नई दिल्ली: 2014 के लोकसभा चुनाव में मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) को पूरे देश में बीजेपी और कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन पार्टी लोकसभा की एक भी सीट नहीं जीत पाई थी. 2014 का लोकसभा चुनाव ऐतिहासिक था. अकेले यूपी में बीजेपी को 42.63 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 71 सीटें मिलीं. मायावती की बीएसपी को यूपी में 19.77 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई. वहीं समाजवादी पार्टी ने 5 सीटें जीती थीं और उसे 22.35 प्रतिशत वोट मिले थे. पांच साल बाद समीकरण बदल गए हैं. 2014 में अलग-अलग चुनाव लड़ी सपा और बसपा अब गठबंधन कर चुकी हैं. दोनों ही पार्टियां 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही हैं. Also Read - सत्ता में रहते हुए भारत की तकदीर और तस्वीर बदलना ही BJP का लक्ष्य: जेपी नड्डा

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अगर पिछले लोकसभा चुनाव को अपवाद मान लिया जाए तो सपा और बसपा की ताकत 2014 में मिली सीटों से कहीं ज्यादा है. 2009 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को 23 सीटों के साथ 23 प्रतिशत वोट मिले, वहीं बीएसपी को 20 सीटों के साथ 27.42 प्रतिशत वोट मिले थे. 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियां 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं. बीएसपी के सामने 0 से आगे बढ़ने की चुनौती है वहीं सपा के सामने अपनी 5 सीटों को डबल डिजिट में पहुंचाने की चुनौती. बीएसपी भले ही 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं रही, लेकिन वह 33 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी. वहीं 5 सीटें जीतने वाली एसपी 31 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी.

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2014 के लोकसभा चुनाव से पहले यानी 2009 के चुनाव पर एक नजर डालें तो एसपी को 23 सीटें और एसपी को 20 सीटें मिली थीं. यानी दोनों पार्टियों ने 43 सीटों पर जीत हासिल की थी. अब दोनों पार्टियां साथ चुनाव लड़ रही हैं. राजनीति में भविष्यवाणी करना किसी खतरे से खाली नहीं है फिर भी ये अनुमान है कि इस बार दोनों पार्टियां 2009 के लोकसभा चुनाव से अच्छा प्रदर्शन करेंगीं. हालांकि यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि दोनों पार्टियां अपना वोट एक दूसरे को ट्रांसफर करा पाती हैं कि नहीं.

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38 सीटों पर चुनाव लड़ रही बीएसपी ने उन सीटों की पहचान कर ली है जहां दलित-मुस्लिम वोटर्स की संख्या ज्यादा है और यादव के कुछ वोट ट्रांसफर होने के बाद जीत सुनिश्चित है.  इतनी ही सीटों पर चुनाव लड़ रही सपा उन सीटों पर जोर दे रही है जहां यादव और मुस्लिम वोटर्स की संख्या अच्छी खासी है और दलितों के वोट ट्रांसफर होने के बाद जीत मिल सकती है. 15 साल मायावती खुद चुनाव मैदान में उतर रही हैं. इसका असर आसपास की सीटों पर पड़ेगा. मायावती अकबरपुर से चुनाव लड़ सकती हैं. वह दो बार यहां से जीत चुकी हैं.

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उत्तर प्रदेश में हुए गोरखपुर, फूलपुर और कैरान लोकसभा उपचुनावों के नतीजों से एसपी-बीएसपी गठबंधन का हौसला बुलंद है. गठबंधन के सामने 0+5 को 50 से आगे ले जाने की चुनौती है. राजनीति में हमेशा 2+2=4 नहीं होता. इसलिए 0 सीटें लाने वाली बीएसपी और मात्र 5 सीटें जीतने वाली सपा को बीजेपी हल्के में लेने की भूल नहीं करेगी. खासकर उस समय जब दोनों ही पार्टियां अपनी 25 साल की दुश्मनी को बीजेपी को हराने के लिए भुला चुकी हैं.