नई दिल्ली. कामयाबी किसे अच्छी नहीं लगती. लेकिन जब पता चले कि उस कामयाबी की कहानी कई अड़चनों, तमाम मुश्किलों और लोगों के भरोसे के टूट जाने के बाद लिखी गई हो तो बात ही क्या. एशियन गेम्स 2018 में विपरीत हालातों का रुख मोड़ते हुए अपने हौसले से ऐसी ही कामयाबी की उड़ान भरी है भारतीय एथलीट मंजीत सिंह चहल ने. ये नाम कल तक गुमनामी के अंधेरे में था लेकिन आज देश का सितारा बन चुका है. मंजीत सिंह ने 18वें एशियन गेम्स में पुरुषों की 800 मीटर की रेस में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता है. मंजीत ने इस रेस में स्वर्णिम इतिहास रचने के लिए 1:46:15 सेकेंड का वक्त निकाला, जो कि नया नेशनल रिकॉर्ड भी है. एथलेटिक्स के इस इवेंट में भारत ने आखिरी बार एशियाई खेलों में सोना 1982 में जीता था. Also Read - भारत की स्टार धावक दुती चंद अब दौड़ना चाहती हैं राजनीति के गलियारों में

मंजीत के लिए सहारा बना ‘सोने का तमगा’ Also Read - IOA ने की शर्मनाक गलती, चेक पर लिखे खिलाड़ियों के गलत नाम

इंटरनेशनल मंच पर एशियन गेम्स में जीता सोने का तमगा मंजीत सिंह के करियर का पहला बड़ा मेडल है. इससे पहले उनके नाम खेलों में कोई बड़ी उपल्बधि दर्ज नहीं थी. खेलों में नाकामी उसका साया बन चुकी थी और इसी साए की वजह से उन्हें अपनी नौकरी तक गंवानी पड़ी थी. अपने दर्द को बयां करते हुए मंजीत सिंह कहते हैं, ” दो साल पहले की बात है. तब मेरी उम्र 27 साल थी. 31 मार्च का दिन था जब ONGC ने मेरा स्पोर्ट कॉन्ट्रेक्ट रेन्यू करने से मना कर दिया. उनका तर्क था कि मैंने खेलों में कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की है और अब ऐसा करने की मेरी उम्र भी नहीं रही. ” उन्होंने कहा, “लोगों का भरोसा मुझसे उठ चुका था, जिस वजह से मैं अंदर से टूट गया था और मैंने खेल को अलविदा कहने तक का मन बना लिया था.” Also Read - मेडल जीतने वाली पहलवान दिव्या काकरन ने भरी सभा में सीएम अरविंद केजरीवाल को सुनाई खरी-खरी

आर्मी कोच के भरोसे ने बनाया चैैम्पियन

इस बुरे हालात में मंजीत सिंह को साथ मिला इंडियन आर्मी के चीफ कोच अमरीश कुमार का. दुनिया मंजीत को डिगा हुआ मानने लगी थी लेकिन आर्मी के कोच अमरीश को उनकी काबिलियत पर पूरा भरोसा था. और, वो कहते हैं न जहां काबिलियत होगी वहां कामयाबी को तो आना ही पड़ेगा. बस यहीं से शुरू हो गया मंजीत सिंह के गोल्डन दौड़ का सफर.

जन्म के बाद से बेटे से नहीं मिले

काबिल मंजीत को एशियन गेम्स में कामयाबी को गले लगाने के लिए जो पहली चीज करनी पड़ी वो थी त्याग. मंजीत ने ये त्याग अपने बच्चे को लेकर किया. एक पिता के लिए उसका संतान ही सबकुछ होता है लेकिन मंजीत पर एशियन गेम्स में सोना जीतकर खुद को साबित करने का ऐसा भूत सवार हुआ कि उन्होंने अपने बच्चे को जन्म के बाद से सामने से देखा तक नहीं. मंजीत के बच्चे का जन्म इसी साल 6 मार्च को हुआ था.

मेहनत से इंडोनेशिया में बिखेरा रंग

दरअसल, मंजीत का सारा फोकस एशियन गेम्स में सोने के तमगे पर टिका था. मंजीत ने अपने कोच अमरीश कुमार की देख रेख में डेढ़ साल तक ऊंटी में कड़ा अभ्यास किया. इसके बाद एशियन गेम्स से पहले तीन महीने तक उन्होंने भूटान में भी कड़ी मेहनत की. मंजीत के इस त्याग और मेहनत ने इंडोनेशियाई धरती पर रंग दिखाया और वो भारत के लिए सोने का तमगा जीतने में कामयाब रहे.

बेटे को पहली बार देखने को बेताब मंजीत

मंजीत कहते हैं, ” उन्होंने कर दिखाया. अब उनकी तमन्ना जल्दी से जल्दी अपने बेटे अबीर चहल से मिलने की है. वो उसे अपना जीता हुआ गोल्ड मेडल दिखाना चाहते है, ताकि वो भी ये समझे कि उसके पिता ने क्या हासिल किया है.” एक खिलाड़ी के तौर पर तो एशियन गेम्स के गोल्ड मेडल ने मंजीत सिंह की जिंदगी संवार दी. उम्मीद है इसके बूते अब उनकी निजी जिंदगी से बेरोजगारी भी जल्दी ही दूर हो जाएगी.