18 नवंबर 1946. देश की आजादी से 9 महीने पहले उत्तर प्रदेश के कानपुर में पैदा हुए कमलनाथ मध्य प्रदेश के 18वें मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. यह महज संयोग ही है कि कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के नाम पर ठीक उसी तारीख को मुहर लगी, जिस दिन उन्हें इंदिरा गांधी ने छिंदवाड़ा के लिए चुना था. गुरुवार को कमलनाथ ने कहा, 13 दिसंबर 1979 को इंदिरा गांधी मुझे छिंदवाड़ा की जनता को सौंप गई थीं. 39 साल बाद 13 दिसंबर को ही इंदिरा गांधी के पोते राहुल गांधी ने उन्हें मध्य प्रदेश की कमान सौंप दी. कमलनाथ ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को पीछे छोड़ते हुए यह मुकाम हासिल किया. सीएम चुने जाने के बाद उन्होंने समर्थन के लिए सिंधिया का धन्यवाद किया. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कमलनाथ 17 दिसंबर को सीएम पद की शपथ लेंगे.

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कमलनाथ के साथ कई किस्से जुड़े हैं. 

संजय गांधी की देखरेख के लिए जेल गए
दून स्कूल में पढ़ाई के दौरान कमलनाथ की दोस्ती संजय गांधी से हुई थी.1975 में इमरजेंसी के दौरान कमलनाथ भी संजय गांधी के साथ सुर्खियों में आए. इमरजेंसी खत्म होने के बाद संजय गांधी को कोर्ट में पेश किया गया. कोर्ट ने संजय को जेल भेज दिया. जेल में संजय गांधी पर हमले की आशंका थी. दोस्ती निभाने के लिए कमलनाथ ने जज के साथ बदतमीजी की और कोर्ट में हंगामा कर दिया. आखिरकार कोर्ट ने उन्हें भी जेल भेज दिया. इसके बाद वह इंदिरा गांधी की नजरों में आ गए. 26 अप्रैल 2018 को जब कमलनाथ मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बने तो उन्होंने पार्टी कार्यालय का रंगरोगन करवाया. इतना ही नहीं अपने दोस्त संजय गांधी की फोटो भी लगवाई.

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जब इंदिरा ने तीसरा बेटा माना
1980 में कांग्रेस ने उन्हें मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा से लोकसभा का टिकट दिया. उनके चुनाव प्रचार के लिए इंदिरा गांधी भी आईं. उन्होंने अपने भाषण में कहा- मैं नहीं चाहती कि आप लोग कांग्रेस नेता कमलनाथ को वोट दें. मैं चाहती हूं कि आपलोग मेरे तीसरे बेटे कमलनाथ को वोट दें. उस समय कांग्रेस कार्यकर्ता नारा लगाते थे, ‘इंदिरा के दो हाथ- संजय गांधी और कमलनाथ’. कमलनाथ ने 1979 में मोरारजी देसाई की सरकार से मुकाबले में इंदिरा गांधी की काफी मदद की थी. कमलनाथ ऐसे नेता हैं जिन्होंने कांग्रेस में तीन पीढ़ियों का साथ दिया.

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बंगले के लिए पत्नी से इस्तीफा दिलवाया!
1996 में हवाला कांड में नाम आने के बाद पार्टी ने कमलनाथ की जगह उनकी पत्नी अलकानाथ को लोकसभा का टिकट दिया और वह चुनाव जीत गईं. कमलनाथ को तुगलक लेन पर मिला बंगला खाली करने का नोटिस मिला. हालांकि कमलनाथ वह बंगला खाली नहीं करना चाहते थे. उन्होंने कोशिश की कि यह बंगला उनकी पत्नी के नाम अलॉट हो जाए लेकिन नियमों के मुताबिक पहली बार सांसद बनने वाले को इतना बड़ा बंगला नहीं दिया जा सकता था. राजनीतिक गलियारों में कहा जाता है कि यह बंगला कमलनाथ को इतना पसंद था कि उन्होंने पत्नी से इस्तीफा दिलवा दिया और खुद मैदान में कूद गए. लेकिन बीजेपी के सुंदरलाल पटवा ने उन्हें हरा दिया.

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सिख दंगे
1984 में हुए सिख विरोधी दंगे में कमलनाथ का नाम भी आया. कमलनाथ पर आरोप लगा कि वे 1 नवंबर, 1984 को नई दिल्ली के गुरुद्वारा रकाबगंज में उस वक्त मौजूद थे, जब भीड़ ने दो सिखों को जिंदा जला दिया था. हाल ही में ‘इंडिया टुडे’ को दिए एक इंटरव्यू में कलमनाथ ने कहा कि किसी भी जांच एजेंसी ने उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं पाया और न ही उनके खिलाफ कभी कोई केस दर्ज हुआ. हालांकि कमलनाथ कहते रहे हैं कि वह किसी भी जांच के लिए अब भी तैयार हैं.