1> जो कौम भूखी मारे जाने पर जाकर सिनेमाहाल में बैठ जाए, वह अपने दिन कैसे बदलेगी.
2> अच्छी आत्मा फोल्डिंग कुर्सी की तरह होनी चाहिए. जब जरूरत पड़ी तब फैलाकर बैठ गए. नहीं तो मोड़कर कोने से टिका दिया.
3> शासन का घूंसा किसी बड़ी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है पर न जाने किस चमत्कार से बड़ी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूंसा पड़ जाता है.

देश की राजनीति में आज भी प्रासंगिक इन तीन व्यंग्य के कई मायने हैं. लेकिन हम इसकी बात मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में होशंगाबाद सीट को लेकर कर रहे हैं. यह वही सीट है जो साल 2003 के परिसीमन से पहले इटारसी विधानसभा सीट के नाम से जानी जाती थी. इटारसी का नाम सामने आते ही हमारे जेहन में एक नाम आता है जिसने अपने व्यंग्य से सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और धार्मिक कुरीतियो पर चुटीले अंदाज में गंभीर चोट करता रहा है. 22 अगस्त 1924 को वह होशंगाबाद जिले के इटारसी में ही पैदा होता है और व्यंग्य को मनोरंजन की परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से स्थापित किया है. वह भी ऐसे प्रश्न जो उनके निधन के 23 साल भी वैसे ही प्रासंगिक हैं मानो अभी ही लिख रहे हों. हम बात कर रहे हैं हरिशंकर परसाई की.

हरिशंकर परसाई को व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाने का श्रेय जाता है. वह सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, परंपरावादी और धार्मिक व्यवस्था की खोखली परखनली में पिसते मध्यमवर्गीय आबादी की सच्चाइयों को न सिर्फ करीब से पकड़ते हैं, बल्कि इस गंभीर विषय के भार को उठाए हल्के अंदाज में इस पर चोट भी करते हैं. हमारे द्वारा तैयार समाज में रोज बढ़ रही विषमताओं पर जिस तरह से उन्होंने प्रहार किया है, वह उन्हें अमर कर देता है. उन्होंने विवेक और विज्ञान सम्मत दृष्टि से मुद्दों पर बात की, जिससे वह लोगों के अपने बनते चले गए.

18 साल की उम्र में वन विभाग में नौकरी शुरू करने वाले परसाई ने साल 1941 से 1943 तक जबलपुर में स्पेस ट्रेनिंग कॉलेज में शिक्षण की उपाधि ली. साल 1942 से मॉडल हाईस्कूल में पढ़ाने लगे, लेकिन साल 1952 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी. साल 1957 में नौकरी छोड़कर स्वतंत्र लेखन की शुरुआत और यह अंतिम दिनों तक जारी रहा. उनका साहित्य वर्तमान से मुठभेड़ करता हुआ दिखता है.

> जिन्हें पसीना सिर्फ गर्मी और भय से आता है, वे श्रम के पसीने से बहुत डरते हैं.
> अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ़ बैठता है तब गोरक्षा आंदोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं.
> कैसी अद्भुत एकता है. पंजाब का गेहूं गुजरात के कालाबाजार में बिकता है और मध्यप्रदेश का चावल कलकत्ता के मुनाफाखोर के गोदाम में भरा है. देश एक है. कानपुर का ठग मदुरई में ठगी करता है. हिंदी भाषी जेबकतरा तमिलभाषी की जेब काटता है और रामेश्वरम का भक्त बद्रीनाथ का सोना चुराने चल पडा है. सब सीमाएं टूट गईं.
> सरकार कहती है कि हमने चूहे पकड़ने के लिए चूहेदानियां रखी हैं. एकाध चूहेदानी की हमने भी जांच की. उसमे घुसने के छेद से बड़ा छेद पीछे से निकलने के लिए है. चूहा इधर फंसता है और उधर से निकल जाता है. पिंजड़े बनाने वाले और चूहे पकड़ने वाले चूहों से मिले हैं. वे इधर हमें पिंजड़ा दिखाते हैं और चूहे को छेद दिखा देते हैं. हमारे माथे पर सिर्फ चूहेदानी का खर्च चढ़ रहा है.

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आप हरिशंकर परसाई को पढ़ेंगे तो लगेगा आज की ही बात कर रहे हैं क्या. उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन की परखनली में तली से ढक्कन तक भरे भ्रष्टाचार एवं शोषण पर करारा व्यंग्य किया है. वह हमेशा से अपनी लेखनी को एक सामाजिक कर्म के रूप में परिभाषित करते रहे. 2003 में परिसीमन के बाद इटारसी विधानसभा खत्म कर दी गई और सोहागपुर के नाम से नई विधानसभा बना दी गई. इटारसी को होशंगाबाद के साथ ही जोड़ दिया गया. साल 1957 से ये सीट ब्राह्मण बाहुल सीट के रूप में जानी जाती है. यहां से ज्यादातर इसी जाति से विधायक बने.
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होशंगाबाद सीट पर कैंडिडट
बीजेपी ने इस बार विधायक डॉ. सीतारसन शर्मा को उम्मीदवार बनाया है. वहीं, कांग्रेस ने सरताज सिंह को मैदान में उतारा है. बीएसपी ने विनोद लोंगरे को मैदान में उतारकर चुनाव दिलचस्प बना दिया है. जिस सीट पर 2013 में सिर्फ 5 प्रत्याशी मैदान में थे, वहां इस बार 14 प्रत्याशी मैदान में हैं.