अपने निर्धारित लागत से कहीं अधिक खर्च करने के बाद आज चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा अपनी परियोजनाओं का एक चौथाई भी पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है. चीनी शासक और उनके ऋणदाता वित्तीय संस्थान बहुत समझदार थे. उन्होंने सबसे पहले उन परियोजनाओं को पूरा किया, जहां से तुरंत पैसा निकल सकता था और पाकिस्तान की सरकार के द्वारा उनके निवेश की वापसी (आरओआई) का आश्वासन दिया गया था. जहां भी ROI धीमा था, परियोजनाएं शुरू नहीं हो सकीं, जबकि उनकी लागत हर बीतते दिन के साथ बढ़ रही है. आइये एक-एक करके उन परियोजनाओं को समझते हैं… Also Read - Desert Knight 21: आसमान में पहली बार गरजे राफेल, भारत-फ्रांस की एयरफोर्स ने किया युद्धाभ्यास

1. बिजली उत्पादन परियोजनाएं
बिजली परियोजनाएं चीन के लिए महत्वपूर्ण थीं. चूंकि इन परियोजनाओं से पैसे की वसूली जल्द से जल्द होने वाली थीं और पाकिस्तान सरकार ने इन परियोजनाओं से बनने वाली सारी बिजली को ऊंचे दामों पर खरीदने का आश्वासन दिया था. इसलिए चीनी कंपनियों ने बहुत तेजी के साथ इस पर काम शुरू किया. कुल 23 बिजली परियोजनाओं की योजना बनाई गई, जो सभी कोयला आधारित थीं. इन 23 में से 16 पहले ही पूरे हो चुके हैं और चल रहे हैं. इन 16 पूरे हुए पावर प्रोजेक्ट्स में, चीनी बैंकों ने लगभग 55 अरब पाकिस्तानी रुपये का निवेश किया है और 4 साल के भीतर हर साल औसतन 70% से अधिक की दर से 450 अरब पाकिस्तानी रुपये से अधिक का लाभ प्राप्त किया है. Also Read - CHINA ने ट्रंप टीम में विदेश मंत्री रहे माइक पोम्पिओ, NSA समेत 30 पूर्व अफसरों पर लगाई पाबंदी

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इन चीनी बिजली उत्पादकों को लाभान्वित करने के लिए, पाकिस्तान के राष्ट्रीय इलेक्ट्रिक पावर विनियमन प्राधिकरण (एनईपीआरए या नेपरा) ने केवल साल 2020 में ही अपनी बिजली दरों में 19 बार वृद्धि की है. आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि पाकिस्तान में आवासीय उपयोग के लिए आज बिजली की दर प्रति यूनिट 25 रुपये से भी अधिक है. मैं यहां इस बात का उल्लेख करना चाहूंगा कि पाकिस्तान सरकार और चीनी कंपनियों के बीच हुए समझौते के अनुसार, नेपरा इन संयंत्रों द्वारा उत्पादित 100% बिजली खरीदने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है. अगर यह ऐसा नहीं करता है, तो चीनी कंपनियां पाकिस्तान पर कड़ा दंड लगा सकती हैं.

2. सड़क और रेल परियोजनाएं
चीन और पाकिस्तान ने अपने आर्थिक गलियारे के तहत सात प्रमुख सड़क और रेल परियोजनाओं की योजना बनाई, जिनमें से केवल मुल्तान-सुक्कुर सड़क का एक छोटा सा हिस्सा ही अभी तक पूरा हो सका है. सभी 3 प्रमुख रेल परियोजनाएं (एमएल -1, एमएल -2 और एमएल -3) और 2 सड़क परियोजनाएं को पैसे की कमी की वजह से रोक दिया गया है, जबकि काराकोरम राजमार्ग के केवल कुछ हिस्से ही निर्माणाधीन है. लाहौर मेट्रो की लागत कई गुना बढ़ गई है, जबकि इस पर अभी तक काम भी शुरू नहीं हो पाया है. आज पूरे चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की प्रासंगिकता दांव पर है. इससे होने वाले लाभों के ऊपर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है.

हाल ही में पाकिस्तान ने चीनी बैंकों से इन परियोजनाओं के लिए व्यावसायिक ब्याज दरों पर कुछ महंगा कर्ज प्राप्त करने के लिए फिर से संपर्क किया है. और यह तब है जब ये परियोजनाएं अभी तक शुरू भी नहीं हुई हैं. पहले दिया गया कर्ज पाकिस्तान के जनरल और भ्रष्टाचारी नेता हज़म कर चुके हैं.

3. विशेष आर्थिक क्षेत्र
पाकिस्तान ने इस गलियारे के अंतर्गत 9 विशेष आर्थिक क्षेत्रों की योजना बनाई थी. इनमें लाखों पाकिस्तानी युवाओं को रोजगार देने का वादा किया गया. पाकिस्तान की समृद्धि की बहुत ही शानदार तस्वीर अपनी बेवकूफ जनता के सामने पेश की. आज, गिलगित, मोहमंद, रशकायी, इस्लामाबाद, मीरपुर, बोस्तान, धबेजी और पोर्ट कासिम में स्थित आठ आर्थिक क्षेत्रों को शुरू होने का इंतजार है. केवल फैसलाबाद आर्थिक क्षेत्र में में कुछ निर्माण कार्य चल रहा है, जो भी धन की कमी के कारण अटक गया है. आज तक इन क्षेत्रों में एक भी कारखाना नहीं लगा है. ऐसा अनुमान है कि पाकिस्तान की मौजूदा वित्तीय स्थिति के चलते, 9 में से कोई आर्थिक क्षेत्र आकर नहीं ले पायेगा.

4. ग्वादर बंदरगाह क्षेत्र
बहुत सारे बेसिर-पैर के सपनों के साथ, चीन ने ग्वादर स्थित बंदरगाह क्षेत्र को विकसित करना शुरू किया था. पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अपनी जाहिल जनता को संजबाग दिखाए कि ग्वादर जल्द ही दुनिया का सबसे विकसित बंदरगाह बन जाएगा और पाकिस्तान में सोने की बारिश कर देगा. आज ये परियोजना अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है. विचित्र बात ये है कि इतना खर्च करने के बावजूद अभी तक 20% से भी कम काम पूरा हो पाया है. ग्वादर के हवाई अड्डे के लिए काम बहुत धूमधाम से शुरू हुआ था, लेकिन पिछले दो साल से काम बंद पड़ा है. इस हवाई अड्डे को 2017 में पूरा किया जाना था लेकिन यह अभी भी एक रेतीली पट्टी है जहां केवल छोटे प्रोपेलर वाले विमान ही उतर सकते हैं. पूरे ग्वादर स्पेशल इकोनॉमिक जोन में अब तक एक भी फैक्ट्री चालू हालत में नहीं है. जो निर्माण शुरू हुआ था वो भी पैसे की कमी की वजह से रुका हुआ है.

ग्वादर क्षेत्र में जिन सड़कों का निर्माण होना था वो सारी सड़क परियोजनाएं बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही हैं. जो रेल परियोजनाएं अभी तक चालू हो जानी थीं वे अभी तक शुरू भी नहीं हुई हैं. व्यापारिक जहाजों के लिए बनने वाली बर्थों का निर्माण बहुत धीरे चल रहा है और अभी तक केवल तीन बर्थ ही चालू हालत में हैं. यही नहीं, पिछले एक साल से ग्वादर पर कोई महत्वपूर्ण शिपिंग ट्रैफिक नहीं देखा गया और केवल चीनी नौसेना के जहाज ही इन बर्थों पर अक्सर दिखाई देते हैं. चीन यहां से कुछ दूर जीवानी में अपनी नौसेना के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण और जंगी सामान को जमा कर रहा है जो सारी दुनिया के लिए चिंता का विषय है. ग्वादर को एक वाणिज्यिक बंदरगाह बनाने की योजना थी, जो धीरे-धीरे एक चीनी नौसेनिक अड्डे में बदल रहा है.

संक्षेप में, हमारे पास यह मानने के समुचित कारण हैं कि कुछ आर्थिक रूप से अच्छी बिजली परियोजनाओं को छोड़कर, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की अन्य सभी परियोजनाएं वास्तविकता से कोसों दूर हैं. पाकिस्तानी शासकों और उनके जनरलों ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान और पाकिस्तान की समृद्धि की जो कहानी बुनी थी उसका बुलबुला अब फुट चुका है. इसका सबसे बड़ा कारण है देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, सैनिक नियंत्रण और दूरदर्शिता की कमी. यही कारण है कि पाकिस्तान की गिनती आज दुनिया के उन चंद देशों में होती है जिनकी अर्थव्यवस्था बर्बादी के कगार पर खड़ी है और उनके शासक चैन की बांसुरी बजा रहे हैं….

( अमित बंसल रक्षा मामलों के जानकार हैं. अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े विषयों पर उनकी गहरी रुचि है. वह लेखक, ब्लॉगर और कवि भी हैं.)

इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक की निजी राय है.