नई दिल्ली. रोशनी के त्योहार दिवाली के मद्देनजर पटाखे जलने से होने वाले प्रदूषण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इस बार इको-फ्रेंडली दिवाली (Eco-friendly Diwali) मनाने की सलाह दी है. इसके तहत कोर्ट ने दिल्ली में पटाखे जलाने की समय-सीमा तय कर दी है. इस बार दीपावली में आप रात 8 बजे से 10 बजे तक ही पटाखे जला सकेंगे. कोर्ट ने यह भी सलाह दी है कि इस बार दिवाली में ग्रीन-क्रैकर्स यानी हरित-पटाखे (Green Cracker) जलाएं. सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि इको-फ्रेंडली दिवाली मनाने या ग्रीन-क्रैकर जलाने से दिल्ली में प्रदूषण कम होगा. राजधानी के वातावरण में पटाखों के जलने से पहुंचने वाली हानिकारक गैस की मात्रा कम होगी. लेकिन सवाल यह है कि लोग इको-फ्रेंडली दिवाली मनाने का मन बना भी लें, तो ग्रीन-क्रैकर है कहां? आइए जानते हैं जिन ग्रीन-क्रैकर्स की बदौलत इको-फ्रेंडली दिवाली मनाई जानी है, उनकी कहानी क्या है. Also Read - दिल्ली में कोरोना क्यों बना काल? केंद्र सरकार ने दिया जवाब- केजरीवाल सरकार की बताई गलती

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दिवाली के मौके पर हम अभी तक जो पटाखे जलाते आए हैं, उसमें बारूद भरा होता है. इन पटाखों को जलाने से हानिकारक गैस- नाइट्रस ऑक्साइड और सल्फर डाईऑक्साइड की बड़ी मात्रा निकलती है जो वातावरण को प्रदूषित करती है. वहीं, ग्रीन-क्रैकर इन पटाखों से बिल्कुल अलग है जो आम पटाखों की तरह रोशनी और आवाज तो देता है, लेकिन वातावरण में हानिकारक गैसों का प्रसार रोकता है. टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार की संस्था काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च यानी सीएसआईआर (CSIR) ने ग्रीन-क्रैकर का फॉर्मूला बनाया है. लेकिन अभी इस फॉर्मूले को सरकार की मंजूरी नहीं मिली है.

Fire-Crackers

सीएसआईआर की सहयोगी संस्था नेशनल इनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी नीरी (NEERI) ने इस फॉर्मूले को मंजूरी के लिए पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (PESO) को भेजा है. नीरी के डायरेक्टर राकेश कुमार ने अखबार को बताया कि एक बार PESO इस फॉर्मूले को मंजूरी दे देता है तो फिर इसके आधार पर ग्रीन-क्रैकर्स या ई-क्रैकर्स (electronic crackers) का उत्पादन शुरू कर दिया जाएगा. नीरी की वैज्ञानिक साधना रायलू ने अखबार को बताया कि आम पटाखों से अलग ग्रीन-क्रैकर जलने के बाद वातावरण में पानी के कण यानी water molecules छोड़ता है जो हवा में पहले से मौजूद धूलकणों के साथ फैलने के बजाए उसे बैठा देता है. इसलिए आम पटाखे जहां हवा में प्रदूषण बढ़ाते हैं, वहीं ग्रीन क्रैकर प्रदूषण-रोधी पटाखा है.

पटाखों पर क्यों पड़ी नजर

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिए अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर पर्यावरण प्रदूषण के खतरों के प्रति लोगों को आगाह किया है. यही वजह है कि कोर्ट ने दिवाली में पटाखे जलाने की समय-सीमा तय की है और पटाखों का इस्तेमाल कम करने का आदेश दिया है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रपट के अनुसार देश के महानगरों- दिल्ली, चेन्नई, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरू में प्रदूषण का स्तर इतना भयावह स्थिति में पहुंच गया है कि इस पर समय रहते कार्रवाई न की गई तो लोगों का जीना मुहाल हो जाएगा. पिछले साल इन सभी महानगरों में दिवाली के दौरान प्रदूषण की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच गई थी. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले साल दीपावली के समय राजधानी दिल्ली की हवा सबसे ज्यादा प्रदूषित पाई गई थी. यही वजह है कि इस बार दीपावली से पहले ही कोर्ट ने दिल्ली में पटाखे जलाने को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

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दूसरे देशों को भी पटाखों से ‘बैर’

पटाखे जलाने से होने वाले प्रदूषण की समस्या इतनी गंभीर है कि सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई अन्य देशों ने भी इसको लेकर सख्त नियम-कायदे बना रखे हैं. एक रोचक बात यह है कि अपने देश के विभिन्न राज्यों में दिवाली या अन्य पर्व-त्योहारों के मौके पर बड़ी तादाद में चाइनीज-माल यानी चीन में बने सामान की खपत होती है. दिवाली में ही लें, तो लगभग हर शहर में वैध या अवैध- दोनों तरीकों से चाइनीज पटाखों की बिक्री होती है. देश में बने पटाखों की तुलना में चीन से आए पटाखे सस्ते भी होते हैं और आवाज पैदा करने या रोशनी फैलाने में भारी भी पड़ते हैं. लेकिन खुद चीन में पटाखे जलाने पर पाबंदी है. टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार चीन की राजधानी बीजिंग समेत 500 से ज्यादा शहरों में पटाखे जलाने पर रोक है. इसको लेकर वहां का कानून काफी सख्त है. नीदरलैंड में सिर्फ नए साल की पूर्व संध्या के अवसर पर ही पटाखे जलाने की छूट है. इसमें भी नियम है कि पटाखे वही जला सकता है जो प्रोफेशनल यानी इसके लिए पूरी तरह से प्रशिक्षित है.

सिंगापुर में प्रशासन की इजाजत लिए बगैर आप पटाखे नहीं जला सकते हैं. अलबत्ता, चीनी नववर्ष के मौके पर जरूर पटाखे जलाने की छूट दी जाती है. यूरोपीय देश जर्मनी में भी पटाखे जलाने को लेकर सख्त कानून है. जर्मनी में 28 दिसंबर से 31 दिसंबर तक ही बड़े पटाखे खरीदने या बेचने की अनुमति मिलती है, वह भी 18 साल से ऊपर की आयु के लोग ही पटाखे खरीद सकते हैं. 31 दिसंबर और 1 जनवरी के मौके पर ही पटाखे जलाए जा सकते हैं. ब्रिटेन में रात 11 बजे से सुबह 7 बजे तक किसी भी तरह के पटाखे जलाने पर रोक है. हां, नए साल, दिवाली और चाइनीज नववर्ष के मौके पर जरूर छूट मिलती है. गैरकानूनी तरीके से पटाखे जलाने पर 5 हजार पौंड स्टर्लिंग (ब्रिटिश मुद्रा) या 6 महीने तक की जेल की सजा हो सकती है. इसी तरह ऑस्ट्रेलिया में भी पटाखे खरीदने, बेचने या जलाने के लिए लाइसेंस लेना होता है. देश में कहीं भी पटाखे जलाने से पहले प्रशासनिक अनुमति लेनी पड़ती है.

Sivkasi

आदेश लागू होने में लगेंगे 3 साल

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही इस दिवाली से पटाखे जलाने पर रोक या समय-सीमा तय करने का आदेश दे दिया है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इस फैसले पर अमल करने में कम से कम 3 साल लग जाएंगे. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक देश में पटाखों का सबसे ज्यादा उत्पादन तमिलनाडु के शिवकाशी में होता है. शिवकाशी के पटाखा व्यापारियों का कहना है कि इस बार की दीपावली के लिए 80 फीसदी से ज्यादा के स्टॉक की डिलीवरी हो चुकी है. यानी, देशभर में जहां-जहां पटाखे पहुंचाए जाने थे, पहुंच चुके हैं. तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड एमोर्सेस मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के एक सदस्य ने अखबार को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सरकार अगर इस संबंध में कोई नियम भी बनाती है तो इस पर अमल करने में कम से कम 3 साल लग जाएंगे. दरअसल, देश में जहां-जहां भी पटाखे बनते हैं, उसके मुकाबले अकेले शिवकाशी में ही पटाखा निर्माताओं की तादाद इतनी बड़ी है कि इस इंडस्ट्री को जल्दी समेटना मुश्किल है. शिवकाशी में पटाखा बनाने वाली 1070 छोटी और बड़ी इंडस्ट्री है, जिसमें सीधे तौर पर 3 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला हुआ है. वहीं, इस इंडस्ट्री से अप्रत्यक्ष तौर पर 5 लाख से ज्यादा लोग रोजगार के लिए जुड़े हुए हैं. इस संख्या को देखते हुए एसोसिएशन के सदस्य का यह अनुमान कि 3 साल से कम में पटाखों पर पाबंदी लागू नहीं हो पाएगी, गलत नहीं है.