नई दिल्ली. बिहार का मिथिला क्षेत्र अपनी संस्कृति, परंपरा, सामाजिक आचार-विचार और प्राचीन धरोहरों के लिए जाना जाता है. वहीं, साहित्यिक रूप से भी मिथिला का इतिहास समृद्ध रहा है. साहित्य और संस्कृति हमारी वैभवशाली परंपरा को प्रकट करने के माध्यम हैं. इसी परंपरा को मिथिला क्षेत्र में फिर से जीवंत बनाने की पहल हो रही है, मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल (Madhubani Literature Festival) के रूप में. साल के आखिरी महीने में तीन दिवसीय साहित्यिक कुंभ का आयोजन मधुबनी के राजनगर में होने वाला है. राजनगर, दरभंगा रियासत की पुरानी राजधानी रही है. दरभंगा महाराज के पुराने महलों के भग्नावशेष यहां की ऐतिहासिक समृद्धि का आज भी बखान करते नजर आते हैं. लेकिन सरकार की अनदेखी से यह महल आज खंडहर हो चले हैं. इसी राजनगर में 19 से 21 दिसंबर तक मधुबनी लिटरेचल फेस्टिवल का आयोजन किया जाने वाला है. कार्यक्रम के आयोजन से जुड़ीं प्रो. सविता झा खान कहती हैं कि इस कार्यक्रम के जरिए हम मिथिला के सांस्कृतिक पहलुओं और प्राचीन धरोहर से देश-दुनिया को अवगत कराना चाहते हैं. मिथिला साहित्य, कला, लोक परंपरा, पाक प्रणाली, जीवनशैली के साथ-साथ न्याय और दर्शन की भूमि रही है. मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल मिथिला की इन्हीं विशेषताओं पर प्रकाश डालने की एक पहल है.

अपनी संस्कृति को जानने की कोशिश
मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल का मुख्य उद्देश्य मिथिला की समृद्ध संस्कृति एवं लोक परंपरा से दुनिया को अवगत कराना है. फेस्टिवल की आयोजक प्रो. सविता झा खान ने India.com के साथ बातचीत में बताया, ‘मिथिला की संस्कृति प्राचीन काल से ही विशिष्ट रही है. यहां की जीवनशैली, परंपराएं, त्योहार, समारोह सभी अपने आप में विशिष्ट महत्व लिए हुए होते हैं. लेकिन इन विशिष्टताओं की हमेशा से अनदेखी की गई. यही वजह है कि सिवाए मिथिला पेंटिंग या मधुबनी पेंटिंग को छोड़, मिथिला की अन्य विशिष्टताओं को भुला दिया गया. यहां के धरोहर, खंडहरों में बदल गए.’ मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल के राजनगर में आयोजन की वजह की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा, ‘मधुबनी का नाम तो देश-दुनिया के लोग पहले से ही मधुबनी पेंटिंग या मिथिला पेंटिंग के कारण जानते हैं. लेकिन जिला मुख्यालय के करीब स्थित राजनगर, जो कभी एक रियासत की राजधानी रह चुका है, उसके बारे में लोगों को जानकारी नहीं है.’

Rajnagar

प्रो. खान ने मिथिला में पर्यटन उद्योग के विकास की संभावनाओं की ओर ध्यान दिलाते हुए बताया, ‘राजनगर में स्थित नौलखा महल बिहार के महत्वपूर्ण धरोहरों में से एक है. इसे इसके मूल स्वरूप में बचाया जाता तो मिथिला में भी पर्यटन उद्योग पनपता. जिस तरह राजस्थान में वहां के महलों और स्थानों की देखरेख की गई, अगर राजनगर के नौलखा महल की भी देखरेख की जाती तो आज पर्यटन उद्योग के जरिए सैकड़ों-हजारों लोगों को रोजगार मिलने के साथ-साथ मिथिला का नाम भी दुनिया के पर्यटन नक्शे पर होता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल मिथिला के ऐसे ही धरोहरों को बचाने और इस क्षेत्र के विकास के लिए कदम बढ़ाने की कवायद है.’

राजनैतिक नहीं, समाज का फेस्टिवल
मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों के अनुसार, यह कार्यक्रम न तो राजनीतिक है और न ही सरकार की मदद लेकर किया जा रहा है. कार्यक्रम के आयोजन से जुड़ी प्रो. खान कहती हैं, ‘मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल मिथिला के धरोहर, उसकी संस्कृति और परंपरा को बचाने की दिशा में एक पहल है. बिना जनसहभागिता के यह काम पूरा नहीं हो सकता. इसलिए फेस्टिवल में साहित्य, संस्कृति और कला जैसे विषयों से जुड़े विशेषज्ञों, वक्ताओं और विचारकों को आमंत्रित किया जाएगा. यह कार्यक्रम मिथिला क्षेत्र के धरोहरों के प्रति सरकार की लगातार अनदेखी का एक प्रतीक बने, इसके मद्देनजर ही इस कार्यक्रम में न तो किसी राजनेता को बुलाया जाएगा और न ही सरकार के किसी मंत्री या विधायक-सांसद को. हां, प्रशासन और सरकार से जुड़े लोगों को एक पैनल-कार्यक्रम के लिए जरूर बुलाने की कोशिश रहेगी, जहां वे मिथिला की जनता के सवालों का जवाब देंगे कि आखिर क्यों इतने दिनों तक मिथिला की अनदेखी की गई.’ उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम से दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और देश के तमाम विश्वविद्यालयों के छात्रों और शिक्षकों को जोड़ा जा रहा है, ताकि उनके माध्यम से मिथिला की लोक संस्कृति का प्रचार-प्रसार हो सके. प्रो. खान ने कहा कि इस कार्यक्रम में इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स (IGNCA) से भी सहयोग लेने को लेकर बात चल रही है.

सिर्फ साहित्य नहीं, खान-पान और रहन-सहन पर भी ध्यान
मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल, नाम से तो साहित्यिक समारोह की तरह लगता है, लेकिन यह कार्यक्रम मिथिला की अनोखी विरासत और परंपरा की झलक भी अपने भीतर समेटे हुए है. प्रो. खान कहती हैं कि फेस्टिवल में सिर्फ साहित्य की ही चर्चा नहीं होगी, बल्कि कार्यक्रम में आने वाले लोगों का परिचय मिथिला के उद्योग (चूड़ी-लहठी), हैंडीक्राफ्ट आदि से भी कराया जाएगा. सम्मेलन में आने वालों को मिथिला की अनोखी जीवनशैली और खान-पान की समृद्ध विरासत से रूबरू होने का मौका मिलेगा. उन्होंने कहा, ‘मिथिला में सिर्फ मधुबनी पेंटिंग ही एकमात्र लोक कला नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र लोक कलाओं और कलाकारों से भरा हुआ है. शास्त्रीय संगीत में दरभंगा का अमता घराना (ध्रुपद गायन) दुनियाभर में प्रसिद्ध है. यहां के चूड़ी-लहठी उद्योग, मखाना उद्योग, सीकी कला से भी सब वाकिफ हैं. इन्हें संरक्षण देने और प्रचार-प्रसार की जरूरत है. सम्मेलन में आने वालों को एक जगह पर ये सारी विशेषताएं देखने को मिलेंगी.’ प्रो. खान ने बताया कि मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल में कई भाषाओं के विद्वानों को आमंत्रित किया जाएगा, लेकिन प्रमुखता मैथिली को दी जाएगी. इस सम्मेलन में तीन भाषाओं- मैथिली, हिन्दी और अंग्रेजी के विद्वान आएंगे.