नाथन लियोन की वह गेंद ऑफ स्टंप के बाहर गिरी और पुजारा ने उसे स्पिन के विरुद्ध खेलते हुए सीमा रेखा के बाहर पहुंचा दिया. टेस्ट क्रिकेट का यह 17वां शतक उनके लिए खुशी से ज्यादा राहत देने वाली थी. कारण यह कि टीम इंडिया के पिछले ऑस्ट्रेलिया दौरे पर उनके बल्ले से उम्मीद के मुताबिक रन नहीं निकले थे. एक आशंका यह भी थी कि मौजूदा सीरीज में अच्छा प्रदर्शन नहीं करने पर उन्हें टेस्ट टीम से बाहर भी होना पड़ सकता है. लेकिन पहले एडीलेड और फिर मेलबर्न में उनकी शतकीय पारियों ने इन शंकाओं को दूर कर दिया.

अब थोड़ा पीछे चलते हैं. साल 2010. भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच सीरीज का दूसरा टेस्ट मैच बेंगलुरू में खेला जा रहा था. चौथी पारी में टीम इंडिया को जीत के लिए 207 रनों की जरूरत थी, लेकिन चिन्नास्वामी स्टेडियम की पिच अपना रंग बदलने लगी थी. भारतीय टीम की समस्या यह थी कि बैटिंग लाइनअप की ‘द वॉल’ कहे जाने वाले राहुल द्रविड़ अच्छी फॉर्म में नहीं थे और पहली पारी में एक रन बनाकर आउट हो गए थे. दूसरी पारी में भी टीम की शुरुआत अच्छी नहीं रही और वीरेंद्र सहवाग केवल सात रन बनाकर पवेलियन लौट गए. दर्शकों की निगाहें भारतीय ड्रेसिंग रूम की ओर टिकी थीं और वे राहुल द्रविड़ के मैदान पर उतरने की उम्मीद कर रहे थे. लेकिन द्रविड़ की जगह बैटिंग करने आया एक 22 वर्षीय बल्लेबाज जो अपना पहला टेस्ट मैच खेल रहा था. घरेलू क्रिकेट में रनों का अंबार लगाने के बावजूद एक्सपर्ट उसे ज्यादा तवज्जो नहीं देते थे क्योंकि वह सौराष्ट्र के लिए रणजी ट्रॉफी खेलता था जिसकी पिच बल्लेबाजों के लिए अनुकूल मानी जाती है.

पुजारा आए और 89 गेंदों में 72 रनों की ऐसी पारी खेल गए जिसने भारत की जीत सुनिश्चित कर दी. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में यह उनकी पहली पारी थी जिससे उन्हें पहचान मिली. उनकी सुघड़ तकनीक, धैर्य और लंबी पारी खेलने की क्षमता देखते हुए उन्हें जल्द ही भारतीय क्रिकेट में द्रविड़ का विकल्प माना जाने लगा. द्रविड़ के संन्यास लेने के बाद टीम इंडिया की बैटिंग लाइनअप में नंबर तीन पर बल्लेबाजी की जिम्मेदारी उनको मिली.

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पुजारा अपनी भूमिका में खासे सफल भी रहे. 2010 में डेब्यू करने के बाद वे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भी रनों का अंबार लगाने लगे. फिर आया साल 2014. भारतीय टीम दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर गई और पुजारा उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए. ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के खिलाफ उनका प्रदर्शन बेहद खराब रहा. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ तीन मैचों में वे 201 और इंग्लैंड के खिलाफ तीन मैचों में 222 रन ही बना पाए.

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इन दौरों के बाद सबसे ज्यादा अंगुलियां पुजारा पर ही उठी थीं, क्योंकि उम्मीद थी कि भारतीय बल्लेबाजों के लिए चुनौतीपूर्ण मानी जाने वाली विदेशी पिचों पर वह टीम की बैटिंग ऑर्डर को मजबूती देंगे. लेकिन इस विफलता ने टीम में उनके स्थान पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए. इसके बाद उन्हें कुछेक मुकाबलों में टीम से बाहर भी किया गया, लेकिन उन्होंने घरेलू क्रिकेट में लंबी पारियां खेल भारतीय टीम में दमदार वापसी की. फिर भी, ऑस्ट्रेलिया में असफलता का दाग उनके करियर पर चस्पां था.

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इसे धोने का मौका उन्हें चार साल बाद मिला और अब तक वे इसमें काफी हद तक सफल रहे हैं. तीन टेस्ट मैचों की पांच पारियों में वे 328 रन बना चुके हैं जो दोनों टीमों में सबसे ज्यादा है. दुनिया की सबसे मजबूत मानी जाने वाली ऑस्ट्रेलिया की बॉलिंग अटैक उन पर कोई असर नहीं छोड़ पाई है. पर्थ की उछाल भरी पिच हो या एडीलेड की स्विंगिंग पिच या फिर मेलबर्न की स्लो पिच, हर जगह उनका बल्ला जमकर बोला है. लेकिन पुजारा अब भी जानते हैं कि भारत इस सीरीज में जीत का दावेदार है. यदि जीत नहीं मिली तो बल्लेबाजों पर फिर सवाल उठेंगे और वो चाहकर भी इससे अलग नहीं रह पाएंगे. यानी पुजारा ने अपने पुराने दाग तो धो लिए हैं, लेकिन उनके लिए चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं.