नई दिल्ली. जीवनदायिनी, मोक्षप्रदायिनी और न जाने कितने ही ऐसे नाम हैं जो गंगा (Ganga) नदी के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. लेकिन हमारी-आपकी उपेक्षा या ‘अत्यंत-आदर’ देने के भाव के कारण, गंगा नदी अब खुद जीवन की तलाश में है. लेकिन कुछ लोग हैं जो लगातार गंगा को उसकी राह के कांटों से निजात दिलाने में लगे हैं. इन्हीं लोगों में शामिल हैं तीन साधु. इनमें से एक की मृत्यु हो चुकी है, दूसरा ‘गुम’ है और तीसरा, 26 साल का एक संन्यासी है, जो कंप्यूटर साइंस (Computer Science) की पढ़ाई छोड़कर जवानी में ही संन्यास लेता है और गंगा को बचाने में जुट जाता है. ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद (Brahmachari Atmabodhanand) नामक यह साधु बीते 24 अक्टूबर से हरिद्वार के मातृ सदन में गंगा को बचाने के लिए अनशन पर है और नींबू-पानी, शहद के सहारे जिंदा है. इन साधुओं का उद्देश्य एक ही है- गंगा नदी की रक्षा.

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गंगा के प्रति सरकार की अनदेखी से दुखी इस साधु को अपनी मुहिम के पूरा होने की उम्मीद है. हालांकि बीते दिनों आई प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Pollution Control Board) की एक रिपोर्ट से आत्मबोधानंद जैसे गंगा-स्वयंसेवकों की मुहिम के प्रति नकारात्मकता आती दिखती है, क्योंकि इस रिपोर्ट के मुताबिक ढाई हजार किलोमीटर से अधिक इलाके में बहने वाली इस नदी का पानी 39 में से महज एक ही स्थान पर स्वच्छ पाया गया. फिर भी आत्मबोधानंद की उम्मीदें जिंदा हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक वे अपने उद्देश्य के प्रति गंभीर दिखते हैं. आत्मबोधानंद ने अखबार से बातचीत में कहा, ‘सरकार इस नदी को खत्म कर रही है. गंगा को बचाने के प्रयास नाकाफी हैं. मैं संन्यासी हूं, विरोध दर्ज कराने के लिए धरना-प्रदर्शन नहीं कर सकता. इसलिए आमरण अनशन कर रहा हूं ताकि लोगों में नदी को बचाने की जागरूकता आए और वे विकास के नाम पर नदी को खत्म करने की इस साजिश के प्रति सतर्क हों.’

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गूगल पर नहीं मिला जवाब तो घर छोड़ दिया
जीवन के महज 26 बसंत पूरा करने वाले आत्मबोधानंद के साधु बनने की कहानी रोचक है. टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, केरल के अल्लापुझा (पुराना अलेप्पी) में रहने वाले आत्मबोधानंद कॉलेज के सामान्य छात्र ही थे जो कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करता था. धर्म या धार्मिक बातों को जानने-समझने में उनकी दिलचस्पी उनके हमउम्र साथियों की तरह ही, बहुत कम थी. स्वामी ने अखबार को बताया कि कोर्स के तीसरे साल में एक प्रोजेक्ट के दौरान उन्हें लंबा ब्रेक मिला. इस अवधि में क्या करें और क्या न करें के बीच, आत्मबोधानंद ने सोचा कि भगवान के बारे में जाना जाए और जीवन-दर्शन को समझा जाए. गूगल पर किसी गुरु की खोज शुरू की, कोई जवाब नहीं मिला तो कुछ कपड़े समेटे, लैपटॉप उठाया और जेब में महज 2 हजार रुपए लेकर ‘सत्य की खोज’ में निकल पड़े. दिल्ली आए, वहां से हरिद्वार और फिर बदरीनाथ आश्रम पहुंचे. स्वामी ने बताया, ‘इस भ्रमण के दौरान मैंने ढेर सारे आश्रम देखे, कई साधु-संन्यासियों से मिला, लेकिन कहीं भी शांति नहीं मिली. उल्टा हर जगह ‘धर्म का व्यापार’ दिखा. यहां तक कि कई आश्रमों में मुझे चिलम पीने का ऑफर किया गया और भीख मांगने को आजीविका का साधन बताया गया. मैं यह सब देखकर दुखी था. थक-हारकर मैं मातृ सदन पहुंचा और स्वामीजी (स्वामी शिवानंद) से मिला.’

गंगा के लिए संघर्ष कर रहे पर्यावरणविद स्वामी सानंद का निधन

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स्वामी शिवानंद से मिलकर चले संन्यास की राह
आत्मबोधानंद ने अखबार को बताया कि स्वामी शिवानंद से मिलने के बाद जीवन का उद्देश्य समझ में आ गया. उन्होंने बताया, ‘शुरुआत में मुझे स्वामीजी के आश्रम में आश्रम के सोशल मीडिया विभाग का काम दिया गया. फिर मेरी पढ़ाई और योग्यता को देखते हुए सीसीटीवी सिस्टम का और अंत में 40 गायों वाली गोशाला की देखभाल का जिम्मा भी मिला.’ वे बताते हैं कि स्वामी शिवानंद ने ही अल्लापुझा के युवा को संन्यास दिलाया और नया नामकरण किया, आत्मबोधानंद. गंगा को लेकर अनशन करने संबंधी सवाल पर आत्मबोधानंद बताते हैं कि आश्रम में रहते हुए ही गंगा नदी के लिए काम करने वाले साधुओं के बारे में पता चला. उनके जीवन और गंगा के प्रति लगाव को देखते हुए ही आत्मबोधानंद भी अनशन के मार्ग पर आ गए. लेकिन गंगा के लिए अनशन करने, साधुओं की मृत्यु और सरकार के रुख से वे दुखी भी हैं. उन्होंने अखबार को बताया कि 11 अक्टूबर को स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद (पूर्व में आईआईटी शिक्षक जीडी अग्रवाल) की 111 दिनों के अनशन के बाद मृत्यु हो गई. वे एम्स ऋषिकेश ले जाने से पहले तक ठीक थे. स्वामी सानंद की मृत्यु के लगभग डेढ़ महीने बाद 6 दिसंबर को आमरण अनशन करने वाले संत गोपाल दास गायब हो गए. आत्मबोधानंद का आरोप है कि संत गोपाल दास का ‘अपहरण’ कर लिया गया.

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मातृ सदन को आत्मबोधानंद की चिंता
आत्मबोधानंद के साथ-साथ मातृ सदन में रहने वाले लोग कहते हैं कि इन साधुओं की मृत्यु या गुम होने के पीछे साजिश है. टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ बातचीत में आश्रम के लोगों ने आरोप लगाया, ‘इन साधुओं की तबीयत ठीक रहती है, लेकिन जैसे ही सरकार इन्हें अस्पताल ले जाती है, इनके साथ हादसा हो जाता है. लोगों का कहना है कि प्रशासन जान-बूझकर साधुओं के साथ ऐसा कर रहा है. मातृ सदन के स्वामी शिवानंद को इन्हीं कारणों से आत्मबोधानंद की भी चिंता है. सदन में रहने वालों ने बताया कि प्रशासन लगातार दबाव बना रहा है, लेकिन हम लोग आत्मबोधानंद को आश्रम से बाहर नहीं ले जाने देंगे.