नई दिल्ली: ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वनडे सीरीज शुरू होने से पहले भारतीय टीम मैनेजमेंट ने स्पष्ट कहा था कि इस साल होने वाले वर्ल्ड कप के लिए यह सीरीज महत्वपूर्ण है. वर्ल्ड कप के लिए टीम इंडिया का फर्स्ट च्वॉइस विकेटकीपर कौन होगा, इसको लेकर तमाम तरह की चर्चाएं हो रही थीं. इसकी बड़ी वजह यह थी कि महेंद्र सिंह धोनी का बैटिंग फॉर्म अच्छा नहीं था. कुछ एक्सपर्ट तो यह तक कहने लगे थे कि बढ़ती उम्र को देखते हुए टीम मैनेजमेंट को रिषभ पंत जैसे युवा खिलाड़ी को जगह देनी चाहिए. धोनी को लेकर चर्चाएं इसलिए भी ज्यादा थीं क्योंकि टेस्ट मैच से संन्यास लेने के चलते उनके पास मैच प्रैक्टिस की भी कमी थी. कहा तो यह भी जाने लगा था कि भारतीय क्रिकेट के सबसे मशहूर फिनिशर का करियर अब फिनिश हो चुका है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वनडे सीरीज के तीन मैचों में लगातार हाफ सेंचुरी लगाकर धोनी ने बता दिया कि वे अभी चूके नहीं हैं. इतना ही नहीं, तीनों मुकाबलों में फिनिशर की भूमिका निभा कर उन्होंने साबित कर दिया कि उनके रहते टीम को दूसरे मैच फिनिशर की जरूरत नहीं है.

हालांकि, इसमें भी कोई संदेह नहीं कि साल 2018 धोनी के लिए बेहद खराब रहा था. 2018 में धोनी ने 20 वनडे मैच खेले. इनमें उन्‍होंने 25 की औसत और 71.42 की स्‍ट्राइक रेट से कुल 275 रन बनाए. बैटिंग एवरेज और स्‍ट्राइक रेट के नजरिए से 2004 में अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण के बाद से धोनी के लिए 2018 सबसे खराब रहा था. उन पर दबाव इसलिए भी था क्योंकि इस सीरीज से पहले 23 पारियों में उनके बल्ले से केवल एक हाफ सेंचुरी निकली थी. रन और स्ट्राइक रेट से ज्यादा उनकी बल्लेबाजी पर उम्र का असर दिखने लगा था.

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इस सीरीज में भी यह कमी दिखी. पहले मैच में भले धोनी ने 51 रनों की पारी खेली थी, लेकिन इसके लिए उन्हें 96 गेंदें खेलनी पड़ी थी. इस मैच में टीम इंडिया की जीत के लिए कई लोगों ने उन्हें ही जिम्मेदार बताया, लेकिन जैसे-जैसे सीरीज आगे बढ़ती गई, धोनी अपने रंग में आने लगे. दूसरे वनडे मैच में टीम इंडिया 299 रनों के मुश्किल लक्ष्य का पीछा कर रही थी और विराट कोहली की सेंचुरी के बाद भी टीम की जीत तय नहीं लग रही थी. लेकिन धोनी अंत तक टिके रहे और दिनेश कार्तिक के साथ टीम को मैच जिताकर ही पवेलियन लौटे.

हालांकि, धोनी की बल्लेबाजी का असली जलवा तीसरे वनडे में दिखा जब टीम इंडिया का टॉप ऑर्डर कुछ खास योगदान नहीं दे पाया. रोहित शर्मा, शिखर धवन और विराट कोहली ज्यादा रन नहीं बना पाए तो धोनी ने जाधव के साथ मोर्चा संभाला और ऐसी शानदार पारी खेली कि अपनी ही सरजमीं पर ऑस्ट्रेलियाई टीम हार स्वीकार करने को मजबूर हुई.

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इस मैच में उनकी बल्लेबाजी में हर वो चीज दिखी जिसके लिए वो जाने जाते हैं. दबाव के बीच एक-एक, दो-दो रन लेकर स्कोर को आगे बढ़ाना, अपने साथी बल्लेबाज को टिके रहने के लिए प्रेरित करना, अच्दी गेंदों को इज्जत देना और खराब गेंदों पर जोरदार प्रहार करना. धोनी की बैटिंग तकनीक कभी क्लासिकल नहीं रही, वे अपरंपरागत स्ट्रोक्स खेलते हैं और यही उनकी बल्लेबाजी की खासियत है. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ इन तीन मैचों में अपने प्रदर्शन से उन्होंने टीम में अपने स्थान को लेकर सारी शंकाएं तो दूर की ही, वर्ल्ड कप के लिए टीम इंडिया की एक बड़ी पहेली भी सुलझा दी. टीम को अब अपने फर्स्ट च्वॉइस विकेटकीपर बैट्समैन के लिए दूसरे नामों पर विचार करने की कोई जरूरत नहीं. अच्छी बात यह भी है कि टीम जब चाहे मिड्ल ऑर्डर या फिनिशर के रूप में भी उनका इस्तेमाल कर सकती है.