नई दिल्ली. ट्रेन में सफर करते हुए अक्सर आपको बदबू देने वाले बायो-टॉयलेट (Bio-Toilet) का सामना करना पड़ा होगा. भारतीय रेलवे ने स्टेशनों और रेलगाड़ियों की स्वच्छता के लिए ट्रेनों में बायो-टॉयलेट के इस्तेमाल का चलन शुरू किया था. लेकिन इस्तेमाल के कुछ ही महीनों बाद से बायो-टॉयलेट को लेकर यात्रियों की शिकायतें मिलने लगीं. यात्रियों ने इस टॉयलेट के जाम होने और इसके कारण बदबू फैलने की शिकायतें की. CAG यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी दिसंबर 2017 में सौंपी गई अपनी सालाना रिपोर्ट में बायो-टॉयलेट के संबंध में की गई यात्रियों की 2 लाख शिकायतों का जिक्र किया. इसके बाद से ही रेलवे बायो-टॉयलेट का विकल्प तलाशने लगी थी. रेलवे की यह तलाश अब जाकर पूरी हुई है. दक्षिण पूर्व मध्य रेल (SECR) ने बायो-टॉयलेट की तकनीक में बदलाव कर प्रायोगिक तौर पर कुछ ट्रेनों में इसे अपनाया है. बायो-टॉयलेट की तकनीक में बदलाव करने के बाद इसके जाम होने और बदबू फैलने की शिकायतें कम हुई हैं. एसईसीआर की पहल से उत्साहित होकर रेलवे ने देश के बाकी रेलवे जोनों के तहत चलने वाली ट्रेनों में भी नए टॉयलेट के इस्तेमाल का निर्देश दिया है. Also Read - Indian Railways का बड़ा तोहफा, दिवाली और छठ में इन राज्यों के लिए चलेगी शताब्दी ट्रेन, जानें बुकिंग डेट और रूट्स

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बायो-टॉयलेट से ही पैदा हुई बदबू की समस्या

अंग्रेजी अखबार इकोनॉमिक टाइम्स में छपी खबर के अनुसार, ट्रेनों में बायो-टॉयलेट का इस्तेमाल दो-तीन साल पहले शुरू किया गया था. स्टेशनों और ट्रेनों को साफ रखने के लिए रेलवे ने देशभर की ट्रेनों में बायो-टॉयलेट के इस्तेमाल की इजाजत दी थी. दरअसल, बायो-टॉयलेट में विशेष प्रकार के जीवाणु (Anaerobic Bacteria) की सहायता से मानव-अपशिष्ट को बायो-गैस यानी मीथेन और कार्बन डाईऑक्साइड में बदल दिया जाता है. इससे ट्रेनों के टॉयलेट को बार-बार साफ करने की समस्या का समाधान हो जाता है. ट्रेनों में बायो-टॉयलेट के इस्तेमाल से रेलवे को लाभ तो हुआ, लेकिन दूसरी समस्याएं सामने आने लगीं. दरअसल, ट्रेनों में बायो-टॉयलेट के इस्तेमाल से पहले मानव-अपशिष्ट को सीधे बाहर निकालने की व्यवस्था थी. इससे टॉयलेट में हवा के आने-जाने के रास्ते में बाधा नहीं आती थी. लेकिन बायो-टॉयलेट का इस्तेमाल शुरू होने के बाद टॉयलेट को पूरी तरह से बंद कर दिया गया. इससे Air Ventilation यानी हवा के आने-जाने का मार्ग बंद हो गया, जिससे टॉयलेट से बदबू फैलने की समस्या गहराने लगी.

फोटो साभारः SECR टि्वटर

फोटो साभारः SECR टि्वटर

 

तकनीक में बदलाव के लिए SECR को मिला इनाम

दक्षिण पूर्व मध्य रेल यानी SECR ने बायो-टॉयलेट से बदबू फैलने की समस्या को तोड़ ढूंढ़ निकाला है. SECR के बिलासपुर कोचिंग डिपो के कर्मचारियों ने बायो-टॉयलेट की तकनीक में महत्वपूर्ण बदलाव कर इसमें Air Ventilation यानी हवा के आने-जाने का रास्ता बना दिया. इस नई तकनीक से जहां ट्रेनों के टॉयलेट में स्वच्छ हवा के आने-जाने का रास्ता मिला, वहीं टॉयलेट में ह्यूमिडिटी की समस्या से भी निजात मिल गई. SECR इस नई तकनीक को Natural Draft Induced Ventilation System (NDIVS) का नाम दिया है. इसके तहत बिलासपुर कोचिंग डिपो के तकनीकी विशेषज्ञों ने टॉयलेट से अपशिष्ट को बाहर निकालने वाली जगह पर दो Funnel यानी शंकु जोड़ दिए. ये दोनों फनेल एक-दूसरे की विपरीत दिशा में रखे गए, जिन्हें ट्रेन के टॉयलेट से प्लास्टिक की पाइप के सहारे जोड़ दिया गया. इसमें एक फनेल से जहां बायो-गैस के बाहर जा सकती है, वहीं दूसरे फनेल से स्वच्छ हवा के टॉयलेट में जाने का रास्ता खुल गया. हवा के लिए Cross-Ventilation के इस इंतजाम से ट्रेनों के टॉयलेट में दुर्गंध की समस्या का निदान हो गया. इस तकनीकी बदलाव के लिए SECR को रेलवे की तरफ से वर्ष 2017-18 का 3 लाख रुपए का सर्वश्रेष्ठ इनोवेशन अवार्ड भी मिला.

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50 ट्रेनों में लगा नया सिस्टम, बाकी में भी होगा इस्तेमाल

इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, रेलवे ने शुरुआती चरण में SECR के नए बायो-टॉयलेट का इस्तेमाल 50 ट्रेनों में शुरू कर दिया है. इस प्रयोग की सफलता को देखते हुए जल्द ही इसे देश के बाकी रेलवे जोनों के तहत चलने वाली ट्रेनों में भी लागू किया जाएगा. रेलवे ने इसके लिए देश के सभी रेलवे जोनों के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे सभी ट्रेनों में नई डिजाइन वाले बायो-टॉयलेट का इस्तेमाल सुनिश्चित करें. SECR के अनुसार पुराने बायो-टॉयलेट में महत्वपूर्ण तकनीकी बदलाव से रेलवे के खर्च में किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं हुई है. अलबत्ता नई डिजाइन वाले बायो-टॉयलेट को भी कॉस्ट-इफेक्टिव श्रेणी में ही रखा गया है. रेलवे का मानना है कि नई डिजाइन वाले बायो-टॉयलेट के इस्तेमाल से ट्रेनों में सफर करने वाले यात्रियों को सुविधा होगी. साथ ही ट्रेनों के कोच में यात्री सुविधाओं को लेकर आने वाली शिकायतों में भी कमी आएगी.

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