नई दिल्ली. पिछले लगभग 9 वर्षों से सार्वजनिक जीवन से हटकर सिर्फ एक बिस्तर पर सिमटकर रह गए समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस को भूल तो नहीं गए आप! वैसे, जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेताओं को भूले नहीं होंगे आप? ऐसे नेताओं को कोई भूलता भी नहीं. जॉर्ज देश के ऐसे नेता रहे हैं जिनकी एक आवाज पर सैकड़ों-हजारों लोग जमा हो जाते थे. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की इमरजेंसी की याद आते ही जॉर्ज की याद आपको जरूर आएगी. जॉर्ज अभी बीमार हैं. वे अल्जाइमर जैसी लाइलाज बीमारी से ग्रस्त हैं. रविवार को इन्हीं जॉर्ज फर्नांडिस का जन्मदिन था. राजनीतिक जीवन में रहते हुए ताम-झाम से दूर रहने वाले जॉर्ज फर्नांडिस का रविवार को 88वां जन्मदिन भी बगैर किसी आडंबर के मना. हां, पूर्व उप-प्रधानमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी इस बीमार नेता से मिलने जरूर पहुंचे. जॉर्ज को ‘बागी नेता’ बताते हुए आडवाणी ने कहा कि देश को जॉर्ज फर्नांडिस जैसे बागी नेताओं की जरूरत हमेशा रहती है. देश की प्रगति और विकास के लिए ऐसे बागी नेताओं को आते रहना चाहिए. Also Read - Babri Demolition Case: 28 सालों में बदल गई राजनीति की दुनिया, इन तस्वीरों के जरिए याद कीजिए बीता वक्त

जॉर्ज फर्नांडिस की याद में वेबसाइट लॉन्च
भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जॉर्ज फर्नांडिस के जन्मदिन के मौके पर उन्हें समर्पित एक वेबसाइट- georgefernandes.org लॉन्च की. इस मौके पर पूर्व उप-प्रधानमंत्री ने कहा कि जॉर्ज जैसे नेताओं के बगैर देश की प्रगति संभव नहीं. आडवाणी ने जॉर्ज फर्नांडिस के दिल्ली के पंचशील पार्क स्थित आवास पर उनसे मुलाकात की. अपने पुराने साथी से मिलने के बाद आडवाणी ने कहा, ‘वह एक शानदार व्यक्ति हैं.’ आडवाणी ने वेबसाइट ‘जार्ज एक याद’ लांच के बाद कहा, ‘मैं कई वर्षों तक संसद में उनके साथ रहा. वह शानदार व्यक्ति हैं. बागी नेताओं की हमेशा जरूरत होती है. उनके बिना कुछ नहीं होता.’ उन्होंने कहा, ‘अगर कोई बागी नहीं होता तो देश को आजादी नहीं मिली होती. जार्ज जैसे बागी नेताओं को आते रहना चाहिए, ताकि देश प्रगति और विकास कर सके.’ Also Read - Babri Verdict: बाबरी मस्जिद मामले में बड़ा फैसला, आडवाणी-जोशी समेत सभी आरोपी बरी- ढांचा विध्वंस सुनियोजित नहीं

इमरजेंसी से लेकर केंद्रीय मंत्री तक का दमदार सफर
1970 के शुरुआती दशक में रेल मजदूर आंदोलन से देशभर में चर्चा में आए जॉर्ज फर्नांडिस अगले कुछ वर्षों में विपक्ष का बड़ा चेहरा बन चुके थे. समाजवादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार को लेकर उनका नाम बड़े नेताओं में शुमार किया जाने लगा था. यही वजह है कि वर्ष 1975 में जब देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की गई, उस समय विपक्ष के लगभग सभी नेताओं को जेल में डाल दिया गया. जॉर्ज फर्नांडिस पर सरकार ने बड़ौदा डायनामाइट कांड को लेकर मुकदमा कर दिया गया. इस कारण कई महीनों तक उन्हें भूमिगत रहना पड़ा. कुछ महीनों बाद जॉर्ज फर्नांडिस गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें दिल्ली के तिहाड़ जेल में अन्य नेताओं के साथ भेज दिया गया. उस समय जॉर्ज के हाथों में हथकड़ी वाली तस्वीर बड़ी चर्चित हुई थी. आज भी इमरजेंसी का जिक्र छिड़ने पर इस तस्वीर आपकी नजर चली ही जाएगी. बहरहाल, इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी की सरकार चली गई और जनता पार्टी की सरकार में जॉर्च को मंत्री पद दिया गया. अपने पूरे राजनीतिक जीवन में तेज-तर्रार छवि वाले जॉर्ज ने बाद के दिनों में समता पार्टी बनाई. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे रक्षा मंत्री बनाए गए. जॉर्ज फर्नांडिस देश के ऐसे पहले रक्षा मंत्री थे जो बर्फीली सियाचिन की चोटियों पर सेना के जवानों से मिले थे. Also Read - Babri Verdict Live Updates: बाबरी विध्वंस पर फैसला- आडवाणी, जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह सहित सभी आरोपी बरी

जॉर्ज फर्नांडिस अपने सहयोगियों के साथ. (फोटो साभारः जॉर्जफर्नांडिस.ओआरजी)

जॉर्ज फर्नांडिस अपने सहयोगियों के साथ. (फोटो साभारः जॉर्जफर्नांडिस.ओआरजी)

 

जॉर्ज फर्नांडिस की बारे में और बातें
1- भारतीय संसद की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार इनका जन्म मैंगलोर में 3 जून 1930 को हुआ.

2- जॉर्ज फर्नांडिस 10 भाषाओं के जानकार हैं – हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, मराठी, कन्नड़, उर्दू, मलयाली, तुलु, कोंकणी और लैटिन. उनकी मां किंग जॉर्ज फिफ्थ की बड़ी प्रशंसक थीं. उन्हीं के नाम पर अपने छह बच्चों में से सबसे बड़े का नाम उन्होंने जॉर्ज रखा.

3- मंगलौर में पले-बढ़े फर्नांडिस जब 16 साल के हुए तो एक क्रिश्चियन मिशनरी में पादरी बनने की शिक्षा लेने भेजे गए. पर चर्च में पाखंड देखकर उनका उससे मोहभंग हो गया. उन्होंने 18 साल की उम्र में चर्च छोड़ दिया और रोजगार की तलाश में बंबई (अब मुंबई) चले आए.

4- जॉर्ज खुद बताते हैं कि इस दौरान वे मुंबई चौपाटी की बेंच पर सोया करते थे और लगातार सोशलिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन आंदोलन के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे. जॉर्ज फर्नांडिस की शुरुआती छवि एक विद्रोही की थी. उस वक्त मुखर वक्ता राम मनोहर लोहिया, फर्नांडिस की प्रेरणा थे.

5- 1950 आते-आते वे टैक्सी ड्राइवर यूनियन के बेताज बादशाह बन गए. बिखरे बाल, और पतले चेहरे वाले फर्नांडिस, तुड़े-मुड़े खादी के कुर्ते-पायजामे, घिसी हुई चप्पलों और चश्मे में खांटी एक्टिविस्ट लगा करते थे. कुछ लोग तभी से उन्हें ‘अनथक विद्रोही’ (रिबेल विद्आउट ए पॉज़) कहने लगे थे. जंजीरों में जकड़ी उनकी एक तस्वीर इमरजेंसी की पूरी कहानी बयां करती है.

(इनपुट – एजेंसी)