नई दिल्ली. फीफा अंडर-17 वर्ल्ड कप के लिए भारतीय टीम में चुने गए जैकसन सिंह इतिहास रच दिया है. भारत के लिए एक मात्र गोल जैक्सन सिंह ने 82वें मिनट में दागा. लेकिन इस मैच में भारत को कोलंबिया के हाथों हार का सामना करना पड़ा.  इस मैच में भारत की तरफ से शानदार प्रदर्शन करने वाले जैकसन सिंह का नाम आज सभी की जुबान पर है. लेकिन जैकसन सिंह के यह राह इनती आसान नहीं थी.  उनका फुटबॉलर बनने का सफर बेहद संघर्ष भरा रहा है. इस मैच के जैकसन सिंह एक गोल ने इस बात की तरफ इशारा किया कि भारतीय टीम एक आने वाले समय के शानदार प्रदर्शन कर सकती है. Also Read - फुटबॉल क्लब चेल्सी ने मैनेजर फ्रैंक लैम्पार्ड को बर्खास्त किया, थॉमस टुचेल संभालेंगे पद

जैकसन सिंहः जिनको फुटबॉलर बनाने के लिए मां बेचती थी सब्जी Also Read - रोनाल्डो बने 'प्लेयर ऑफ द सेंचुरी' तो गर्लफ्रेंड ने करा लिया बिकिनी शूट, 140 करोड़ के प्राइवेट यॉट पर की मस्ती

जैकसन सिंह के लिए यह राह इनती आसन नहीं थी. कहते हैं अगर कुछ करने की ठान लो तो इंसान अपनी मंजिल तक पहुंच जाता है. जैक्सन सिंह के पिता की नौकरी जाने के बाद परिवार का गुजारा मां ने सब्जी बेचकर किया लेकिन इतने कठिन हालात में भी जैकसन सिंह का फुटबाल को लेकर जुनून कम नहीं हुआ. Also Read - जब फुटबॉल वाला केक काटने से Diego Maradona ने किया था इनकार, IM विजयन ने यूं किया याद

भारत की 21 सदस्यीय टीम के सदस्य जैकसन मणिपुर के थोउबल जिले के हाओखा ममांग गांव के हैं. उनके पिता कोंथुआजम देबेन सिंह को 2015 में पक्षाघात हुआ और उन्हें मणिपुर पुलिस की अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी. उनके परिवार का खर्च मां इम्फाल के ख्वैरामबंद बाजार में सब्जी बेचकर चलाती है जो घर से 25 किलोमीटर दूर है.

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जैकसन ने कहा, जब मैं 2010 में घर से चंडीगढ आया तब सब कुछ ठीक था. लेकिन मेरे पिता को 2015 में पक्षाघात आया और अब वह आजीविका कमाने की स्थिति में नहीं है. मेरी मां और नानी इम्फाल में सब्जी बेचती है और इसी से हमारा घर चलता है. उसने कहा, मैं बचपन से भारत के लिये खेलने का सपना देखता आया हूं और मेरी जिंदगी बदल गई है.

जैकसन के बड़े भाई जोनिचंद सिंह कोलकाता प्रीमियर लीग में पीयरलेस क्लब के लिये खेलते हैं लेकिन उनकी आय से परिवार की दशा में ज्यादा सुधार नहीं आया है. जैकसन को खराब माली हालात के अलावा 2015 में चयनकर्ताओं की उपेक्षा भी झेलनी पड़ी जब वह चंडीगढ में अकादमी में थे. इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अंडर 17 विश्व कप के लिये टीम में जगह बनाई.

भाषा इनपुट