
Lalit Fulara
उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के सुदूर स्थित छोटे से गाँव 'पटास'में पैदाइश. कला-साहित्य में विशेष रुचि. पहला नॉवेल 'घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी' प्रकाशित. विगत 9 सालों से पत्रकारिता में ... और पढ़ें
Lekhak Se Miliye: इंडियाडॉटकॉम हिंदी के साहित्य को समर्पित विशेष कार्यक्रम ‘लेखक से मिलिये’ में इस बार लेखिका सोनाली मिश्रा से बातचीत की गई है. लव-जिहाद को पृष्ठभूमि बनाकर लिखा गया उनका उपन्यास ‘नेहा की लव स्टोरी’ चर्चित रहा है. सोनाली का एक कहानी संग्रह ‘डेस्डीमोना मरती नहीं’ और उपन्यास ‘महानायक शिवाजी’प्रकाशित हो चुका है. उनसे बातचीत के संपादित अंशों को पढ़िये.
सोनाली मिश्रा कहती हैं कि निकिता तोमर हत्याकांड के बाद उन्होंने लव -जिहाद की पृष्ठभूमि पर उपन्यास लिखने की सोची. एक लड़की को मार देना आने वाली पूरी पीढ़ी को बर्बाद कर देना है. समाज में कुछ गलत होता है तो लेखक को आवाज उठानी चाहिए. वह कहती हैं ‘आमतौर पर जब हम लव- जिहाद बोलते हैं तो एक बहुत ही छोटा- सा शब्द बोल देते हैं. ये लव-जिहाद नहीं है…लव जिहाद तो इसलिए बोलना पड़ता है क्योंकि हमारे लोगों को यह भाषा समझ आती है. यह शब्द समझ आता है. यह सदियों से हमारा सांस्कृतिक ध्वंस हो रहा है. व्यवस्थित तौर पर हमें ध्वंस किया जा रहा है.
सोनाली कहती हैं ‘लड़कियों का मतलब पीढ़ी है. अचानक से कोई आता है जो हमारी तहजीब का नहीं है, हमारी संस्कृति का नहीं है, वो आकर हमारी बेटी के ऊपर कब्जा कर लेता है. इस वजह से यह उपन्यास लिखना पड़ा. सोनाली मिश्रा अपने इस उपन्यास की कहानी को एक महिला एंकर नेहा के जरिए कहती हैं. नेहा उनके उपन्यास की मुख्य पात्र है. जब उनसे पूछा गया कि लव-जिहाद को पृष्ठभूमि बनाने के लिए आपने मुख्य किरदार महिला न्यूज़ एंकर को ही क्यों चुना? वह कहती हैं- आजकल एक न्यूज़ एंकर की आवाज़ साहित्यकार के बनिस्बत ज़्यादा सुनी जाती है. मेरी नायिका नेहा का उद्गम साहित्य से ही हुआ है और वो साहित्य से जुड़ी गतिविधियों को कवर करती है. विचार चाहे मीडिया में हो या साहित्य में विचार, विचार हैं.
सांस्कृतिक ध्वंस में क्या साहित्य की भूमिका है? प्रश्न के जवाब में सोनाली कहती हैं – बहुत बड़ी भूमिका है. सांस्कृतिक ध्वंस में साहित्य की भूमिका इसलिए है क्योंकि सारा निर्माण तो साहित्य कर रहा है. बाद में कहती हैं मेरा मतलब वामपंथी साहित्य से है. वह कहती हैं कि कोई भी सभ्यता, तब नष्ट होती है, जब आप उस सभ्यता के पुरुषों को विमर्श के माध्यम से इतना कमजोर कर देते हैं कि वो अपने शत्रुओं से लड़ न पाएं.
‘नारीवादियों से ऐसी क्या चिढ़ है आपको? पूछे जाने पर सोनाली मिश्रा कहती हैं ‘नारीवादियों से मेरी चिढ़ इसलिए है क्योंकि जो सो-कॉल्ड फेमिनिज्म है वो हमारी लड़कियों को गुलाम बनाता है. ‘आपने सोच रखा है कि सारी नारीवादी समर्थक लड़कियों को विरोधी बनाना है.’ पूछने पर कहती हैं- नहीं. ऐसा कुछ नहीं. स्त्री की प्रवृत्ति अलग है और पुरुष की अलग.अब आप बोलो पुरुष गर्भाधान क्यों नहीं कर सकता? अरे ये तो प्रकृति प्रदत्त है . अब लड़कियों की दाढ़ी- मूछें निकल आएंगी तो कितनी बुरी लगेंगी? सौंदर्य बोध कहां गया? ‘आप खुद ही कुछ वक्त पहले तक नारीवादी थी क्या?’ के जवाब में सोनाली कहती हैं- नहीं मैं नारीवादी नहीं थी. कभी नहीं.. मैं थोड़ा- सा प्रोग्रेसिव थी यह मान सकते हैं.
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