नई दिल्ली: राहुल द्रविड़ का मानना है कि युवाओं के खुद को खास समझने का कारण सिर्फ रातोंरात मिली शोहरत या पैसा नहीं है. शुरुआती सालों में माता-पिता की ओर से जरूरत से ज्यादा मिलने वाली तवज्जो भी नुकसानदेह है. द्रविड़ ने हाल ही में एक टीवी शो पर महिला विरोधी बयान देने वाले क्रिकेटर हार्दिक पांड्या और केएल राहुल को लेकर उठे विवाद के बाद क्रिकेट की वेबसाइट ईएसपीएन क्रिकइन्फो से यह बात कही है. उन्‍होंने कहा कि राहुल और पांड्या यदि इससे सीख लेकर अपनी क्षमताओें के अनुरूप कामयाबी हासिल कर सके तो वे अब भी युवाओं के लिए रोल मॉडल हो सकते हैं.

द्रविड़ ने पांड्या और राहुल के खिलाफ लगे प्रतिबंध को हटाने के फैसले को भी सही बताया. उन्‍होंने कहा कि ओवर रिएक्‍शन से बचना चाहिए. गलतियां पहले भी हुई हैं और भविष्‍य में भी होंगी. ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण यह है कि खिलाड़ी को इससे सीख लेनी चाहिए. द्रविड़ ने यह भी कहा कि राहुल और पांड्या अब भी युवाओं के लिए रोल मॉडल हो सकते हैं. द्रविड़ ने बताया कि अलग-अलग टीमों में रहते हुए वे इन दोनों खिलाडि़यों के कोचिंग दे चुके हैं. वे अब तक अपनी क्षमता के अनुरूप सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं. संभव है कि यह घटना ही उनके जीवन में कैटेलिस्‍ट बन जाए. इससे सीख लेकर वे यदि कामयाब रहते हैं तो निश्चित रूप से युवाओं के लिए रोल मॉडल हो सकते हैं.

खिलाडि़यों के व्‍यवहार के बारे में पूछे जाने पर द्रविड़ ने इस बात से इनकार किया कि मोटी कमाई से खिलाड़ियों का चरित्र प्रभावित हो जाता है. उन्होंने कहा, ‘‘मैं इसे पैसे से जोड़ना सही नहीं मानता. पैसा मिलने से ऐसा हो सकता है लेकिन यह अकेला कारण नहीं है. यह कम उम्र में भी हो सकता है. कई बार कम आय वाले परिवारों में अगर कोई बच्चा क्रिकेट में टैलेंटेड दिखता है तो परिवार की पूरी ऊर्जा उसी पर लग जाती है.’’

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उन्होंने कहा, ‘‘उस एक इंसान के लिए हर कोई कुर्बानी देने लगता है तो वह खुद को खास समझने लगता है. यह काफी कम उम्र से शुरू हो जाता है और बच्चों को लगने लगता है कि मैं खास हूं और सब कुछ मेरे लिए ही है.’’ उन्होंने कहा, ‘‘खिलाड़ी गरीब हो या अमीर, अगर वह ऐसा महसूस करने लगे तो समस्या होती है. हम कई बार उसका सामना करते हैं. एनसीए में कई कोचों ने मुझे कहा है कि कई बार सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज और बल्लेबाज सबसे खराब फील्डर होते हैं या उनकी विकेटों के बीच दौड़ खराब होती है.’’

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द्रविड़ ने कहा कि खिलाड़ियों को संवारने में कोचों और माता-पिता की अहम भूमिका होती है. उन्होंने कहा, ‘‘अगर खिलाड़ी से उम्र छिपाने के लिए कहा जाता है तो वह गलत है. आप उसे बेईमानी सिखा रहे हैं. छोटे बच्चों के सामने यह सही मिसाल नहीं है. माता-पिता का कोचों पर बरसना या कोच या अंपायर को गलत ठहराना भी सही नहीं है क्योंकि बच्चे को लगता है कि यही सही है.’’

 

इनपुट: एजेंसी