नई दिल्ली. भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब दुनिया को नई दिशा देने की ओर आगे बढ़ रहा है. इस कार्यक्रम के तहत भारतीय वैज्ञानिकों ने अब अपना ध्यान चंद्रमा से मिलने वाली ऊर्जा पर लगाया है. चांद पर परमाणु ऊर्जा की खोज में जुटे वैज्ञानिकों का शोध अगर पूरा हुआ तो दुनिया की अगले 250 साल तक की ऊर्जा जरूरतें पूरी हो जाएंगी. यानी भारतीय वैज्ञानिक चंद्रमा पर ऐसे ‘बिजली-घर’ की तलाश में हैं, जिसके मिल जाने के बाद पूरे विश्व को न्यूक्लियर इनर्जी से रोशन किया जा सकेगा. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार चंद्रमा को लेकर भारतीय वैज्ञानिकों का यह अनुसंधान, दुनिया में अपनी तरह का अनोखा है. भारत अक्टूबर में चंद्रमा पर जाने वाला एक रोवर लॉन्च करने वाला है. यह चंद्रमा पर पानी और हीलियम-3 के संकेतों का विश्लेषण करेगा. वैज्ञानिकों के अनुसार चंद्रमा पर हीलियम-3 के आइसोटोप (समस्थानिक) इतनी प्रचुर मात्रा में हैं कि ये आगामी 250 सालों के दुनिया की ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं.Also Read - ISRO Recruitment 2021: ISRO में बिना परीक्षा के इन पदों पर मिल सकती है नौकरी, बस करना होगा ये काम, मिलेगी अच्छी सैलरी

इसरो चेयरमैन बोले- विश्व का नेतृत्व करेंगे हम
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO के चेयरमैन के. सिवान भी इस कार्यक्रम को लेकर उत्साहित हैं. उन्होंने ब्लूमबर्ग को बताया, ‘चंद्रमा पर परमाणु ऊर्जा की खोज कई देश कर रहे हैं. जिन देशों के पास इसे खोजकर धरती पर लाने की क्षमता है, वे इस पूरी प्रक्रिया को आगे ले जाएंगे. भारत इस प्रक्रिया में इन देशों के साथ ही नहीं चलना चाहता, बल्कि आगे बढ़कर उनका नेतृत्व करना चाहता है.’ बता दें कि ‘मिशन-मून’ की दौड़ में अमेरिका, चीन, भारत, जापान और रूस के वैज्ञानिक पिछले कई वर्षों से लगे हुए हैं. कई विदेशी उद्योगपति- एलन मस्क, जेफ बेजोस और रिचर्ड ब्रैंसन जैसे दिग्गज भी अंतरिक्ष में अपने सैटेलाइट लॉन्च करने की दिशा में काम कर रहे हैं. 1982 में इसरो ज्वाइन करने वाले एयरोनॉटिक्स इंजीनियर के. सिवान ने कहा कि हम इस अभियान के लिए तैयार हैं. Also Read - Chandrayaan-2 Latest News: चंद्रयान-2 ने चंद्रमा के कक्ष में करीब 9,000 परिक्रमा पूरी की, ISRO ने जारी किये आंकड़े

चंद्रयान-1 अक्टूबर 2008 में लॉन्च किया गया था. (फोटो साभारः इसरो)

चंद्रयान-1 अक्टूबर 2008 में लॉन्च किया गया था. (फोटो साभारः इसरो)

नासा के मुकाबले 10 गुना कम बजट
अंतरिक्ष अनुसंधान में विश्व के अग्रणी देशों में शुमार अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में चंद्रमा संबंधी शोधकार्यों से अपना ध्यान हटा लिया था. लेकिन चंद्रमा के प्रति दुनिया के दूसरे देशों की दिलचस्पी को देखते हुए यह देश एक बार फिर इस दिशा में बढ़ रहा है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी हाल ही में अपने अंतरिक्ष विज्ञानियों को एक बार फिर से चंद्रमा पर ध्यान देने को कहा है. इस क्रम में अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी NASA ने 19 अरब रुपए का प्रस्ताव सरकार को दिया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इससे संबंधित आदेश पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं. इसको लेकर नासा ने वर्ष 2020 में ल्यूनर ऑर्बिटर यान को चांद पर भेजने की योजना बनाई है. अमेरिकी सरकार के इस प्रोजेक्ट को देखें तो आर्थिक दृष्टि से भारत सरकार का ‘मिशन-मून’ इससे कई गुना कम है. ISRO का इस प्रोजेक्ट के लिए अनुमानित बजट मात्र 1.7 अरब रुपए का है. Also Read - ISRO Recruitment 2021: ISRO में इन विभिन्न पदों पर आवेदन करने की आज है अंतिम डेट, 10वीं पास करें अप्लाई, 63000 होगी सैलरी

भारत का पहला चंद्रयान मिशन भी रहा है सफल
भारतीय वैज्ञानिकों का चंद्रमा संबंधी अनुसंधान पहली बार नहीं है. इन्हीं वैज्ञानिकों की मेहनत की बदौलत भारत ने अपना चंद्रयान-1 मिशन भी पूरा किया है. अक्टूबर 2008 में ISRO द्वारा लॉन्च किए गए चंद्रयान-1 ने पहली बार चंद्रमा पर पानी के होने के प्रमाण दुनिया को दिए थे. चंद्रयान-1 ने लॉन्च होने के बाद करीब 1 दशक में चंद्रमा के 3400 से ज्यादा चक्कर लगा लिए हैं और यह अब भी वैज्ञानिकों के लिए जरूरी डाटा भेज रहा है. चंद्रयान-2 मिशन इसी साल अक्टूबर में लॉन्च होने वाला है. इस यान के साथ ऑर्बिटर, लैंडर और एक रोवर भी होगा. 6 पहियों वाला यह रोवर पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित है. ISRO का अनुमान है कि लॉन्च होने के 14 दिनों बाद यह धरती पर जरूरी सूचनाएं भेजना शुरू कर देगा. चंद्रमा पर घूमने वाला रोवर सूचनाएं इकट्ठा कर लैंडर को भेजेगा, लैंडर इन सूचनाओं को विश्लेषित कर धरती पर संप्रेषित करेगा.

हीलियम-3 के जमा होने के कारण ढूंढेगा चंद्रयान-2
अमेरिका के अपोलो मिशन से यह बात साबित हो चुकी है कि चंद्रमा पर हीलियम-3 प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. अपोलो-17 मिशन के तहत वर्ष 1972 में चंद्रमा पर उतरने वाले अंतरिक्ष यात्री जियोलॉजिस्ट हैरिसन स्किमिट ने भी हीलियम-3 के खनन की संभावनाएं जताई थीं. भारत का चंद्रयान-2, चंद्रमा पर इसी हीलियम-3 के जमा होने के कारणों की पड़ताल करेगा. दरअसल, सूर्य की तरफ से चलने वाली हवाएं चंद्रमा पर लगातार हीलियम-3 की बरसात करती रहती हैं. ये हवाएं हमारी धरती पर भी आती हैं, लेकिन पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र इन हवाओं से हमारे वातावरण को बचा लेता है. वहीं, चंद्रमा पर इन सौर हवाओं को रोकने के लिए कोई कवच नहीं है, इसलिए बड़ी तादाद में हीलियम-3 इकट्ठा होता जाता है.

चंद्रयान-1 की सफलता से भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी महत्ता साबित की.

चंद्रयान-1 की सफलता से भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी महत्ता साबित की.

हीलियम-3 से रोशन होगी हमारी धरती
हीलियम-3 परमाणु ऊर्जा का अपार स्रोत है. यूरोपियन स्पेस एजेंसी के अनुसार, ‘हीलियम-3 परमाणु ऊर्जा का सुरक्षित स्रोत है. परमाणु ऊर्जा पैदा करने वाले अन्य रासायनिक तत्वों की तुलना में यह रेडियोएक्टिव नहीं है. साथ ही अन्य तत्वों की तरह इसके अपशिष्ट भी नहीं होते. इसलिए मानव के लिए हीलियम-3 सुरक्षित परमाणु ऊर्जा के विकल्प के तौर पर सबसे सही स्रोत है.’ नासा की सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य और विस्कॉन्सिन-मेडिसन यूनिवर्सिटी के फ्यूजन टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर गेराल्ड कुलसिंस्की ने बताया कि एक अनुमान है कि चंद्रमा पर हीलियम-3 का 10 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा बड़ा भंडार है. इसमें से एक चौथाई मात्रा ही धरती पर लाई जा सकती है.

1 टन हीलियम-3 की कीमत 5 अरब रुपए
फ्यूजन टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर गेराल्ड कुलसिंस्की ने बताया कि चंद्रमा पर मौजूद हीलियम-3 के एक चौथाई हिस्से से ही धरती पर दो-तीन सदियों के लिए ऊर्जा की जरूरत पूरी हो सकती है. उन्होंने बताया कि जितनी तादाद में चंद्रमा पर यह रासायनिक तत्व है, उसका बहुत कम ही हिस्सा हमारी धरती पर अभी मौजूद है. हीलियम-3 की कीमत का अनुमान लगाते हुए उन्होंने बताया कि 1 टन हीलियम-3 की अनुमानित कीमत करीब 5 अरब रुपए है. आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि ढाई लाख टन हीलियम-3 की कीमत अरबों-खरबों रुपए तक जा सकती है. हालांकि इसमें अभी कई कठिनाइयां हैं. हीलियम-3 को इकट्ठा करना, उसे धरती पर लाना, यहां इसके अनुरूप फ्यूजन सेंटर बनाकर उस तत्व को ऊर्जा में तब्दील करना कठिन कार्य है.