ललितपुर (यूपी): कुलदीप और पूजा दोनों ही डॉक्टर हैं. जिला ललितपुर के मड़ावरा स्वास्थ्य केंद्र पर कार्यरत कुलदीप रात में ड्यूटी करते हैं, जबकि मड़ावरा के ही स्वास्थ्य केंद्र पर प्रसूति विभाग में तैनात पूजा दिन में ड्यूटी करती हैं. दोनों की करीब तीन साल की एक बच्ची है. बच्ची की दिन में देखभाल करने के लिए डॉ. कुलदीप रात में ड्यूटी करते हैं, जबकि दिन में डॉ. पूजा बच्ची को संभालती हैं. परिवार और चिकित्सकीय सेवा दोनों की जिम्मेदारी ऐसी है कि एक ही घर में रहते हुए भी डॉक्टर पति-पत्नी बिना अवकाश के दिन एक दूसरे से ठीक से मिल भी नहीं पाते. डॉक्टर दम्पति के सामने कोरोना काल में ये चुनौती और भी बड़ी हो गई है. ड्यूटी के लौटने के बाद वह चाहते हैं कि बच्ची दूर रहे, लेकिन एहतियात बरतने के बीच बच्ची मजबूरन आसपास रहती ही है. Also Read - लॉकडाउन में मानसून को मिस कर रहे सचिन तेंदुलकर ने लोगों से पूछी उनकी कहानी

डॉक्टर्स का किसी की भी ज़िन्दगी में क्या और कैसा महत्व है, इसका न जाने कितनी बार बखान किया जाता है, बताया जाता है. सेवा और त्याग की कई कहानियाँ हमें पता चल जाती हैं, तो पूजा और कुलदीप जैसे कई किस्से हम तक नहीं पहुँच पाते. आज डॉक्टर्स डे है. ऐसे मौके पर चिकित्सकों के संघर्ष को याद किया ही जाना चाहिए. Also Read - प्रणब मुखर्जी की हालत नाजुक, शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कहा- भगवान उनके लिए सबकुछ अच्छा करेगा

कोरोना काल में दोगुनी हुई चुनौती
डॉ. कुलदीप डॉ. एम्स, दिल्ली में कार्यरत रह चुके हैं. वह इन दिनों ललितपुर जनपद के मड़ावरा स्वास्थ्य केंद्र में कार्यरत हैं. डॉ. कुलदीप विदेश से और डॉ. पूजा रुहेलखंड यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस हैं. दोनों की 2015 में शादी हुई. 2017 में बच्ची हुई. इसके कुछ माह बाद ही डॉ. कुलदीप को मड़ावरा में तैनाती मिली तो डॉ. पूजा को मऊरानीपुर में. ड्यूटी के बीच बच्ची को संभालना पहले भी चुनौती रहीं, जो कोरोना काल में दोगुनी हो चुकी हैं. Also Read - अच्छी खबर: कोरोना की वजह से 20 साल बाद पत्नी और बच्चे से मिला शख्स...

हमने घर नहीं बैठने का फैसला किया: डॉ. कुलदीप
डॉ. कुलदीप बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान भले ही ओपीडी बंद थी, लेकिन इमरजेंसी वार्ड हमेशा खुला था. कोरोना जैसी मुश्किल के बीच इमरजेंसी में नियमित मरीज़ देखे. अब तक 200 महिलाओं की नसबंदी कर चुके डॉ. कुलदीप बताते हैं कि कोरोना काल के बीच पति-पत्नी दोनों ही स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थे. सबसे ज्यादा चिंता बेटी की थी. इसके बाद भी हमने घर बैठना ठीक नहीं समझा और दिन-रात के हिसाब से ड्यूटी की.

मन में डर रहता है: डॉ. पूजा
डॉ. पूजा कहती हैं कि चुनौतियाँ अभी कम नहीं हुई हैं. ऐसे समय में किसी भी तरह के मरीजों को देखना भी एक अलग तरह की मुश्किल है क्योंकि कोरोना जैसा संक्रमण किसी में भी हो सकता है. हम एहतियात बरतते हैं, लेकिन इसके बाद भी देश में इतने डॉक्टर्स की जान मरीजों का इलाज करने के दौरान संक्रमण की चपेट में आने से गई है.

मरीजों को देखते हुए वह पीपीई किट में नहीं होतीं, उपलब्ध ओटी गाउन पहनकर ही मरीज देखती हैं. वह चाहती हैं कि किसी भी हाल में बच्ची उनसे दूर रहे. मन में डर रहता है, लेकिन चाह कर भी बच्ची से दूरी नहीं बना पाती हैं. अभी तो निजी सहायिका से भी घर में किसी भी तरह की मदद नहीं मिल पा रही है. पहले वह अक्सर बच्ची को स्वास्थ्य केंद्र ले जाती थीं, अब ऐसा नहीं होता. कोरोना के समय में वह पड़ोस में भी अपनी बच्ची को नहीं छोड़ सकती हैं. वह कहती हैं कि बच्ची की देखभाल के लिए उनके पति डॉ. कुलदीप रात में ड्यूटी करते हैं और वह दिन में. कोशिश करते हैं कि एक शख्स बच्ची के पास रहे. जबकि हम तीनों लोग सिर्फ छुट्टी के दिन ही साथ होते हैं. वह ये भी बताती हैं कि इन सब के बीच भी वह और पति आगे भी पढ़ाई की भी तैयारी करते हैं. सब कुछ चुनौती भरा है, लेकिन ये वक़्त भी निकल ही जाएगा.

इसलिए मनाया जाता है डॉक्टर्स डे
डॉक्टर बिधानचन्द्र रॉय ने चिकित्सा क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान दिया. डॉक्टर होने के साथ ही वह पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री भी चुने गए थे. साथ ही उनके योगदान और कार्यों के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया. उनके जन्म व पुण्यतिथि के दिन 1991 से डॉक्टर डे मानाने की शुरूआत हुई, जो आज भी जारी है.