‘उठो, जागो और तब तक भागते रहो, जब तक तुम्हें तुम्हारे लक्ष्यों की प्राप्ति न हो जाए’- स्वामी विवेकानंद Also Read - Yuva Sansad महोत्सव में बोले पीएम नरेंद्र मोदी- वंशवाद देश के लिए खतरा, युवा करें इसका खात्मा

Swami Vivekananda Birth Anniversary: भारत का बच्चा-बच्चा इस वाक्य से वाकिफ है. यह कथन स्वामी विवेकानंद का है. स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 में हुआ था. स्वामी विवेकानंद कलकत्ता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्में थे. यहां से पढ़ाई खत्म करने के बाद वे गुरु की तलाश करते करते रामकृष्ण परमहंस से मिलते हैं और नरेंद्र समय के साथ स्वामी विवेकानंद बन जाते हैं. Also Read - अपनी विचारधारा को प्राथमिकता देने की बात ने देश की लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था को बड़ा नुकसान पहुंचाया: मोदी

स्वामी विवेकानंद को याद करने के वैसे तो कई कारण हैं लेकिन उनमें से एक कारण है 11 सितंबर 1983 का विश्व धर्म सम्मेलन, जिसका आयोजन अमेरिका के शिकागो में किया गया था. इस भाषण को 128 साल बीत चुके हैं लेकिन आज भी इस धर्म सम्मेलन और इसमें दिए गए स्वामी विवेकानंद के भाषण को याद किया जाता है. हालांकि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज यंग इंडिया, न्यू इंडिया पर संबोधन देने वाले हैं. बता दें कि UGC ने सभी विश्वविद्यालयों को उनकी पुण्यतिथि मनाने का निर्देश दिया है. Also Read - JNU कैंपस में PM मोदी आज Swami Vivekananda की आदमकद मूर्ति का अनावरण करेंगे

बता दें कि 11 सितंबर 1983 को विश्व धर्म सम्मेलन में जाने के इच्छुक स्वामी विवेकानंद के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे वहां जाएं और कुछ दिन ठहर सकें. लेकिन जैसे तैसे उनके एक अनुयायी ने उन्हें वहां भेजा और वे जब विश्व धर्म सम्मेलन की हॉल में पहुंचे तो साधारण वस्त्रों में वे दिखाई दिए. इस दौरान सम्मेलन के हॉल में सभी धर्म के लोग अपने अपने धर्मों की वकालत कर रहे थे और सबसे बड़ा, अनोखा अपने धर्म को बता रहे थे.

ऐसे में जब स्वामी विवेकानंद मंच पर पहुंचे तो लोगों के मन में उन्हें देखकर कहीं न कहीं ये सवाल था कि ये भारतीय आखिर क्या ही बोल सकता है. लेकिन जैसे ही विवेकानंद ने पहली लाइन कही उसके बाद पूरा हॉल तॉलियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया जो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था. अपने संबोधन में उन्होंने जैसे ही कहा मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों इसके बाद पूरे हॉल में सिर्फ तालियां ही सुनाई पड़ रही थीं.

विवेकानंद क्यों गए थे विश्व धर्म सम्मेलन में

कहा जाता है कि विवेकानंद से उनके कई अनुयायियो ने विश्व धर्म सम्मेलन जाने का सुझाव दिया था. यही सुझाव तमिलनाडु के राजा भास्कर सेतुपति ने पहली बार उन्हें दिया था. इसी के बाद वे कन्याकुमारी हुंचे और समुद्र में तैरकर उस चट्टान तक पहुंचे जिसे आज विवेकानंद रॉक कहा जाताहै. कहते हैं कि यहा उन्होंने तीन दिन तक भारत के भूतकाल व भविष्य काल पर ध्यान किया. बता दें कि विवेकानंद के शिकागो जाने रहने व भोजन की व्यवस्था की जा सके इतने पैसे लोगों के पास नहीं थे. ऐसे में उनके शिष्यों ने सारे इंतजाम किए और धन जुटाए. लेकिन स्वामी जी ने सारा जमा किया गया धन गरीबों में बांट दिया.

बता दें कि शिकागो जाने का मन उन्हें एक सपने के बाद आया था, इस सपने में उन्हें उनके गुरू रामकृष्ण परमहंस समुद्र पार जाते दिखाई देते हैं और विवेकानंद को अपने पीछे आने का इशारा करते हैं. विवेकानंद इस सपने की सच्चाई को समझना चाहते थे, इस कारण उन्होंने माता शारदा से मार्गदर्शन माना जिसके बाद माता ने उन्हें इंतजार करने को कहा. तीन दिन के लंबे इंतेजार के बाद रामकृष्ण परमहंस गंगा पर चलते हुए और उसमें गायब होते दिखाई दिए. फिर विवेकानंद आए और उन्होंने उस पानी को दुनिया के उपर छिड़का जिसके बाद लोगों को ज्ञान की प्राप्ति हुई.

माता शारदा ने स्वामी विवेकानंद के गुरभाई से कहा कि वे उन्हें कहे कि वे विदेश जाएं, यह उनकी गुरु की इच्छा है. फिर क्या था अपने गुरु के प्रति समर्पण के कारण वे विदेश चले गए और विश्व धर्म सम्मेलन में जोरदार भाषण दिया और हिंदू सनातन धर्म के बारे में चर्चा करते हुए सभी धर्मों का सम्मान करना सीखाया. यहीं वे अन्य धर्मगुरुओं से अलग हो गएं, क्योंकि उन्होंने केवल हिंदू धर्म की ही बखान पर जोर नहीं दिया अपितु मानवतावादी विचार भी प्रस्तुत किया था.