नई दिल्ली: नवरात्री के दौरान राजस्थान के स्कूलों में अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है. 18 जिलों के 2000 स्कूलों में टीचर्स महिलाओं और लड़कियों का सम्मान करना सिखाने के लिए एक शानदार पहल कर रहे हैं. इन स्कूलों में लड़कियों की पूजा करके नवरात्रि मनाई जा रही है. इतना ही नहीं टीचर्स और सीनियर छात्र लड़कियों के पैर धोते हैं, तिलक लगाते हैं और उनकी आरती उतारते हैं. लड़कियों को देवी दुर्गा का अवतार मानकर लड़कों को उनसे अच्छे भविष्य के लिए आशीर्वाद लेने के लिए कहा जाता है. लड़कियों को यह भी बताया जा रहा है कि उन्हें खुद को कमजोर या कम नहीं मानना चाहिए. टीचर्स का कहना है कि उन्हें लड़कों को महिलाओं और लड़कियों का सम्मान करना सिखाने में आसानी हो रही है.

इन स्कूलों में नवरात्री दौरान इस कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. इन आयोजनों का उद्देश्य सिर्फ लड़कियों का सम्मान करने की सीख देना ही नहीं है, बल्कि जाति व्यव्सथा पर भी तगड़ा प्रहार करना है. शिक्षक दलित लड़कियों को दुर्गा के नौ रूपों का प्रतिनिधित्व करने पर जोर दे रहे हैं. इस कार्यक्रम की ओर छात्रों का ध्यान आकर्षित करने के लिए सभी लड़कियों को टोकन उपहार दिए जाते हैं, जबकि सभी छात्रों के लिए दिन में एक शानदार दावत का आयोजन किया जाता है. शिक्षक इस अनूठी पहल के लिए कोई सरकार मदद नहीं ले रहे हैं. वे खुद अपनी जेब से पैसे लगा रहे हैं.

इस कार्यक्रम की शुरुआत शिक्षकों के एक समूह ने 2015 में शुरू किया था. उनका मानना था कि एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए, जहां महिलाओं को सम्मान मिले और जाति के आधार किसी से भेदभाव नहीं हो, छात्र उसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. हालांकि यह तब तक 100 स्कूलों तक सीमित था. लेकिन सोशल मीडिया के उपयोग से इसने जोर पकड़ा और पूरे राज्य में फैल गया. जोधपुर, सीकर, जयपुर, बंसवाड़ा, दौसा, पाली, जलोरे, बाड़मेर और झुनझुनू के जिलों के कई स्कूलों में नवरात्रि के दौरान इस तरह का आयोजन होता है.

जलोरे के एक सरकारी स्कूल के टीचर का कहना है कि लिंग के आधार पर भेदवाद और बच्चों में महिलाओं और लड़कियों के प्रति सम्मान की भावना जगाने का बहुत ही आसान तरीका है. हम ये भी कोशिश कर रहे हैं कि इस दौरान छात्र जो सीख रहे हैं उसका सालभर पालन करें. हम चाहते हैं कि हमारी यह मुहिम राजस्थान के हर स्कूल का हिस्सा बने. सीकर लालपुर स्कूल की टीचर सुमन भाटिया का कहना है कि हमारे पास पढ़ाई के लिए आने वाले बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं. लेकिन हम जो उन्हें सिखाते है वे उसे सिखते हैं और उसका सम्मान करते हैं. इन तरह के आयोजनों के बाद उनके व्यवहार में जो परिवर्तन आया है उसे स्कूलों में देखा जा सकता है.