नई दिल्ली: शब्दों की दुनिया में एक जादूगर ने जन्म लिया. उसने शब्दों को कुछ इस तरह वश में किया कि पूरी दुनिया मुरीद हो गई. हिन्दी का कुनबा काफी बड़ा है और इसमें कई दिग्गज हस्तियों ने करिश्माई उपन्यास और कहानियां लिखी हैं. लेकिन इनमें एक बेहद अलहदा व्यक्ति ने खुद को हिन्दी कहानियों का पर्याय बनाया. हम बात कर रहे हैं ईदगाह और नमक का दारोगा जैसी ऐतिहासिक कहानियों को लिखने वाले मुंशी प्रेमचंद की. आज उनका जन्मदिन है.

मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस के लमही में हुआ था. उनका बचपन कठिनाइयों भरा रहा. महज 8 साल की उम्र में मां को खोने के बाद मुंशी जी की जिंदगी ने करवट बदली. उनके पिता अजायब राय ने बच्चों की देखभाल के लिए दूसरी शादी कर ली. लेकिन मुंशी जी को सौतेली मां का प्यार नहीं मिल पाया. इस घटना के बाद एक और बड़ी जिम्मेदारी मुंशी के कंधों पर आ गयी. दरअसल 13 साल की उम्र में ही उनकी शादी कर दी गई, जो कि असफल रही. हालांकि इसके बाद उनकी दूसरी शादी हुई.

मुंशी जी के पिता का नाम अजायबराय और माता का नाम आनंदी देवी था. पिता लमही गाव में ही डाकघर के मुंशी थे. मुंशी प्रेमचन्द का वास्तविक नाम धनपतराय श्रीवास्तव था, लेकिन इन्हें मुंशी प्रेमचन्द और नवाब राय के नाम से ज्यादा जाना गया.

हमारे देश में एक कहावत प्रचलित है कि तप कर ही सोना कुंदन बनता है. यह कहावत मुंशी जी पर सटीक बैठती है. असल में वो बचपन में ही संघर्ष से वाकिफ हो गए थे और इन परिस्थितियों में कहानियां लिखनी शुरू कर दीं. मुंशी जी ने शुरुआत में कई छोटी-मोटी कहानियां लिखीं और फिर उम्र और समझ के बढ़ने के साथ-साथ दायरा भी बढ़ता गया. उन्होंने करीब 300 लघु कथाएं और 15 उपन्यास लिखे हैं. इसके अलावा कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया.

मुंशी प्रेमचंद की कई कहानियां अमर हैं, जिनमें नमक का दारोगा, ईदगाह, दो बैलों की कथा, पूस की रात और नरक का मार्ग अहम हैं. इसके अलावा उन्होंने 1918 में सेवासदन, 1925 में रंगभूमि और 1936 में गोदान जैसे बड़े और कालजयी उपन्यास भी लिखे.