नई दिल्ली. एक युवा खेतिहर मजदूरों के अधिकारों के लिए गांव में नमक के दो बोरों के ऊपर चढ़कर भाषण देकर चर्चित होता है. इमरजेंसी के खिलाफ मीसा के तहत सबसे नौजवान बंदी होता है. उसके पास चुनाव लड़ने के लिए पैसे नहीं होते हैं और वह लोगों से पैसे मांगने के लिए ‘वन वोट, वन नोट’ का नारा देता है. सांसद बनने के बाद भी वह अपने जिले में इतना पैदल चलता है कि लोग उसे ‘पांव-पाव वाले भैया’ कहने लगते हैं. उसकी पार्टी ही नहीं, विपक्षी भी जिसे ये कहते हैं कि उसका बॉडी लैंग्वेंज मुख्यमंत्री वाला नहीं है. वह लगातार 13 साल तक उस प्रदेश का मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि बीजेपी का पोस्टर ब्वॉय बनता है, जहां बीजेपी का मतलब अटल बिहारी वाजपेयी या फिर उमा भारती हुआ करतीं थीं. हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की. Also Read - MP ByPolls 2020: धरने पर बैठे शिवराज सिंह चौहान, बोले- महिलाओं का अपमान नहीं करेंगे बर्दाश्त

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मध्य प्रदेश के सिहोर जिले के छोटे से गांव जैत के रहने वाले शिवराज का सफर गांव में नमक के दो बोरों पर चढ़कर भाषण देने से आज लाखों की भीड़ को संबोधित करने तक जा पहुंचा है. ‘न काहू से दोस्ती और न काहू से बैर’ की बात बोलने वाले शिवराज की कूटनीति ऐसी है कि एक समय बीजेपी का चेहरा और राज्य की सीएम रहने वाली उमा भारती लोकसभा का चुनाव तक उस राज्य से नहीं लड़ती हैं. वह अपने बॉडी लैंग्वेज से हमेशा एक मैसेज देना चाहते हैं कि मुख्यमंत्री आम जनता के बीच का शख्स होता है और वह वही आम आदमी हैं. पिछले 13 साल से बीजेपी के अंदर के लोग हों या फिर कांग्रेस, किसी के पास भी उनकी काट नहीं है. Also Read - शिवराज को जनता ने सत्ता से हटाया, फिर भी बाज नहीं आए, रोज 3 झूठ बोलते हैं: कमलनाथ

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चुप्पा चौहान

शिवराज सिंह चौहान को मध्यप्रदेश की राजनीति में कुछ लोग ‘चुप्पा चौहान’ तक कहते हैं. इसके पीछे तर्क देते हैं कि वह क्या करने वाले होते हैं, इसके बारे में उनकी पत्नी को भी नहीं पता होता है. उमा भारती का मध्य प्रदेश से कथित वनवास हो या शिवराज के करीबी प्रभात झा का मध्य प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष पद से हटाया जाना, ये बताता है कि शिवराज जो करने वाले होते हैं उसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता होता है. वह अपने किस शत्रु या मित्र के बारे में क्या सोच रहे होते हैं, इसके बारे में उनके करीबी को भी कुछ नहीं पता होता है. प्रभात झा ने तो सार्वजनिक मंच से कह दिया था, ‘यह शिवराज हैं. इनके मन में क्या है, किसी को नहीं पता लगता.’

अटल-उमा के एमपी में शिवराज

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मध्यप्रदेश से ही ताल्लुक रखते थे. वह वहां से सांसद भी चुने गए. इसके बाद उमा भारती के रूप में बीजेपी को एक फायर ब्रांड नेता मिला, जिसने दिग्विजय सिंह जैसे कद्दावर नेता को पटखनी दी और सीएम की कुर्सी तक पहुंची. लेकिन, एक बार शिवराज सिंह चौहान साल 2005 में जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे, वह आज तक राज्य में बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे के रूप में बने हुए हैं. पूरा चुनाव उनके नाम पर लड़ा जा रहा है.

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क्या है पॉलिटिक्स

शिवराज सिंह चौहान की पॉलिटिक्स अटल बिहारी वाजपेयी के नक्शे कदम पर चलती हुई दिखती है. वह एक तरफ आरएसएस के करीब रहते हैं और समय-समय पर संघ कार्यालय जाते रहते हैं. दूसरी तरफ वह चाहें नीतीश कुमार हों या कोई और उससे सम्मानपूर्वक मिलते हैं. सोनिया गांधी के विदेश मूल का मुद्दा हो या फिर राहुल गांधी पर कोई बयानबाजी, शिवराज सिंह चौहान हमेशा से व्यक्तिगत बयानबाजी से दूरी बनाए हुए दिखते हैं. यहां तक कि वह राज्य के मुसलमानों के लिए सरकारी खर्च से तीर्थयात्रा तक का इंतजाम कराते हैं.

सीएम बनने की कहानी

बीजेपी साल 2003 का चुनाव उमा भारती के नेतृत्व में लड़ी और दिग्विजय सिंह की सरकार को करारी शिकस्त दी. इसके बाद उमा भारती राज्य की सीएम बनीं. लेकिन कर्नाटक के हुबली में 10 साल पहले हुए एक सांप्रदायिक दंगे में उमा का नाम आने के बाद उनके खिलाफ वारंट जारी हो गया. इसका इतना दबाव पड़ा कि उमा भारती को इस्तीफा देना पड़ा. कहा जाता है कि इसके बाद उमा भारती ने अपने करीबी बाबूलाल गौर को सीएम बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे केंद्रीय नेतृत्व ने स्वीकार कर लिया. लेकिन, कुछ ही महीने बाद बाबूलाल और उमा भारती के बीच विवाद की खबरें आने लगी. बाबूलाल केंद्रीय नेतृत्व से भी संतुलन बनाने में नाकामयाब होने लगे और ऐसे में एक बार फिर राज्य में नए मुख्यमंत्री की चर्चा शुरू हुई. आडवाणी ने संसदीय बोर्ड की बैठक बुलाई और उसमें एक बार फिर उमा भारती को सीएम बनाने की बात निकली. लेकिन इसी बीच शिवराज सिंह चौहान पर चर्चा शुरू हुई और अंत में उनके नाम पर ही मुहर लग गई. वह उस समय प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष थे. 29 नवंबर 2005 को उन्होंने सीएम पद की शपथ ली.

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‘वन वोट, वन नोट का किस्सा’

साल 1991 में शिवराज को बीजेपी ने बुधनी सीट से टिकट दे दिया. लेकिन चुनाव प्रचार के लिए शिवराज के पास पैसे नहीं थे. कहा जाता है कि शिवराज ने उस दौरान ‘वन वोट, वन नोट’ का नारा दिया. उन्होंने अपील की कि लोग उन्हें एक वोट दें और एक नोट भी दें. उन्होंने पूरा चुनाव जनता के पैसे से लड़ा और जीतकर विधानसभा पहुंचे. हर नेता की तरह शिवराज के भी कई किस्से प्रचलित हैं. उनके गांव के लोग बताते हैं कि वह लोगों से बस का किराया मांग कर राजनैतिक यात्राएं करते थे. वहीं, कई लोग ये भी बताते हैं कि कैसे उन्हें नाश्ता कराया था. शिवराज दर्शन शास्‍त्र में एमए हैं, जिसमें उन्हें गोल्ड मेडल भी मिला था.

ऐसे बने ‘पांव-पांव वाले भैया’

शिवराज ने खुद को हमेशा एक गरीब किसान का बेटा बताया है. अटल बिहारी वाजपेयी के इस्तीफे के बाद जब वह साल 1992 में पहली बार सांसद बने तो केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. संसदीय क्षेत्र में लोगों को जोड़ने के लिए वह लगातार पदयात्रा पर रहते थे. उन्हें कई बार पूरे संसदीय क्षेत्र की पदयात्रा की. इसी बीच विदिशा में लोग उन्हें ‘पांव-पांव वाले भैया’ कहने लगे.

वाजपेयी की विरासत मिली

साल 1991 में अटल बिहारी वाजपेयी ने विदिशा लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया. ऐसे में महज एक साल तक विधायक रहे शिवराज को बीजेपी ने उस सीट से उम्मीदवार बना दिया. शिवराज चुनाव जीत गए और सबसे कम उम्र के सांसद बने. शिवराज ने जब मध्य प्रदेश की सत्ता संभाली तो उन्हें विरासत में बीमारू का टेग लगा प्रदेश मिला, जिसे वह हटाने में कामयाब रहे.

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व्यक्तिगत जीवन

किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले शिवराज सिंह चौहान का जन्म 5 मार्च 1959 को सिहोर जिले के जैट गांव में हुआ था. 16 साल की उम्र में वह एबीवीपी से जुड़ गए. भोपाल के मॉडल हायर सेकंडरी स्कूल के छात्रसंघ अध्यक्ष बने. बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से एमए (दर्शनशास्त्र) में उन्हें गोल्ड मेडल मिला. इस बीच वह आरएसएस के करीब आ गए. साल 1975 में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई तो वह साल 1976-77 के बीच नौ महीने के लिए जेल गए. मीसा के तहत सबसे नौजवान बंदी रहे. जेल से निकलने के बाद एबीवीपी के संगठन मंत्री बने. साल 1988 में वह एबीवीपी के मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष बने. 1991 में विधायक, 1992 में सासंद, 1992 में वह भारतीय जनता युवा मोर्चा के जनरल सेक्रेटरी, 1996, 1998, 1999 और 2004 में भी लगातार लोकसभा चुनाव जीते. साल 2000 से 2003 के बीच वह भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे. 2005 में बीजेपी के मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष बने. 29 नवंबर 2005 को वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने.

आरोप

मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज सिंह चौहान पर सबसे पहला आरोप डंपर खरीद का लगा था. आरोप था कि उनकी पत्नी साधना सिंह के नाम पर कथित तौर पर चार डंपर खरीदे गए थे, जो फायनेंस कराने वाली सीमेंट कंपनी में लगाए गए थे. हालांकि, इस मामले में शिवराज को कोर्ट से क्लीन चिट मिल गई थी. इसके बाद व्यापम ऐसा घोटाला है, जिसमें आज भी तरह-तरह की बातें बनती रहती हैं. दूसरी तरफ शिवराज पर खनिज माफ़िया को कथित तौर पर संरक्षण देने का आरोप भी लगा.