चीनी बेल्ट एंड रोड कार्यक्रम में पाकिस्तान को भागीदार बनाने का फैसला और चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) की घोषणा चीन के लिए एक फायदेमंद सौदा था. ऐसे समय में जब पाकिस्तान अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए संघर्ष कर रहा था, उसका इस प्रकार से चीनी जाल में फंसना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी. जब हम चीन- पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (China–Pakistan Economic Corridor) की बात करते हैं तो उसमें छिपा हुआ चीन का कुटिल मकसद जाहिर हो जाता है. जब चीनी प्रधानमंत्री शी चिनपिंग ने पाकिस्तान की यात्रा के दौरान चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के निर्माण की घोषणा की थी, वह कुछ दूरदर्शी विचारों को मन में लेकर चल रहे थे. इसमें चीन का फायदा था और पाकिस्तान का सिर्फ नुकसान… आइये जानते हैं इस आर्थिक गलियारा बनाने के पीछे क्या है ड्रैगन (चीन) का मकसद…Also Read - #BSF Raising Day: स्थापना दिवस पर पाकिस्तानी सिपाहियों को मिठाई बाटेंगे जवान, पीएम मोदी ने दी बधाई

1. चीन लंबे समय से हिंद महासागर-मलक्का जलडमरूमध्य मार्ग पर पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए अरब सागर के माध्यम से एक वैकल्पिक व्यापार मार्ग विकसित करना चाहता था. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC)के रूप में उसे एक ऐसा मार्ग मिला जो न सिर्फ उसकी परिवहन लागत को काम करता, बल्कि हिन्द महासागर और दक्षिणी चीन सागर में भारत, अमेरिका और अन्य देशों की नौसेना की मौजूदगी के चलते चीनी बड़े के लिए एक अत्यधिक सुरक्षित विकल्प साबित होता. Also Read - भारत की GDP की ग्रोथ रेट 2021-22 में डबल डिजिट में रहने की उम्मीदः मुख्य आर्थिक सलाहकार

2. चीन की सबसे बड़ी समस्या है- श्रम की कमी. पिछले चार दशकों से चली आ रही ‘एक संतान की नीति’ ने आज चीन में उपलब्ध मानव संसाधनों की उपलब्धता को बहुत हद तक प्रभावित किया है. चूकि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी चरम पर थी, इसलिए चीन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और गरीबी का फायदा उठाकर इसे अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहता था. इसके चलते उसने सस्ते पाकिस्तानी श्रम के साथ चीनी पूंजी और उत्पादन क्षमता का ‘कुटिल मिश्रण’ तैयार किया जो हर तरफ से चीन के लिए फायदे का सौदा था. चूंकि पाकिस्तान के हुक्मरान चीन के आगे नाचने को मजबूर थे, इसलिए चीन के इस कदम का विरोध करने वाला कोई नहीं था. Also Read - करतारपुर में गुरुद्वारा दरबार साहिब में मॉडल के फोटोशूट का मामला पाक से लेकर भारत तक गर्माया

3. तीसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि चीन की नजर व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यूरोपियन बाजारों तक थी. यही कारण था कि चीन ने अपने महत्वकांक्षी बेल्ट एंड रोड कार्यक्रम की शुरुआत की. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा इस कार्यक्रम का एक अभिन्न अंग बन सकता था जो पाकिस्तान में बने कम लागत के चीनी सामान को सस्ते परिवहन के जरिये समूचे यूरोप तक पहुंचा सकता था. यह हर तरफ से चीन के लिए फायदेमंद था.

4. चौथा, चूंकि चीन अपने शिनजियांग प्रान्त में उइगर मुसलमानों के विद्रोह का सामना कर रहा था, इसलिए इस बात की सबसे अधिक आशंका थी कि पाकिस्तान में मौजूद कट्टर तत्व उइगर मुसलमानों को हथियार, प्रशिक्षण और अन्य तरह की मदद दे सकते थे. चूंकि पूर्व में पाकिस्तान ऐसे ही कामों के लिए जाना जाता रहा है. चीन के लिए ये एक खतरा बन सकता था. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के माध्यम से चीन ने पाकिस्तान की सरकार और अतिवादी तत्वों को अपने पक्ष में किया और इस तरह से पूरी दुनिया का ध्यान उइगर समस्या से हटाने में सफल हुआ.

5. पांचवां, चीन अरब सागर में अपनी सैन्य उपस्थिति चाहता था. हालांकि जिबूती में उसने पहले से ही एक बड़ा नौसेनिक अड्डा बनाया हुआ है, लेकिन यह अलग-थलग है. यह नौसैन्य अड्डा भूमि मार्ग से चीन से जुड़ा नहीं है. इसका रखरखाव भी वायु मार्ग अथवा समुद्री रास्ते से किया जाता है जो कि काफी खर्चीला है. अगर भविष्य में भारत या कोई अन्य देश हिन्द महासागर में आर्थिक नाकेबंदी करता है तो चीन के लिए बड़ी समस्याएं खड़ी हो जाएंगी. इस स्थिति में पाकिस्तान में एक वैकल्पिक सैन्य अड्डा चीन के लिए हर हालत में फायदेमंद है. एक ऐसा सुरक्षित सैन्य अड्डा जो चीन को बिना किसी अतिरिक्त लागत के मिल रहा है.

6. छठी बात, चूंकि CPEC पश्चिमी चीन से जुड़ा है. चीन इस माध्यम से अपने पश्चिमी क्षेत्र जो कि आज के समय में पूरी तरह विकसित नहीं है, को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी. चीन इस इलाके के संसाधनों का अच्छी तरह से दोहन कर पायेगा और उन्हें आर्थिक गलियारे के माध्यम से विश्व के बाकि बाजारों तक पहुंचाने में सक्षम भी हो पायेगा.

मालूम हो कि CPEC की घोषणा हुए 7 साल से अधिक समय हो चुका है. इस कॉरिडोर के बनने का शुरुआती बजट 62 अरब अमेरिकी डॉलर था, जो ‘येरूशलेम पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक बढ़कर 87 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया है. इस परियोजना को 15 वर्षों में पूरा होना था पर आज साढ़े 7 वर्षो या आधे समय के बावजूद भी एक चौथाई से कम काम पूरा हो पाया है. कुछ बड़ी परियोजनाएं तो आज तक शुरू ही नहीं हो पाईं हैं.

जो परियोजनाएं लंबित पड़ी हैं उनकी लागत दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और पाक सरकार की दमनकारी नीतियों से क्षुब्ध होकर सिंधी और बलोच स्वतंत्रता सेनानी लगातार हमले करके समस्या को और बढ़ा रहे हैं. इसमें भी दिलचस्प बात यह है कि केवल एक चौथाई काम के लिए चीन ने 60 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का ऋण अभी तक पाकिस्तान सरकार को भुगतान कर दिया है, जिसका ब्याज चुकाने के लिए वह संघर्ष कर रहा है. पाकिस्तान का समूचा तंत्र सेना द्वारा नियंत्रित होता है. यहां तक कि देश का प्रधानमंत्री कौन होगा यह भी सेना के जनरल ही तय करते हैं. ऐसे समय में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के सारे अधिकारी सेना के सेवानिवृत्त जनरल ही हैं और इसलिए किसी की कोई जवाबदेही नहीं है.

आज पाकिस्तान में कोई भी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में चल रहे भ्रष्टाचार, लागत में बढ़ोतरी, परियोजनाओं में देरी और कार्यक्रम की विफलता के ऊपर प्रश्न नहीं उठा सकता. जिस-जिसने आवाज उठाने की कोशिश की वो पाकिस्तानी गुप्तचर संस्थाओं के द्वारा मारा गया. पाकिस्तान का भविष्य पूर्णतया अंधकार से भरा हुआ है. एक ऐसा देश जिसका कुल ऋण उसके सकल घरेलू उत्पाद का हो गया है और अर्थव्यवस्था डूबने की कगार पर खड़ी है, पाकिस्तान के सेना द्वारा नियंत्रित शासक, अकल्पनीय और अत्यधिक बढ़ी दरों पर चीन से कर्ज लेने को विवश हैं. ऐसे देश में जहां भुखमरी चरम पर हो, ऐसा रवैया वाकई आत्मघाती साबित होगा…


(अमित बंसल रक्षा मामलों के जानकार हैं. अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े विषयों पर उनकी गहरी रुचि है. वह लेखक, ब्लॉगर और कवि भी हैं.)

इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक की निजी राय है.