हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह नहीं रहे. वह 92 वर्ष के थे. दिल्ली के एम्स अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. पिछले कुछ दिनों से नामवर अस्वस्थ चल रहे थे. नामवर सिंह हिंदी के ब्रांड एम्बेसेडर थे. हिंदी साहित्य में उन्होंने कविताएं, कहानियां, आलोचनाएं, विचारधाराएं कई सारी चीजें लिखी हैं. नामवर सिंह ने ना सिर्फ साहित्य की दुनिया में अपना खासा योगदान दिया है बल्कि शिक्षण के क्षेत्र में भी उनका काफी योगदान है. हिंदी में आलोचना को नई विधा देने वाले नामवर सिंह ही थे. हालांकि उन्होंने कई कविताओं की रचना भी की है. आईए पढ़ते हैं उनकी कुछ बेहतरीन कविताएं-

पथ में साँझ
पहाड़ियाँ ऊपर
पीछे अँके झरने का पुकारना ।

सीकरों की मेहराब की छाँव में
छूटे हुए कुछ का ठुनकारना ।

एक ही धार में डूबते
दो मनों का टकराकर
दीठ निवारना ।

याद है : चूड़ी की टूक से चाँद पै

तैरती आँख में आँख का ढारना ?

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फागुनी शाम

फागुनी शाम

अंगूरी उजास

बतास में जंगली गंध का डूबना

ऐंठती पीर में

दूर, बराह-से

जंगलों के सुनसान का कूंथना.

बेघर बेपरवाह

दो राहियों का

नत शीश

न देखना, न पूछना.

शाल की पंक्तियों वाली

निचाट-सी राह में

घूमना घूमना घूमना.

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नभ के नीले सूनेपन में
हैं टूट रहे बरसे बादर
जाने क्यों टूट रहा है तन !

बन में चिड़ियों के चलने से
हैं टूट रहे पत्ते चरमर
जाने क्यों टूट रहा है मन !

घर के बर्तन की खन-खन में
हैं टूट रहे दुपहर के स्वर
जाने कैसा लगता जीवन !

फाइल फोटो

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कभी जब याद आ जाते

नयन को घेर लेते घन,

स्वयं में रह न पाता मन

लहर से मूक अधरों पर

व्यथा बनती मधुर सिहरन

न दुःख मिलता न सुख मिलता

न जाने प्राण क्या पाते!

तुम्हारा प्यार बन सावन,

बरसता याद के रसकन

कि पाकर मोतियों का धन

उमड़ पड़ते नयन निर्धन

विरह की घाटियों में भी

मिलन के मेघ मंड़राते।

झुका-सा प्राण का अंबर,

स्वयं ही सिंधु बन-बनकर

ह्रदय की रिक्तता भरता

उठा शत कल्पना जलधर.

ह्रदय-सर रिक्त रह जाता

नयन-घट किंतु भर आते

कभी जब याद आ जाते.

उनये उनये भादरे
बरखा की जल चादरें
फूल दीप से जले
कि झुरती पुरवैया की याद रे
मन कुएँ के कोहरे-सा रवि डूबे के बाद इरे।

भादरे।

उठे बगूले घास में
चढ़ता रंग बतास में
हरी हो रही धूप
नशे-सी चढ़ती झुके अकास में
तिरती हैं परछाइयाँ सीने के भींगे चास में

घास में।

(साभार-hindisamay.com)

बता दें, नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई 1926 को वाराणसी के एक गांव जीयनपुर (वर्तमान में ज़िला चंदौली) में हुआ था. उन्होंने बीएचयू से हिंदी साहित्य में एमए और पीएचडी की डिग्री प्राप्त की. उन्होंने बीएचयू, सागर एवं जोधपुर विश्वविद्यालय और जेएनयू में पढ़ाया.साहित्य अकादमी सम्मान से नवाजे जा चुके नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य में आलोचना को एक नया आयाम दिया. ‘छायावाद’, ‘इतिहास और आलोचना’, ‘कहानी नयी कहानी’, ‘कविता के नये प्रतिमान’, ‘दूसरी परम्परा की खोज’ और ‘वाद विवाद संवाद’ उनकी प्रमुख रचनाएं हैं. उन्होंने हिंदी की दो पत्रिकाओं ‘जनयुग’ और ‘आलोचना’ का संपादन भी किया.