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कूर्म पुराण में कहा गया है कि गृहस्थ को दैनिक आचरण में जीव हिंसा का निषेध, असत्य भाषण से परहेज और चोरी यानी चौर-कर्म से दूर रहना चाहिए. चोरी के संदर्भ में तो यहां तक लिखा गया है कि किसी का तिनका भी चुराने का भाव आपके मन में नहीं आना चाहिए, वरना नर्क में जाना पड़ता है. या फिर नारकीय यातनाएं भोगनी पड़ती है. लेकिन जरा उस चोर के बारे में सोचिए, जिसने पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के अंतिम संस्कार के दिन दिल्ली के निगम बोध घाट पर आए कई माननीयों के मोबाइल फोन चुरा लिए! क्या उसे नारकीय यातनाएं भोगने का डर नहीं लगा? क्या उसे यह नहीं पता था कि जिस भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो समेत 11 अति-विशिष्ट लोगों के फोन वह चुरा रहा है, वह कितना बड़ा अपराध है. देश को टैक्स-चोरों से ‘निजात’ दिलाने वाले और जीएसटी देकर भांति-भांति की कर-चोरियां रोकने वाले पूर्व वित्त मंत्री के अंतिम संस्कार में ही फोन चुराने वाला उस शख्स की मानसिकता का अध्ययन, निश्चित ही जरूरी है.
अरुण जेटली के अंतिम संस्कार के दिन फोन चुराने वाले उस चोर ने शायद नारद पुराण भी नहीं पढ़ा होगा, जिसमें यह स्पष्ट लिखा है कि कंद-मूल फल की चोरी, कस्तूरी, वस्त्र और धातुओं- लोहा, सीसा, कांसा की चोरी भी स्वर्ण यानी सोने की चोरी के समान ही मानी जाती है. किसी भी प्रकार के भोज्य पदार्थ की चोरी को भी शास्त्रीय दृष्टि से स्वर्ण-चोरी के समान ही समझा गया है. मोबाइल फोन में तो कई तरह के धातु शामिल होते हैं. यानी उसकी चोरी भी स्वर्ण-चोरी के समान ही हुई न! ऐसे अपराध करने वालों को पातक का भागी बनना पड़ता है. यानी इस अक्षम्य और गंभीरतम अपराध के लिए उसे कड़ी से कड़ी सजा दी जा सकती है. फिर भी उस चोर ने माननीय सांसद और पतंजलि जैसी स्वदेशी कंपनी के अधिकारी के फोन चुरा लिए! हद है भई!
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इन दोनों पुराणों के उदाहरण से एक बात तो तय मानी जा सकती है कि पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के अंतिम संस्कार में आया वह चोर, निश्चित रूप से गृहस्थ यानी विवाहित नहीं रहा होगा. अगर ऐसा होता तो उसे नारकीय यातना का डर होता. बीवी-बच्चों की चिंता होती कि उसके जेल जाने के बाद उनका भरण-पोषण कौन करेगा. दूसरा, वह चोर अपराध करने से भी नहीं डरता होगा, क्योंकि अगर ऐसा होता तो उसके मन में पातक का भागी बनने का डर होता. भारत जैसे धर्म परायण देश में यह कैसा चोर है, जिसे शास्त्रीय कथ्यों का ज्ञान नहीं है. धर्म की हानि होता देख, जो देशवासी आज सनातनी होने की ओर पिल पड़े हैं, उनके बीच यह व्यक्ति कहां से आ गया, जिसने अंतिम संस्कार जैसी क्रिया के बीच चोरी जैसे नारकीय-कर्म को करने का दुःसाहस किया.
तीसरी बात कि उस दुःसाहसी चोर को दिल्ली पुलिस की कार्यशैली का भी पता होगा, जो सीसीटीवी कैमरों के बावजूद अपराध नियंत्रण में नाकाम रह जाती है. छिटपुट मोबाइल फोन चोरी की घटनाओं को फिर क्या नोटिस करती होगी पुलिस, कुछ यही सोचकर उसने अपने ‘स्किल’ का परिचय दिया होगा. अभी कुछ ही दिन पहले तो जब दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे से देश के सॉलिसिटर जनरल की पत्नी का फोन सरेआम चुरा लिया गया, तो फिर पुलिस अंतिम संस्कार के समय फोन चोरी की घटना पर क्यों ध्यान देगी.
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निश्चित रूप से वह राजनीतिक चोर रहा होगा. बिल्कुल! कहीं वह विपक्षी दलों का भेजा चोर तो नहीं था, जो ‘देशस्तर के चोरों’ के खिलाफ ईडी और सीबीआई की लगातार कोशिशों का ‘बदला’ लेने अरुण जेटली के अंतिम संस्कार में पहुंचा था. अगर ये सब कारण नहीं थे, तो फिर अब क्या बचा जिसके आधार पर 11 लोगों के फोन चुराने वाले शख्स का पोस्टमार्टम किया जाए. अति-विशिष्टों की भीड़ के बीच देश की राजधानी में इस तरह की चोरी करने वाले शख्स की पहचान जरूरी है. आखिरकार ये माननीयों का मामला है. अरुण जेटली के अंतिम संस्कार में सब माननीय ही तो पहुंचे नहीं थे, कुछ ‘आम-कटहल जैसे लोग’ भी थे. जो भी हो, इस हाई-प्रोफाइल चोरी से दिल्ली पुलिस यह बात जरूर समझ गई है कि अब से अगर कोई ‘बड़ा’ अंतिम संस्कार हो, तो वहां फोन चोर पहुंच सकते हैं. इसलिए अगली बार ऐसे किसी कार्यक्रम में निगम बोध घाट पर अलग से कुछ हवलदार तैनात किए जा सकते हैं.
डिस्क्लेमरः इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.
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