नई दिल्ली. आज 29 अगस्त है यानी हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का जन्मदिन. 113 साल पहले आज ही के दिन 1905 में दद्दा यानी ध्यानचंद का जन्म हुआ था. इस दिन को राष्ट्रीय खेल दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है. हर साल इसी दिन खेल में शानदार प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियों को सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न के अलावा अर्जुन अवार्ड और द्रोणाचार्य अवार्ड दिए जाते हैं. इस बार जकार्ता में जारी एशियन गेम्स की वजह से खेल रत्न और अर्जुन अवॉर्ड समारोह के आयोजन की तारीख में बदलाव किया गया है. ये समारोह अब सितंबर में होगा. Also Read - राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों की प्रक्रिया में हुई देरी, जानिए पूरी डिटेल

जब ‘डॉन’ से मिले ‘जादूगर’ Also Read - बुलंदी पर विराट कोहली के सितारे, नए साल में ध्वस्त करेंगे तेंदुलकर, पोंटिंग और ब्रैडमैन के 5 अजेय रिकॉर्ड!

हॉकी का इतिहास ध्यानचंद की उपलब्धियों से भरा पड़ा है. इसमें 1928 एम्सटर्डम, 1932 लॉस एंजेलिस और 1936 बर्लिन ओलंपिक में अपनी स्टीक के बूते भारत को स्वर्ण पदक दिलाने का कमाल शामिल है. लेकिन, एक ऐसा वाक्या जिससे शायद बहुत से लोग अंजान हैं वो है क्रिकेट के डॉन और हॉकी के जादूगर की पहली मुलाकात. Also Read - एडिलेड में तिहरा शतक जड़ ब्रैडमेन से आगे निकले डेविड वार्नर

ब्रैडमैन ने ध्यानचंद के लिए कही ये बात

साल 1935 में महान बल्लेबाज सर डॉन ब्रैडमैन हॉकी के धुरंधर ध्यानचंद से पहली बार मिले और इस मुलाकात पर उन्होंने ध्यानचंद से जो कहा वो वाकई में बड़ी बात थी. ब्रैडमैन ने ध्यानचंद से कहा, ” आप गोल ऐसे दागते हैं जैसे क्रिकेट में रन बना रहे हों.”

बर्लिन ओलंपिक में जर्मनी को चटाई धूल

ये तो हुई क्रिकेट और हॉकी के ग्रेट की मिलन की बात. हॉकी फील्ड पर ध्यानचंद से जुड़ा सबसे मजेदार एक वाक्या बर्लिन ओलंपिक के फाइनल मुकाबले का है, भारत की टक्कर जर्मनी से थी. इस मुकाबले को देखने के लिए हिटलर भी स्टेडियम में मौजूद था. मुकाबले में हाफ टाइम तर भारत 1 गोल से आगे था. इसके बाद दूसरे हाफ में ध्यानचंद ने जिस अंदाज में हॉकी खेली वो देखने लायक रही. उन्होंने अपने स्पाइक वाले जूते उतारकर खाली पांव ही जर्मन गोलपोस्ट पर धावा बोल दिया. भारत ने जर्मनी के खिलाफ इस मैच को 8-1 के अंतर से जीता जिसमें ध्यानचंद ने अकेले 3 गोल दागे.

हिटलर को कहा ना

कहा जाता है कि इस शानदार प्रदर्शन से खुश होकर हिटलर ने उन्हें खाने पर बुलाया और उनसे जर्मनी की ओर से खेलने को कहा. इसके बदले उन्हें मजबूत जर्मन सेना में कर्नल पद का प्रलोभन भी दिया. लेकिन ध्यानचंद ने कहा, ‘हिंदुस्तान मेरा वतन है और मैं वहां खुश हूं.’