नई दिल्ली. केंद्र में मोदी सरकार के दोबारा सत्ता में आने से पहले ही सरकारी तौर पर जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खात्मे का दावा किया जा रहा है. चुनावों के दौरान भी नेताओं के बयान में आतंकवाद और आतंकियों को जड़ से हटाने के दावे किए जाते रहे हैं. लेकिन गृह मंत्रालय के ताजा आंकड़े, सरकार के इन दावों की चिकोटी काटते नजर आते हैं. जी हां, जम्मू-कश्मीर पिछले 6 महीनों में 170 आतंकी हमले झेल चुका है, वहीं इन हमलों में सुरक्षाबलों के 69 जवान अपनी जान गंवा चुके हैं. ऐसे में आतंकवाद के खात्मे का सरकारी दावा कितना सच है, इस पर सवाल उठना लाजिमी है. पिछले साल के मुकाबले 2019 के पहले छह महीनों में ही आतंकवाद प्रभावित कश्मीर से आने वाले ये आंकड़े निश्चित तौर पर डरावने हैं. वर्ष 2018 में पूरे साल के दौरान कश्मीर में सुरक्षाबलों के 95 जवान शहीद हुए थे. लेकिन इस साल सिर्फ छह महीनों में ही ये आंकड़ा 69 तक जा पहुंचा है.

300 से ज्यादा आतंकी सक्रिय हैं कश्मीर में
हमारी सहयोगी वेबसाइट डीएनए की रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में सरहद पार से होने वाले आतंकी घुसपैठ की वजह से यह स्थिति बनी हुई है. खुफिया सूत्रों के मुताबिक वर्तमान में कश्मीर में 300 से ज्यादा आतंकवादी सक्रिय हैं. ऐसे में जबकि जुलाई के महीने में पवित्र अमरनाथ यात्रा शुरू होने वाली है, कश्मीर में आतंकियों की मौजूदगी इस यात्रा पर भी असर डाल सकती है. हालांकि आतंकियों के सफाये का अभियान बड़ी तेजी से चलाया जा रहा है. इसके नतीजे भी आए दिन देखने को मिल रहे हैं, लेकिन इसकी कीमत हमारे सुरक्षाबलों के जवानों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है. डीएनए की रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 में जून का महीना अब तक का सबसे खूनी-माह साबित हुआ है. गृह मंत्रालय की रिपोर्ट की मानें तो इस महीने के 18 दिनों में 17 आतंकी घटनाएं सामने आई हैं, जिसमें सुरक्षाबलों के 11 जवान शहीद हो चुके हैं. इस दौरान सुरक्षाबलों ने 16 आतंकियों को मार गिराया है, जिनमें पुलवामा हमले का मास्टरमाइंड और जैश-ए-मोहम्मद का आतंकी सज्जाद भट भी शामिल था.

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पहाड़ों पर बर्फ पिघलने के साथ बढ़ती है घुसपैठ
डीएनए की रिपोर्ट के अनुसार, हिमालय के बर्फीले पहाड़ पर गर्मी के मौसम में बर्फ पिघलती है. इस दौरान सरहद पार से भारतीय इलाके में घुसपैठ तेज हो जाती है. खुफिया सूत्र बताते हैं कि घने जंगलों और पहाड़ों के रास्ते ये विदेशी आतंकी कश्मीर के विभिन्न इलाकों में घुसपैठ करते हैं. यहां आने के बाद ये कश्मीरी नौजवानों को बरगलाते हैं और उन्हें आतंकवादी जत्थे में शामिल कर लेते हैं. इन्हीं नौजवानों को हथियार बनाकर कश्मीर में आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है. सुरक्षाबलों के मुताबिक अप्रैल के महीने में राज्य में 20 आतंकी घटनाएं हुईं. वहीं मई में इनकी संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़कर 41 हो गई. इन घटनाओं के पीछे सरहद पार से घुसपैठ करने वाले आतंकी ही शामिल थे.

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पुलवामा के बाद मार्च में हुए 33 आतंकी हमले
इस साल की सबसे सनसनीखेज और राजनीतिक रूप से चर्चित आतंकी घटना फरवरी में हुई थी, जब पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले को आत्मघाती बम धमाके का सामना करना पड़ा था. इस हमले में सुरक्षाबल के 44 जवान शहीद हो गए थे. आपको हैरानी होगी कि इसके ठीक एक महीने बाद मार्च में भी कश्मीर में आतंकी घटनाओं पर लगाम नहीं लग पाई. मार्च में पूरे राज्य में आतंकी हमलों से जुड़ी 33 घटनाएं हुई थीं. इस महीने में 22 आतंकवादियों को सुरक्षाबलों ने मौत के घाट उतार दिया था. वहीं, सुरक्षाबल के 6 अफसरों को अपनी जान गंवानी पड़ी, जबकि 22 गंभीर रूप से जख्मी हो गए थे. मार्च के ये आंकड़े आपको हैरान इसलिए करेंगे क्योंकि फरवरी में पुलवामा आतंकी हमले के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक जैसी कार्रवाई हुई. बावजूद इसके आतंकी घटनाएं थमी नहीं, बल्कि इसमें इजाफा ही हुआ.

जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बोले- आतंकी जंग हार गए हैं, इसलिए कर रहे हैं हमले

गवर्नर के भरोसे पर कैसे करें यकीन
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने बुधवार को कहा कि आतंकवादी सीमा पार बैठे अपने आकाओं को खुश करने के लिए सुरक्षा बलों पर हमले कर रहे हैं क्योंकि वे जंग हार चुके हैं. मलिक ने पाकिस्तान में बैठे आतंकवादियों के आकाओं का स्पष्ट हवाला देते हुए कहा, ‘‘ ये हमले यहां नए नहीं हैं, लेकिन हमने पिछले छह महीने से ज्यादा समय में इसे नियंत्रित किया है. मुझे 100 फीसदी यकीन है कि उनपर (आतंकवादियों पर) सीमा पार से कुछ करने का दबाव है.’’ उन्होंने यहां एक कार्यक्रम के इतर कहा, ‘‘ उन्हें (आतंकवादियों के आकाओं को) लगता है कि वे हार गए हैं, क्योंकि उन्होंने 10 साल में आतंकवाद का जो ढांचा खड़ा किया था उसे तबाह कर दिया गया है.’’

राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने बताया कि नए आतंकवादियों की भर्ती पूरी तरह से बंद हो गई है और जुमे (शुक्रवार दोपहर की) की नमाज़ के बाद होने वाला पथराव भी खत्म हो गया है. उन्होंने कहा, ‘‘लोगों को एहसास हो गया है कि उन्हें इस सबसे से कुछ हासिल नहीं होगा.’’ मलिक ने कहा कि आतंकवादी हथियार डाल कर मुख्यधारा में लौट रहे हैं. जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के ये दावे भले सही हों, लेकिन इन पर भरोसा करना मुश्किल होता है. क्योंकि एक तरफ सरकार और उसका प्रशासनिक अमला आतंकवाद के खात्मे का दावा करता है, वहीं गृह मंत्रालय की रिपोर्ट इसकी चिकोटी काटती है.