नई दिल्ली. बीते शुक्रवार को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान राफेल फाइटर विमान का मुद्दा छाया रहा. कांग्रेस की ओर खुद अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर इस मामले में झूठ बोलने का आरोप  लगाया तो सत्ता पक्ष ने कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर देश को गुमराह कर रही है. दोनों पक्षों ने एक दूसरे के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की बात कही है. भाजपा के कई नेताओं ने राहुल गांधी के खिलाफ तो कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश करने की बात कही है. अब सवाल उठता है कि ये विशेषाधिकार हनन होता क्या है? क्या सदन में ये प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के बाद राहुल गांधी और पीएम मोदी की संसद सदस्यता निरस्त कर दी जाएगी?

 

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क्या होता है विशेषाधिकार
हमारे संविधान के निर्माताओं ने संसदीय प्रणाली के तहत सांसदों को कुछ विशेषाधिकार दिए हैं, ताकि अल्पमत या बहुमत में रहने वाले दलों का कोई भी प्रतिनिधि जनता की बात को बेलाग-लपेट संसद में रख सके. इस अधिकार का मूल उद्देश्य है कि यह बहुमत में रहने वाली सरकार को बेलगाम होने से रोक सके. इसलिए जब कभी किसी संसद सदस्य को लगता है कि लोकसभा या राज्यसभा का कोई सदस्य अपने मूल कर्तव्य से भटक रहा है तो वह लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के सभापति के समक्ष विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव रखता है. संसद के विशेषाधिकार का उल्लंघन करने पर लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को यह अधिकार दिया गया है कि वह विभिन्न नियमों के तहत कार्रवाई करें.

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क्या कहता है नियम
लोकसभा रूल-बुक के 20वें अध्याय के नियम 222 के तहत विशेषाधिकार हनन के प्रस्ताव की व्याख्या की गई है. इस नियम के अनुसार, स्पीकर की सहमति लेने के बाद कोई भी सदस्य लोकसभा में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव रख सकता है. यह प्रस्ताव किसी सदस्य या सदन या फिर किसी कमेटी के खिलाफ लाया जा सकता है. लेकिन विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश करने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं. इसके तहत विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश करने के कम से कम 10 घंटे पहले अध्यक्ष को इसकी सूचना दी जानी चाहिए. वहीं, यह प्रस्ताव पुराना नहीं, बल्कि हाल की किसी घटना को लेकर और जिसमें सदन का हस्तक्षेप होना अनिवार्य हो, ऐसा होना चाहिए. तभी विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश करने की अनुमति दी जा सकती है. किसी सदस्य द्वारा प्रस्ताव लाने के बाद लोकसभा के अध्यक्ष इसकी अपने स्तर से जांच करते हैं और पेश करने लायक पाए जाने के बाद ही इसे मंजूरी देते हैं.

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विशेषाधिकार हनन के चर्चित प्रस्ताव
इंदिरा गांधी – वर्ष 1978 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव काफी चर्चित रहा है. दरअसल, आपातकाल के बाद चिकमंगलूर से चुनाव जीतने वाली इंदिरा गांधी के खिलाफ तत्कालीन गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह ने विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया था. चरण सिंह ने आपातकाल की जांच के लिए गठित जस्टिस शाह कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर यह प्रस्ताव पेश किया था. प्रस्ताव मंजूर हुआ और इंदिरा गांधी को सदन से निष्कासित कर दिया गया.

सुब्रमण्यम स्वामी – वर्तमान में भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी के खिलाफ वर्ष 1976 में राज्यसभा में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाया गया था. इसके तहत स्वामी पर कुछ विदेशी प्रकाशकों के साथ मिलकर देश-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था. इस प्रस्ताव के बाद स्वामी को सदन से निष्कासित कर दिया गया.

आर.के. करंजिया – संसद के विशेषाधिकार हनन के प्रस्तावों में मशहूर पत्रकार और ब्लिट्ज पत्रिका के संपादक आर.के. करंजिया का भी नाम प्रमुखता से लिया जाता है. करंजिया के खिलाफ वर्ष 1961 में लोकसभा में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाया गया था. उन पर आरोप लगाया गया था कि उनकी पत्रिका ब्लिट्ज में वरिष्ठ नेता जे.बी. कृपलानी के खिलाफ छवि खराब करने वाला लेख छापा गया. लोकसभा ने इस प्रस्ताव के तहत करंजिया को समन भेजा और उनकी भर्त्सना की. साथ ही ब्लिट्ज पत्रिका के लिए लोकसभा की प्रक्रिया का कवरेज करने वाले पत्रकार आर.के. राघवन का लोकसभा गैलरी-पास भी निरस्त कर दिया गया.