‘वक़्त’ एक ऐसा लफ़्ज़ जिसने अपने अंदर कई सदियों को पनाह दिया है. समंदर से भी गहरे इस लफ़्ज़ में पूरी क़ायनात सांस लेती हैं. ‘वक़्त’ के कई रंग होते हैं. कभी ख़ुशनुमा तो कभी ग़मग़ीन. वक़्त ने हम सब को अपने अंदर जकड़ा हुआ है. इस लफ़्ज़ पर जितना कुछ भी लिखा जाए या कहा जाए वो कम ही लगता है. अक्सर हम किसी ख़ास वक़्त को लफ़्ज़ों में बयां करने की कोशिश करते हैं मगर क़ामयाब नहीं हो पाते हैं. इसलिए हम आपके लिए लाए हैं वो शायरी जो ‘वक़्त’ की गहराई को बताने और समझाने में आपकी मदद करेगी. Also Read - रौशनी है किसी के होने से... पढ़िए 'रौशनी' पर कुछ चुनिंदा शायरी

यहां पढ़िए वक़्त पर 15 बेहतरीन शेर – Top 15 Waqt Shayari :

1.वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
आदत इस की भी आदमी सी है
गुलज़ार Also Read - Shayari in Hindi 2020: कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता... पढ़िए 'तन्हाई' पर 10 चुनिंदा शायरी 

2.सदा ऐश दौराँ दिखाता नहीं
गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं
मीर हसन Also Read - कहीं अबीर की ख़ुश्बू कहीं गुलाल का रंग... पढ़िए और भेजिए 'होली' पर ये चुनिंदा शायरी  

3.इक साल गया इक साल नया है आने को
पर वक़्त का अब भी होश नहीं दीवाने को
इब्न-ए-इंशा

4.अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना
हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है
बशीर बद्र

5.या वो थे ख़फ़ा हम से या हम हैं ख़फ़ा उन से
कल उन का ज़माना था आज अपना ज़माना है
जिगर मुरादाबादी

वक़्त शायरी – Shayari on Waqt in Hindi

6.उम्र भर मिलने नहीं देती हैं अब तो रंजिशें
वक़्त हम से रूठ जाने की अदा तक ले गया
फ़सीह अकमल

7.गुज़रने ही न दी वो रात मैं ने
घड़ी पर रख दिया था हाथ मैं ने
शहज़ाद अहमद

8.वक़्त बर्बाद करने वालों को
वक़्त बर्बाद कर के छोड़ेगा
दिवाकर राही

9.वो वक़्त का जहाज़ था करता लिहाज़ क्या
मैं दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गया
हफ़ीज़ मेरठी

10.रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए
इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है
अहमद मुश्ताक़

वक़्त पर हिंदी शायरी – Famous Sher on Waqt

11.सफ़र पीछे की जानिब है क़दम आगे है मेरा
मैं बूढ़ा होता जाता हूँ जवाँ होने की ख़ातिर
ज़फ़र इक़बाल

12.तुम चलो इस के साथ या न चलो
पाँव रुकते नहीं ज़माने के
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद

13.कोई ठहरता नहीं यूँ तो वक़्त के आगे
मगर वो ज़ख़्म कि जिस का निशाँ नहीं जाता
फ़र्रुख़ जाफ़री

14.हज़ारों साल सफ़र कर के फिर वहीं पहुँचे
बहुत ज़माना हुआ था हमें ज़मीं से चले
वहीद अख़्तर

15.पीरी में वलवले वो कहाँ हैं शबाब के
इक धूप थी कि साथ गई आफ़्ताब के
मुंशी ख़ुशवक़्त अली ख़ुर्शीद