Kaifi Azmi Death Anniversary: आज का दिन कई मायनों में याद किए जाने की सलाहियत रखता है. जहां एक तरफ पूरी दुनिया इस दिन को ‘मदर्स डे’ के रूप में मना रही है वहीं दूसरी तरफ आज के दिन ही उर्दू अदब और साहित्य के एक जगमगाते सितारे ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था. 20वीं सदी का वो मक़बूल और मशहूर शायर जिसने हर शय से मोहब्बत की और उसकी इबादत में कसीदे गढ़ें. आज मुल्क के पसंदीदा शायर कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथ‌ि है (Kaifi Azmi Death Anniversary). 10 मई 2002 को इस अज़ीम शख़्सियत ने सबसे मुंह मोड़ लिया था. Also Read - Kaifi Azmi's 101st Birthday: 'उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे', पढ़ें कैफ़ी आज़मी की कुछ मशहूर नज़्म, शेर और गीत    

साल 1919 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में जन्मे कैफ़ी आज़मी का असली नाम सैयद अतहर हुसैन रिज़वी था. कहते हैं हर शायर के अंदर कई किस्म के लोग सांस लेते हैं और ऐसा ही मंज़र कैफ़ी आज़मी के साथ था. जब उन्होंने वतन की मोहब्बत को लफ़्ज़ों में बांधना चाहा तब उनके कलम ने ‘कर चले हम फिदा, जान-ओ-तन साथियों’ जैसा नगमा दुनिया को दे दिया और जब इस शायर ने इश्क़ के पेचीदा मसाइल पर बात कहनी चाही तब उनके कलम ने ‘ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नही’ जैसा मशहूर और सुपरहिट गाने दुनिया को सराबोर कर दिया. Also Read - कैफी आजमी की जन्मशती के मौके पर होगी 'राग शायरी', शामिल होंगे ये स्टार्स

कैफ़ी साहब की ज़िंदगी में एक नज़्म ने भी ख़ास किरदार निभाई है. हैदराबाद में एक मुशायरे में जब कैफ़ी साहब इस नज़्म को पढ़ रहे थे तब एक हसीना ने अपनी मंगनी भी तोड़  दिया था. वो नज़्म थी ‘औरत’. Also Read - sridevi death amitabh bachchan tweeted kaife azmi shayari | श्रीदेवी को याद करके भावुक हुए अमिताभ बच्चन, कहा- तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई...

Kaifi Azmi Death Anniversary: औरत (नज़्म) –

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

क़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आज

हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आज

आबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आज

हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आज

जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

तेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहार

तेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदार

तेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदार

ता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ’य्युन का हिसार

कौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

तू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती है

तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है

पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है

बन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती है

ज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

ज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहीं

नब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहीं

उड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहीं

जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं

उस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

गोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए

फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए

क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए

ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए

रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं

तुझ में शो’ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहीं

तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं

तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं

अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकल

ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल

नफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकल

क़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकल

राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़

तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़

तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़

तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़

बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

तू फ़लातून ओ अरस्तू है तू ज़हरा परवीं

तेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मीं

हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबीं

मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं

लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे.

कैफ़ी आज़मी और उनकी पत्नी शौक़त आज़मी (फाइल फोटो)

यहां पढ़िए इस मौके पर कैफ़ी आज़मी की कुछ मशहूर रचनाएं:

Kaifi Azmi Death Anniversary: कुछ शेर-

1. बस इक झिजक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में

कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में

2. झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं

दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

3. इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद

4. बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमां जो बस गए

इंसां की शक्ल देखने को हम तरस गए

Kaifi Azmi Death Anniversary: गीत-

1. वक़्त ने किया क्या हंसीं सितम
तुम रहे न तुम हम रहे न हम
वक़्त ने किया…

बेक़रार दिल इस तरह मिले
जिस तरह कभी हम जुदा न थे
तुम भी खो गए, हम भी खो गए
एक राह पर चलके दो क़दम
वक़्त ने किया…

जाएंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम
वक़्त ने किया…

2. ये दुनिया ये महफ़िल
मेरे काम की नहीं – (२)

किसको सुनाऊँ हाल-ए-दिल बेक़रार का
बुझता हुआ चराग़ हूँ अपने मज़ार का
ऐ काश भूल जाऊँ मगर भूलता नहीं
किस धूम से उठा था जनाज़ा बहार का
ये दुनिया…

अपना पता मिले न खबर यार की मिले
दुश्मन को भी ना ऐसी सज़ा प्यार की मिले
उनको खुदा मिले है खुदा की जिन्हे तलाश
मुझको बस इक झलक मेरे दिलदार की मिले
ये दुनिया…

सहरा में आके भी मुझको ठिकाना न मिला
ग़म को भूलाने का कोई बहाना न मिला
दिल तरसे जिस में प्यार को क्या समझूँ उस संसार को
इक जीती बाज़ी हारके मैं ढूँढूँ बिछड़े यार को
ये दुनिया…

दूर निगाहों से आँसू बहाता है कोई
कैसे न जाऊँ मैं मुझको बुलाता है कोई
या टूटे दिल को जोड़ दो या सारे बंधन तोड़ दो
ऐ पर्बत रस्ता दे मुझे ऐ काँटों दामन छोड़ दो
ये दुनिया…