नई दिल्ली. दो चिट्ठी है. दोनों ही साल 2019 चुनाव के लिए महत्वपूर्ण. इसे उतना ही तवज्जो दिया जाना चाहिए, जितना मौसम विभाग से मिलने वाले अलर्ट को दिया जाता है. ऐसा हम बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के उन बयानों पर कह रहे हैं, जिसमें वह एक मौसम वैज्ञानिक का जिक्र किया करते थे. कंफ्यूज मत होइए हम बात कर रहे हैं लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान और उनके सांसद बेटे चिराग पासवान की. पिता ने गृहमंत्री को चिट्ठी लिखी है तो पुत्र ने सीधे प्रधानमंत्री को. दोनों चिट्ठियों का सीधा संबंध 9 अगस्त को होने वाले दलितों के प्रदर्शन से है. हालांकि, उन्होंने एक दूसरे बयान में प्रधानमंत्री और एनडीए सरकार पर विश्वास ही जताया है, लेकिन चिट्ठी लिखी गई है तो इसके मायने भी दूर तलक जाएंगे.

पासवान के बयान को क्यों गंभीरता से लिया जाना चाहिए
राम विलास पासवान बिहार से आते हैं. वहां के दलित वोटबैंक में उनका खासा असर है, खासतौर पर हाजीपुर-वैशाली के इलाके में. साल 2014 के चुनाव में उनके 6 सांसद जीते थे. वह एनडीए के साथ थे और राज्य में एनडीए ने 22 सीटें जीती थीं. साल 2019 के लिए बिहार में समीकरण बनाने की जोर-आजमाइश शुरू हो चुकी है. बीजेपी, जेडीयू, लोजपा और रालोसपा में सीटों को लेकर खींचतान की बात सामने आ रही है. ऐसे में पासवान के बदले सुर नए राजनीतिक संकेतों की तरफ इशारा करने पर मजबूर कर रहे हैं. इसका कारण भी फिर वही ‘मौसम वैज्ञानिक’ वाली उपाधि ही है.

जेपी-राजनारायण के साथ शुरू की राजनीति
राम विलास पासवान भी लालू और नीतीशी की तरह छात्र राजनीति से राज्य की राजनीति में प्रवेश किए. वह राजनारायण और जयप्रकाश नारायण के आंदोलनों में सक्रिय भूमिका में रहते थे और लोक दल में महासचिव बनने से चर्चा में आए थे. छात्र संघर्षों से आगे बढ़ते हुए सीधे बताते हैं कि साल 1977 में पहली बार वह जनता पार्टी के टिकट पर सांसद बने. इसके बाद 1980 और 1984 में फिर हाजीपुर से जीते. 1983 में उन्होंने एक दलित सेना बनाई.

पहले ये समझ लें कि पासवान को क्यों कहते हैं मौसम वैज्ञानिक
9वीं लोकसभा 1989 में पासवान फिर सांसद बने और राजीव गांधी सरकार के खिलाफ चुनाव जीते वीपी सिंह सरकार में केंद्रीय श्रम एवं कल्याण मंत्री बने. साल 1996 में वह कांग्रेस समर्थित देवगौड़ा सरकार में शामिल हुए और एक बार फिर केंद्रीय मंत्री बनाए गए. यहां उन्होंने एक बार फिर सियासत के बदलते मिजाज को भांपा और अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में शामिल हो गए और एक बार फिर केंद्रीय मंत्री बने. इस बार उन्हें संचार और खनन मंत्रालय मिला. लेकिन, जो बदलती सियासत को भांप जाए उसे ही तो पासवान कहते हैं. ऐसे में साल 2004 चुनाव से ठीक पहले पासवान ने गुजरात दंगे के नाम पर एनडीए को छोड़ दिया और साल 2004 में यूपीए सरकार में एक बार फिर केंद्रीय मंत्री बने. हालांकि, साल 2009 में उनका दांव गलत लगा और लालू के साथ जाने के बाद वह अपनी खुद की सीट गंवा बैठे. बस यही पांच साल वह सत्ता से दूर रहें. इसके बाद साल 2014 में वह एक बार फिर सत्ता की हवा का रुख भांपने सफल हुए और मोदी लहर में शामिल हो गए. इसका फायदा उन्हें मिला और राज्य में छह सीटें भी मिली और वह एक बार फिर केंद्रीय मंत्री बनाए गए.

आज क्यों कर रहे हैं पासवान का जिक्र
चिराग पासवान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी है. इसमें उन्होंने 9 अगस्त को होने वाले दलितों के प्रदर्शन का जिक्र करते हुए लिखा है कि ये अप्रैल में हुए प्रदर्शन से ज्यादा एग्रेसिव हो सकता है. अपनी चिट्ठी में उन्होंने मांग की है कि जस्टिस गोयल को एनजीटी चेयरमैन के पद से हटाया जाए. बता दें कि जस्टिस गोयल ही वह जज हैं, जिन्होंने एससी/एसटी एक्ट के खिलाफ आदेश दिया था. चिट्ठी में चिराग ने जिक्र किया है कि केंद्र सरकार के इस कदम से दलित समुदाय में मैसेज गया है कि एससी/एसटी एक्ट को कमजोर करने वाले जस्टिस गोयल को एनजीटी अध्यक्ष बनाकर सरकार ने तोहफा दिया है. हालांकि, 27 जुलाई को चिराग ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि हम चाहते हैं एससी/एसटी एक्ट पर सरकार ऑर्डिनेंस लाए. लेकिन, वह अभी नहीं हो सकता, इसलिए हम चाहते हैं कि पहले के लॉ को री-स्टोर करने के लिए 7 अगस्त को संसद में इसे एक बार फिर इंट्रोड्यूस किया जाए. इस दौरान उन्होंने पीएम और एनडीए सरकार पर पूर्ण विश्वास भी जताया.
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रामविलास ने 23 जुलाई को छोड़ा था शिगूफा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रामविलास पासवान ने पिछले 23 जुलाई को अपने घर पर एनडीए के करीब 25 दलित सांसदों के साथ एक बैठक की थी. बताया जा रहा है कि इसमें सभी ने एनजीटी के अध्यक्ष जस्टिस गोयल को हटाने की मांग की थी. इतना ही नहीं इस संदर्भ में राविलास पासवान ने गृह मंत्री को भी एक चिट्ठी लिखी है.

लालू ने क्या कहा था
बता दें कि साल 2009 में लालू यादव के साथ आए राम विलास पासवान साल 2014 में उनसे अलग हो गए. इसके बाद लालू ने उनपर चिरपरिचित अंदाज में निशाना साधा और कहा, रामविलास पासवान जैसा मौसम वैज्ञानिक नहीं देखा. इसके लिए उन्होंने पासवान के राजनैतिक करियर का भी उल्लेख किया. एक कार्यक्रम में रामविलास ने भी कहा था, हां वह मौसम वैज्ञानिक हैं और दावा करते हैं कि एनडीए सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी.

क्या है राजनैतिक मायने
रामविलास पासवान के राजनैतिक करियर को देखें तो अंदाजा लग जाता है कि वह पहले तो सरकार में रहते हैं, लेकिन जैसे ही उन्हें लगता है कि सरकार जाने वाली है या दूसरी पार्टी आने वाली है तो वह अपना रुख बदल लेते हैं. वह पहले तो सरकार की आलोचना करते हैं हैं और फिर लहर बना रही पार्टी या गठबंधन के साथ खड़े हो जाते हैं. ऐसे में साल 2019 चुनाव की तैयारी में जुट चुकी पार्टियों के बीच पासवान की नए रणनीति सबको आकर्षित कर रही है. साथ ही एनडीए की सरकार को लेकर भी बात शुरू हो गई है.