16 अगस्त 2018 की शाम 5 बजे के बाद का वक्त था. स्वर्ग के एक स्वप्निल से बाग में गांधी और नेहरू, अपने पुराने देश भारत के बारे में घूमते हुए बतिया रहे थे. खुशनुमा माहौल था. हाल ही में स्वर्ग पहुंचे द्रमुक नेता करुणानिधि भी गांधी-नेहरू से दूरी बनाए हुए बहुत दिनों बाद व्हीलचेयर से दूर आहिस्ते-आहिस्ते क्यारियों के किनारे चहलकदमी कर रहे थे. अस्ताचलगामी सूर्य संकेत दे रहा था कि कुछ ही देर में वह डूबने वाला है, जिसे देखकर दोनों बुजुर्गवार (गांधी-नेहरू) अपने-अपने कमरों की तरफ लौटे. Also Read - दक्षिण अफ्रीका में धोखाधड़ी के जुर्म में महात्मा गांधी की पड़पोती को 7 साल की जेल

अभी ये दोनों अपने कमरे के बरामदे में रखे आर्म-चेयर पर बैठकर जूस वाला ग्लास उठाने ही वाले थे, इतने में स्वर्ग के दरवाजे पर दस्तक हुई. कमरों में हरकत हुई. चंद आंखें दरवाजे की ओर लपकीं. दिखा, श्वेत-शुभ्र वेशभूषा में भगवा पट्टी कांधे पर डाले एक लंबा-चौड़ा व्यक्तित्व स्वर्ग में दाखिल हो रहा था. करुणानिधि, धोती-कुर्ताधारी मानव को देखते ही समझ गए ‘हिन्दी’ पट्टी वाला है, इसलिए कमरे से बाहर निकलने की जहमत नहीं उठाई. लेकिन, आर्म-चेयर पर बैठे गांधी और नेहरू की पीठ जरूर सीधी हो गई. गांधी और नेहरू ने समवेत स्वर में आगंतुक की आगवानी की…, पूछा- आ गए…! आओ! आगंतुक अटल बिहारी वाजपेयी थे. धरती पर रहते हुए इन दोनों महामानवों को वाजपेयी ने देखा था, इसलिए स्वभावतः अभिवादन में दोनों हाथ जुड़ गए. प्रणाम कहने के लिए दोनों अधरों में हरकत हुई, लेकिन आदतन ‘पॉज’ आड़े आ गया. चंद पलों के बाद शब्द फूटे- प्रणाम राष्ट्र…पिता…, प्रणाम ‘देश के राज…कुमार…’! Also Read - प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की 57वीं पुण्य तिथि, बेहद अहम है आज का दिन

स्वर्ग में गांधी और नेहरू से मुलाकात के बाद वाजपेयी ने वहां पहले से रह रहे दीनदयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी से भी मुलाकता कर ली. गोलवलकर या हेडगेवार से उनका सांकेतिक संवाद ही हो सका, क्योंकि इस बीच धरती पर वाजपेयी से संबंधित घट रही घटनाओं के कारण स्वर्ग में भी हलचल तेज हो गई थी. देश-विदेश के कई नेताओं की आत्माओं के बीच भारत में वाजपेयी की अस्थियों के विसर्जन की चर्चाएं जारी थीं. इन चर्चाओं में गांधी और नेहरू, न चाहते हुए भी आ ही जाते थे. लिहाजा ये दोनों भी चर्चाओं से बचकर कब तक रहते. सो, धरती पर वाजपेयी की ‘स्मृतियों’ के इस महिमामंडन को लेकर तीनों साथ बैठ ही गए. संवाद शुरू हुआ. Also Read - Mahatma Gandhi's Personal Secretary Kalyanam Dies: महात्मा गांधी के निजी सचिव कल्याणम का 99 साल की उम्र में निधन

Asthi-Kalash

नेहरू ने वाजपेयी से कहा- क्यों? अब तो तुम भी मेरे और बापू की श्रेणी में पहुंच गए.

वाजपेयी के मुख पर हल्की हंसी की आभा आते-आते रह गई. होंठ कांपे और लगा जैसे कुछ बोलना चाह रहे हों, लेकिन अभी गांधी ने कुछ कहा नहीं था, इसलिए चुप ही रहे.

गांधी ने टोका- क्या इसकी जरूरत थी?

नेहरू ने हस्तक्षेप किया- ये नकल है हमारी!

गांधी बोले- उसको बोलने तो दो.

वाजपेयी ने सिर को हल्की सी जुम्बिश दी और कहा- ये मेरा मत नहीं था. पार्टी का निर्णय है. मैं इसके खिलाफ कभी नहीं गया. पार्टी का आदमी हूं, हमेशा पार्टी के दिशा-निर्देशों का पालन करूंगा. आपको तो मालूम ही होगा 1992 और 2002 में भी मैंने पार्टी-लाइन नहीं छोड़ी थी. और जहां तक रही नकल की बात… व्यक्तिगत आक्षेप कभी नहीं किया. इतनी मर्यादा मैंने हमेशा रखी है.

नेहरू से रहा न गया- यह नकल नहीं तो और क्या है. क्या बापू और देश के पहले प्रधानमंत्री की तरह तुम्हारा महिमामंडन नहीं किया जा रहा है?

वाजपेयी ने लंबा ‘पॉज’ लिया और बोले- बापू तो राष्ट्रपिता थे. उनकी बात छोड़िए… आपने (नेहरू ने) तो लिखा भी था कि आपकी अस्थियां भारत के कण-कण में मिला दी जाएं. मैं नहीं चाहता था कि मेरे साथ वह सब हो, जो आडवाणी के साथ हो रहा है. इसलिए सत्ता से ‘विमुख’ होने के कुछ ही दिनों बाद मैंने सक्रिय राजनीति छोड़ दी थी. (पॉज) मेरे रहते पार्टी ने जो किया, सो किया. मेरे निधन के बाद अब अगर पार्टी किसी उद्देश्य से अस्थियों को देश के विभिन्न प्रांतों की विभिन्न नदियों में प्रवाहित कर रही है, तो यह उसका राजधर्म होगा.

नेहरू- मैं सब समझ रहा हूं. बापू और मेरे जाने के बाद तुम लोगों के ऊपर देश की राजनीति को सही दिशा में ले जाने की जिम्मेदारी थी, लेकिन देखो, अब देश किस तरफ जा रहा है.

वाजपेयी ने कई बार पलकें झपकाईं और कहा- भारत की राजनीति की दिशा क्या हो, यह हम लोगों ने नहीं, बल्कि आपके ‘दिखाए रास्ते’ पर चलने वाली आपकी पार्टी ने तय किया. हम लोगों ने तो अपना अधिकतर समय विपक्ष में गुजारा. कुछ दिनों के लिए पक्ष में आए भी तो ‘कई दूसरों’ के साथ. इसलिए हम पर ये इल्जाम न लगाइए.

Kalash-Yatra

अबकी बार गांधी बोले- लेकिन, अस्थियों को प्रवाहित करने पर क्या बोलोगे? क्या लोकतंत्र की रक्षा से ज्यादा चुनाव जीतना जरूरी है? क्या ये जनता के साथ छल नहीं है?

राष्ट्रपिता के इस कथन से बैठक में चुप्पी छा गई. इतने में धरती पर वाजपेयी की अस्थियों को अपने-अपने राज्यों में ले जाने के लिए विभिन्न राज्यों के भाजपाध्यक्षों का जुटान शुरू हो गया था. एक-एक कर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, झारखंड आदि प्रदेशों के अध्यक्ष अमित शाह से पूर्व प्रधानमंत्री के अस्थि-कलश ग्रहण कर रहे थे. धरती पर हो रहे समारोह से स्वर्ग में हो रही इस बैठक का कोलाहल बढ़ रहा था. जीवन और मृत्यु के परे जाकर सानंद रह रहीं आत्माएं, मुस्कुरा रही थीं. वहीं वाजपेयी असहज हो रहे थे. वाजपेयी, जिन्होंने मृत्यु से ज्यादा जीवन को तरजीह दिया (मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं) और मृत्यु से दो-दो हाथ करने की बात कही (तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आजमा), उन्हें धरती पर उनकी मृत्यु के बाद अस्थियों का ये महिमामंडन असहज कर रहा था.

ये संवाद काल्पनिक है.

लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.