नई दिल्ली. भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के अनुसार, दो विपरीत लिंगों के बीच ही शारीरिक संबंध संभव है. सुप्रीम कोर्ट ने आज इस कानून को गैर-कानूनी करार दे दिया है. साथ ही कहा है कि देश में मौजूद समलैंगिकों के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए. सामान्य स्त्री-पुरुषों की तरह समलैंगिक व्यक्तियों को भी जीने का अधिकार है. दरअसल, भारत में समलैंगिकता को लेकर पिछले करीब एक दशक से बहस चल रही है. वर्ष 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में इसे अपराध नहीं माना, लेकिन 4 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे दोबारा अपराध की श्रेणी में लाकर रख दिया. 2017 में एक बार फिर समलैंगिकता पर बहस शुरू हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे निजता के अधिकार के तहत रेखांकित किया. इसके बाद समलैंगिक अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसमें समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने वाली IPC की धारा 377 की वैधानिकता पर ही सवाल उठाए गए. इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए आज सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को अवैधानिक यानी गैर कानूनी करार दिया है. समलैंगिकता को लेकर सिर्फ भारत ही नहीं, अभी दुनियाभर में बहस हो रही है. दुनिया के 25 से ज्यादा देशों ने समलैंगिकों के बीच शादी को कानूनी तौर पर मान्यता दे दी है. वहीं संयुक्त राष्ट्रसंघ के मुताबिक विश्व के 76 देशों में इसको लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं है. Also Read - कोरोना के कारण मजदूरों का पलायन: कोर्ट ने तलब की रिपोर्ट, डर दहशत को बताया वायरस से भी बड़ी समस्या

इन देशों में समलैंगिकों की शादी को है मान्यता
भारत में जहां समलैंगिकों को अपने अधिकारों के लिए पिछले कई वर्षों से संघर्ष करना पड़ रहा है और अब जाकर सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को खत्म करने का आदेश दिया है. वहीं दुनिया के 25 से ज्यादा ऐसे देश हैं जहां समलैंगिकों की शादी को बहुत पहले ही मान्यता मिल चुकी है. बेल्जियम ने वर्ष 2003 में ही समलैंगिकों के बीच शादी को अपने यहां कानूनी मान्यता दे दी थी. वहीं अमेरिका में इसे 2015 में तो इंग्लैंड में वर्ष 2013 में कानूनी मान्यता दी गई. Also Read - सात महीने की हिरासत के बाद रिहा होंगे उमर अब्दुल्ला, जम्मू-कश्मीर सरकार ने जारी किए आदेश

ये है लिस्ट
अर्जेंटीना
ग्रीनलैंड
दक्षिण अफ्रीका
ऑस्ट्रेलिया
आइसलैंड
स्पेन
बेल्जियम
आयरलैंड
अमेरिका
ब्राजील
लक्जमबर्ग
स्वीडन
कनाडा
माल्टा
कोलंबिया
उरुग्वे
डेनमार्क
नीदरलैंड
इंग्लैंड
न्यूजीलैंड
फिनलैंड
नॉर्वे
फ्रांस
पुर्तगाल
जर्मनी
स्कॉटलैंड Also Read - Coronavirus: सुप्रीम कोर्ट भी लॉकडाउन, वकीलों के चैम्बर हुए बंद, जरूरी मामलों की ही होगी सुनवाई

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संविधान पीठ ने दिया इस मामले पर निर्णय
LGBT यानी लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल और ट्रांसजेंडर के मामले पर 5 जजों की संविधान पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले को बदल दिया है. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच में जस्टिस आर. एफ. नरीमन, जस्टिस ए. एम. खानविलकर, जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और जस्टिस इन्दु मल्होत्रा शामिल थीं. पीठ के फैसले के बाद अब समलैंगिकों को भी बाकी नागरिकों की तरह देश में समान अधिकार मिलेगा. कोर्ट ने कहा कि 377 अतार्किक और मनमानी धारा है. अंतरंगता और निजता निजी पसंद हैं. LGBT समुदाय को भी बाकी नागरिकों की तरह अधिकार प्राप्त हैं. धारा 377, संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत प्राप्त समानता के अधिकार का हनन करता है. कोर्ट ने कहा, यौन प्राथमिकता जैविक और प्राकृतिक है. कोई भेदभाव मूल अधिकारों का हनन है. समलैंगिकता को अपराध न मानने की मांग करने वाली याचिकाओं का विरोध कर रहे पक्षकारों ने अदालत से आग्रह किया था कि धारा 377 का भविष्य संसद पर छोड़ दिया जाए. वहीं केंद्र की मोदी सरकार ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर किया जाए या नहीं, यह फैसला सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया था.