वर्ष 2014 में जिस तरह कांग्रेस संसद में देश की सबसे पुरानी पार्टी की जगह ‘अब तक की सबसे छोटी कांग्रेस पार्टी’ हुई, देश की राजनीति में बहुत कुछ बदल गया. भाजपा प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई, देश को नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री मिला. ढेर सारी क्रांतियां हो गईं. ये क्रांतियां (डिजिटल, कैशलेस आदि टाइप) सिर्फ देश में ही हुईं और सिर्फ सत्ताधारी पार्टी ने इसे जनहित में किया, ऐसा नहीं है. कांग्रेस पार्टी भी इन क्रांतियों के कारण कम से कम डिजिटल तो हो ही गई. यकीन न हो तो तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री-चयन की प्रक्रिया पर गौर कर लीजिए. राजस्थान में कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने पहली बार राहुल गांधी को भी अहसास करा दिया कि ‘ऐवें ही कोई कांग्रेस अध्यक्ष’ नहीं हो जाता. भाई साहब, नाकों चने चबवा दिए, ऐसा भी कह सकते हैं आप! लेकिन राहुल तो ठहरे मॉडर्न इंडिया वाले अध्यक्ष, सो उन्होंने भी हार नहीं मानी और कार्यकर्ताओं को ऐसा धोबी-पाट दिया कि तीनों राज्यों के ‘विजेताओं’ की स्वामिभक्ति, कम से कम राहुल के सामने तो जाहिर हो ही गई.

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राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश में सीएम चुनने के लिए जो फंडा निकाला, वह अद्भुत था. पार्टी को जिताने वाले कार्यकर्ताओं से ही पूछ लिया- कौन बनेगा सीएम, बताओ! कांग्रेस कार्यकर्ता उस वक्त भारी कन्फ्यूज हो गए, जब उन्हें पता चला कि उनकी पार्टी का अध्यक्ष भी अब भाजपा के ‘बड़े नेता’ की तरह कार्यकर्ताओं से सीधी बात करेगा. पुरातन आचार-विचार वाली पार्टी में पले-बढ़े कार्यकर्ताओं के लिए यह बिल्कुल अलहदा झटका था. बहरहाल, कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी का ऑडियो-मैसेज रिसीव किया, ‘बीप-बीप’ की आवाज के बाद अपना ऑप्शन बता दिया और सीएम चुन लिए गए. समर्पित कार्यकर्ताओं को अब तक इस पहेली का जवाब नहीं मिला है कि जो बात पूरा देश दो दिनों से जान रहा था, सियासी गलियारों में कयास लगने तक बंद हो गए थे, उसके लिए राहुल गांधी ने ‘बीप-बीप’ क्यों कराया.

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जो बात महाभारत में है, उसे आप टॉल्सटॉय से सीख रहे हैं?
राहुल गांधी पांचों राज्यों के विधानसभा चुनाव कार्यक्रम से थके-मांदे अभी बिस्तर पर लेटे ही थे कि मुख्यमंत्री चुनने की आफत गले आ पड़ी. उन्हें मां की थपकी, पिता का स्नेह और दादी का दुलार, सब याद आ गया. इसीलिए तो दुनियाभर के विद्वानों के कथन का समग्र अध्ययन करने के बाद उन्होंने सूत्र वाक्य ढूंढा- The two most powerful warriors are patience and time. कसम से राहुल जी लियो टॉल्सटॉय से पहले आपने महाभारत पढ़ लिया होता, तो आपको भारत से बाहर नहीं जाना पड़ता. महाभारत में यक्ष-युधिष्ठिर संवाद की ओर जरा सी भी नजर दौड़ा ली होती तो आपको यह वाक्य लिखने के लिए भटकना नहीं पड़ता. यक्ष के सवाल- ‘मनुष्य का साथ कौन देता है’ के जवाब में युधिष्ठिर हजारों साल पहले कह गए हैं- ‘धैर्य ही मनुष्य का साथी होता है’. इसके अलावा आप पंचतंत्र का भी उद्धरण ले सकते थे-

‘विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ, प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।

यानी विपत्ति में धैर्य, समृद्धि में क्षमाशीलता, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पराक्रम, यशस्वी, वेद शास्त्रों का ज्ञाता, ये छह गुण महापुरुषों में स्वाभाविक रूप से होते हैं. लेकिन राहुलजी, आप तो सीधे भारत ही छोड़ गए. बहरहाल, एक वाक्य लिखकर आपने जो संदेश कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को दिया, उसमें से कितना कमलनाथ ने लिया और कितना सिंधिया के मन में पैठ बना पाया, यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा.

राहुल गांधी जी, महाभारत पढ़ने का एक और लाभ होता. दरअसल, पिछले कुछ महीनों में आपके विदेश-भ्रमण छोड़कर मंदिर-भ्रमण करने पर जो लोग धार्मिक होने या जनेऊधारी होने का टोंट कसते रहते हैं, उन्हें भी जवाब मिल जाता कि देख लो, गीता-पुराण, महाभारत सब पढ़कर ‘हिंदू’ हुए हैं राहुल गांधी. लेकिन आप तो ठहरे रह-रहकर छुट्टियां मनाने विदेश जाने वाले, सो कहां अपने वेदव्यास पर आपकी नजर जाती.

डिस्केलमरः लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.