें. इस अज़ीम शख्सियत ने अपनी ज़िंदगी में कई बड़े अवार्ड को अपने नाम किया जिनमें तीन फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार, साहित्य और शिक्षा के लिए प्रतिष्ठित पद्म श्री पुरस्कार और साहित्य अकादमी फैलोशिप जैसे कुछ पुरुस्कार शामिल है.

कैफ़ी आज़मी की मोहब्बत में आज गूगल ने भी इस मुबारक मौके पर उनका डूडल बनाकर उन्हें याद किया है. हर सदी में आवाम की आवाज़ बनने की सलाहियत रखने वाले इस शायर को हम श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.