नई दिल्ली. फ्रांस के साथ 36 राफेल विमान (Rafale Fighter Jet) खरीदने संबंधी रक्षा सौदे को लेकर देश में सियासत जारी है. कांग्रेस इस मुद्दे पर लगातार पीएम नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री पर हमला कर रही है. बीच-बीच में फ्रांसीसी मीडिया की रिपोर्टों, वहां के नेताओं के बयान, इस विवाद में ‘आग में घी’ का काम कर रहे हैं. इन सबके बीच बीते दिनों फ्रांस में भारत के राजदूत रहे राकेश सूद ने अंग्रेजी अखबार द हिंदू में राफेल सौदे को लेकर एक लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने इस डील को संदेहों से भरा और ‘मेक इन इंडिया’ (Make in India) कार्यक्रम को झटका पहुंचाने वाला करार दिया है. इस लेख के जरिए पूर्व राजदूत और वर्तमान में ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सदस्य राकेश सूद ने इस सौदे के सभी प्रमुख बिंदुओं पर क्रमवार तरीके से ध्यान दिलाया है. साथ ही तीन प्रमुख सवाल उठाए हैं, जिस पर उनका कहना है कि सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए ताकि रक्षा सौदे पर चल रहा विवाद शांत हो. राफेल सौदे को समग्र रूप से समझने के लिए राकेश सूद के इस लेख के बिंदुओं को पढ़ना आवश्यक है.

डील की घोषणा पीएम ने की, रक्षा मंत्री को नहीं थी जानकारी
द हिंदू के अनुसार, अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक फ्रांस दौरे के समय 36 राफेल विमानों की खरीद की घोषणा की गई थी. भारतीय वायुसेना के लिए वर्ष 2000 में शुरू हुए इस सौदे के तहत पहले 126 राफेल विमानों की खरीद का समझौता हुआ था. इसके तहत 18 विमानों की डिलिवरी होनी थी, जबकि 108 विमानों की असेंब्लिंग का जिम्मा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को दिया जाना था. कई दौर की वार्ताओं के बाद वर्ष 2011 में यूरोफाइटर टाइफून और दसॉल्ट (Dassault Group) राफेल द्वारा डाले गए टेंडरों पर विचार के बाद वर्ष 2012 में राफेल का नाम तय हुआ.

लेकिन पीएम मोदी के दौरे के बाद पुराने सौदे को रद्द कर दिया गया और 36 बने-बनाए राफेल फाइटर जेट खरीदने का सौदा किया गया. द हिंदू के अनुसार, उस समय के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को फ्रांस के साथ हुए इस सौदे की जानकारी नहीं थी. बहरहाल, डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल और रक्षा संबंधी कैबिनेट कमेटी ने इस सौदे को मंजूरी दी और तय हो गया कि वर्ष 2019 और 2022 में राफेल विमान भारत को मिल जाएंगे. इसी समझौते में यह भी तय हो गया था कि नई परिस्थितियों में HAL को राफेल विमानों की देश में असेंब्लिंग का जिम्मा नहीं दिया जाएगा. बता दें कि राफेल विमानों की इसी खरीद प्रक्रिया के बारे में बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने सरकार से जवाब मांगा है. इस मामले की अगली सुनवाई 31 अक्टूबर को होगी.

 पीएम नरेंद्र मोदी और फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंक्वा हॉलैंड. (फाइल)

पीएम नरेंद्र मोदी और फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंक्वा हॉलैंड. (फाइल)

 

दाम पर उलझन, विपक्ष के सवाल का जवाब क्यों नहीं दे रही सरकार
फ्रांस में भारत के राजदूत रहे राकेश सूद ने इस रक्षा सौदे के दूसरे बिंदू- राफेल की कीमत को इस मुद्दे का दूसरा प्रमुख बिंदु कहा है. यूपीए सरकार के समय हुए समझौते में 126 विमानों की खरीद के साथ हथियार प्रणाली और परफॉर्मेंस-गारंटी का जिक्र नहीं था. लेकिन मोदी सरकार के समय हुए रक्षा सौदे को लेकर दावा किया गया कि यूपीए के मुकाबले यह ज्यादा बेहतर समझौता है. इसमें ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम का भी ध्यान रखा गया है. सरकार ने मोटे तौर पर जो विवरण दिया उसके हिसाब से कुल 7.87 बिलियन यूरो यानी 59 हजार करोड़ रुपए के इस समझौते को लेकर दावा किया गया कि इसमें 50 प्रतिशत से ज्यादा (करीब 30 हजार करोड़ रुपए) की हिस्सेदारी भारतीय कंपनियों की होगी. इसमें हथियार प्रणाली और विमानों की परफॉर्मेंस-गारंटी शामिल थी.

इसके तहत भारत सरकार के सुझावों के साथ इस विमान में संशोधन होने के बाद 36 राफेल विमानों की कीमत करीब 5 बिलियन यूरो यानी 36 हजार 900 करोड़ रुपए होती है. मतलब यह कि एक विमान की कीमत करीब 1,025 करोड़ रुपए बैठती है. हालांकि रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने बताया कि एक विमान की कीमत 670 करोड़ रुपए पड़ रही है. प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस विमानों की कीमत को लेकर ही सवाल उठा रही है और सरकार से राफेल के सही दाम देश को बताने का अनुरोध कर रही है. इस मामले पर सरकार आनाकानी कर रही है, साथ ही यह तर्क दे रही है कि सौदे की गंभीरता को देखते हुए विमानों की कीमत नहीं बताई जा सकती. लेकिन इस विवाद के बीच फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रों (Emmanuel Macron) ने बीते दिनों यह कहकर भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया कि भारत सरकार अगर चाहे तो वह संसद को विमानों का दाम बता सकती है, इसमें फ्रांस सरकार को कोई ऐतराज नहीं होगा. मैक्रों के इस बयान के बाद राफेल-डील विवाद का रहस्य गहरा गया और देश में राजनीति तेज हो गई.

पीएम मोदी और इमेनुएल मैक्रों. (फाइल)

पीएम मोदी और इमेनुएल मैक्रों. (फाइल)

 

मोदी के दौरे से पहले रिलायंस ने आनन-फानन में बना ली कंपनी
राफेल-डील को लेकर विपक्ष सबसे ज्यादा इसी बात पर हमले कर रहा है कि पीएम मोदी ने सरकारी क्षेत्र की कंपनी HAL को अनदेखा कर एक निजी कंपनी, अनिल अंबानी की रिलायंस को इस सौदे में प्रमुखता दी. कांग्रेस के दावे को फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंक्वा हॉलैंड (François Hollande) के बीते सितंबर महीने में दिए गए उस बयान से भी हवा मिली, जिसमें हॉलैंड ने कहा था कि फ्रांस के पास दसॉल्ट के साथ समझौते के लिए रिलायंस का नाम भारत सरकार ने सुझाया था. पूर्व राजदूत राकेश सूद ने अपने लेख में रिलायंस कंपनी द्वारा दसॉल्ट के साथ समझौते के लिए रक्षा निर्माण कंपनी बनाने के समय और इससे जुड़ी अवधि की ओर भी ध्यान दिलाया है.

सूद ने अपने लेख में कहा है कि पीएम मोदी के अप्रैल में फ्रांस दौरे से कुछ हफ्ते पहले मार्च महीने में रिलायंस डिफेंस लिमिटेड (Reliance) नामक कंपनी बनाई जाती है. 24 अप्रैल 2015 को रिलायंस एयरोस्ट्रक्चर (Reliance Aerostructure) का रजिस्ट्रेशन कराया जाता है. करार के बाद नई कंपनी का जन्म हुआ, जिसका नाम दसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (Dassault Reliance Aerospace Ltd, or DRAL) है. यूपीए के समय हुए 126 विमानों का करार रद्द होने के बाद अगस्त 2015 में नए करार के तहत भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी के नियमों में संशोधन होता है. इन संशोधनों में उन नियमों में छूट दिया जाता है, जिसके तहत फ्रांसीसी कंपनी को करार के तहत अपनी साझेदार भारतीय कंपनी को विमान-निर्माण से जुड़ी तकनीकी जानकारी शेयर करनी थी.

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राफेल में रिलायंस की क्या-क्या हिस्सेदारी, इस पर संदेह
द हिंदू के अनुसार, सूद ने अपने लेख में कहा है कि दसॉल्ट के चेयरमैन एरिक ट्रैपियर (Eric Trappier) ने पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंक्वा हॉलैंड के दावे के विपरीत बीते दिनों फ्रांसीसी मीडिया से कहा था कि राफेल-डील के लिए दसॉल्ट ने स्वतंत्र रूप से भारतीय साझेदार कंपनियों का चुनाव किया था. लेकिन पूर्व राजदूत राकेश सूद ने करार के तहत जिस महत्वपूर्ण बिंदु की तरफ ध्यान दिलाया है, वह है राफेल के निर्माण में रिलायंस की क्या हिस्सेदारी होगी. राफेल के निर्माण में दसॉल्ट कंपनी विमान का एयरफ्रेम (ढांचा) सप्लाई करेगी. साथ ही यह कंपनी विमान की पूरी असेंब्लिंग (systems integrator) करेगी. सैफ्रन (Safran) कंपनी के पास विमान के इंजन और लैंडिंग-गियर सप्लाई का जिम्मा होगा. इसके अलावा थेल्स (Thales) नामक कंपनी को रडार और उड़ान संबंधी तकनीक सप्लाई की जिम्मेदारी दी गई है. राकेश सूद के अनुसार, राफेल विमान के इस सौदे में रिलायंस की क्या भूमिका होगी, इसके बारे में अभी तक कुछ भी स्पष्ट नहीं है. सूद ने इन्हीं कारणों के आधार पर सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के सफल न होने का तर्क पेश किया है. अपने लेख में फ्रांस में भारत के पूर्व राजदूत ने कहा है कि सरकार द्वारा इन सवालों का जवाब देने के बाद ही राफेल-सौदे पर उठे विवाद का अंत हो सकेगा.