FIFA वर्ल्ड कप में बदल गई पूरी फुटबॉल- सेंसर वाली स्मार्ट बॉल के एरोडायनामिक्स भी बदले, सिलाई का जमाना भी गया
इस बार फीफा वर्ल्ड कप में इस्तेमाल हो रही एडिडास ट्रायोंडा बॉल हर मायने में खास है. इस बॉल में स्मार्ट सेंसर लगा है, जिसका रियलटाइम डाटा मैच अधिकारियों को तुरंत मिल रहा है. इसके अलावा अब यह बॉल सिर्फ 4 पीस में बनी है, जबकि पहले फुटबॉल 32 पीस में बना करती थी.
एडिडास ट्रायोंडा बॉल के एरोडायनामिक्स भी बदले @Pelé Soccer/Instagram
पहली बार 3 देशों में खेला जा रहा फीफा वर्ल्ड कप 2026 हाई टेक अंदाज में खेला आयोजित हो रहा है. यहां एआई कैमरों और बॉल में लगे सेंसर ने खेल जगत में नई क्रांति ला दी है. इस बार एडिडास द्वारा तैयार की गई फुटबॉल सिर्फ सेंसर के लिए ही चर्चा में नहीं है. इस बॉल में बाहर से लेकर अंदर तक कई बदलाव आ चुके हैं, जिसने फुटबॉल को एक नया अंदाज दे दिया है. इन बदलाव के चलते गेंद की चाल में भी कुछ अंतर आए हैं.
हैवी किक लगने पर भी ज्यादा दूर नहीं जाती ट्रायोंडा
बॉल पर हुई नई रिसर्च बताती है कि ट्रायोंडा फुटबॉल पारंपरिक फुटबॉल के मुकाबले कड़ाके की किक लगने के बावजूद ज्यादा दूर नहीं जाती. इस बॉल के एयरोडायनामिक्स बदल गए हैं. FIFA वर्ल्ड कप की नई बॉल एडिडास ट्रायोंडा पर रिचर्स यूनिवर्सिटी ऑफ पुगेट साउंड ने खास रिसर्च की है.फिजिक्स के प्रोफेसर जॉन एरिक गॉफ ने द कन्वरसेशन में लिखे एक लेख में इस नई बॉल में आए बदलाव पर विस्तार से बताया है.
सिर्फ 4 टुकड़ों से बनी है ट्रायोंडा बॉल
इस बॉल में इस बार सिर्फ 4 पैनल ही रह गए है. पहले पारंपरिक फुटबॉल में 32 पैनल या टुकड़े लगाए जाते थे, जिन्हें सिलाई से जोड़ा जाता था और यह तभी गोल रह पाती थी. समय के साथ-साथ ये पहले 22 हुए, फिर 12 से 14 तक पहुंचे और अब 4 पैनल तक रह गए हैं. अब बॉल की सीम या पैनल कम होने से गेंद हवा में जब होती है तो उस पर हवा का खास प्रभाव नहीं पड़ता. हवा में इसकी स्थिरता बनी रहती है. अब गेंद के टुकड़ों या पैनल को सिलाई से सिलाई इतनी बारीक की जाती है कि वह बाहर से दिखती भी नहीं है.
हवा के साथ अलग तालमेल
रिसर्चर्स ने 'एरोडायनामिक ड्रैग क्राइसिस' का विश्लेषण किया. यह एक ऐसी घटना है जो तब होती है जब एक खास स्पीड पर पहुंचने पर हवा का रेजिस्टेंस अचानक बदल जाता है. ट्रायोंडा के साथ मिले नतीजों की तुलना पिछली वर्ल्ड कप बॉल्स- अल रिहला (2022), टेलस्टार 18 (2018), ब्राज़ुका (2014) और जाबुलानी (2010)- से तुलना करने पर की गई.
पूर्व वर्ल्ड कप की तुलना में अलग है इस बॉल के एरोडायनामिक्स
रिसर्चर्स गॉफ और उनकी टीम ने अपने एक्सपेरिमेंट में पाया कि ट्रायोंडा करीब 43 किलोमीटर प्रति घंटे (km/h) की स्पीड पर एरोडायनामिक ड्रैग के क्रिटिकल पॉइंट तक पहुंच जाती है. यह आंकड़ा एडिडास की अल रिहला, टेलस्टार 18 और ब्राज़ुका के लिए रिकॉर्ड की गई 50 से 65 km/h की रेंज, और जाबुलानी की 79 से 97 km/h की रेंज से कम है. इसका मतलब हुआ कि यह बॉल खिलाड़ी की जोरदार किक खाने के बावजूद उतनी फासला तय नहीं कर पाती, जितना पहले की बॉल कर लेती थीं. यह हवा में स्थिरता बनाए रखती है.
क्या ट्रायोंडा बढ़ाएगी खेल का रोमांच!
इसका मतलब है ट्रायोंडा बॉल 'जाबुलानी' की तुलना में, कॉर्नर किक या फ्री किक जैसे कम दूरी के जोरदार शॉट्स में हवा के बहाव को ज़्यादा एकसमान रूप से धीमा करती है. नतीजतन, इस तरह के शॉट्स में बॉल ज्यादा स्थिर रहेगी और उसमें अप्रत्याशित हरकतें कम होंगी. वहीं यह बॉल तेज रफ्तार पर, अपनी रेंज खो देगी. इसका मतलब है कि, उदाहरण के लिए, मिडफील्ड तक पहुंचने वाली गोल किक में, बॉल उम्मीद से कुछ मीटर पहले ही नीचे गिर सकती है.
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