रांची। क्रिकेट के कैप्टन कूल रहे महेंद्र सिंह धोनी के आलीशान बंगले के बगल से एक संकरी सी गली जाती है रांची की हरमू रोड आवासीय कालोनी के बी टाइप क्वॉर्टर की ओर जहां मास्को ओलंपिक के गोल्ड मेडल विजेता हॉकी टीम के सदस्य रहे सिल्वानस डुंगडुग रहते हैं और बड़े दुख की बात है कि क्रिकेट की चकाचौंध में उनके ओलंपिक गोल्ड की चमक लोग भूल गए हैं.Also Read - IPL 2022 की नीलामी में पहला रिटेंशन कार्ड MS Dhoni के लिए इस्तेमाल किया जाएगा: CSK

मास्को में 1980 में स्पेन के खिलाफ ओलंपिक हॉकी फाइनल में गोल्डन गोल करने वाले डुंगडुंग पिछले 24 साल से यहां रह रहे हैं. उनके घर के बाहर लगी तख्ती पर उनके नाम के साथ लिखा है ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता सूबेदार मेजर मानद कैप्टन सिल्वेनस डुंगडुंग लेकिन इसके बावजूद खेलप्रेमियों से पूछो कि झारखंड किसके लिए मशहूर है तो जवाब एक ही होगा महेंद्र सिंह धोनी. डुंगडुंग और मनोहर टोप्नो समेत इस प्रदेश ने 10 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय पुरुष और महिला हॉकी स्टार दिए हैं. Also Read - IPL 2021: Aakash Chopra ने चुनी सीजन की 'फ्लॉप XI', Bhuvneshwar Kumar समेत 5 भारतीय खिलाड़ियों को चुना

डुंगडुंग को हालांकि क्रिकेट से कोई गिला नहीं है. उन्होंने कहा, ‘युवा पीढ़ी को गौरवशाली इतिहास की कम ही जानकारी है और वे क्रिकेट के दीवाने हैं. यही वजह है कि धोनी को सब जानते हैं लेकिन मेरे बारे में बहुत कम को पता होगा. मुझे अब और दुख नहीं होता क्योकि मैं इस फख्र के साथ मर सकूंगा कि मैने ओलंपिक में गोल्ड जीता था.’ Also Read - T20 World Cup 2021: Virat Kohli ने तोड़ी चुप्पी, MS Dhoni के 'मेंटर' बनने पर कही ये बात

मास्को ओलंपिक के बाद अंतरराष्ट्रीय हॉकी को अलविदा कहने वाले डुंगडुंग 1988 में सेना की नौकरी से सेवानिवृत होने के बाद 1993 में यहां आ बसे. गुमनामी के अपने अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि कई बार उन्हें बताना पड़ता है कि उन्होंने देश के लिए ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता है. यही नहीं 70 पार की उम्र में 30000 रुपये महीने की नौकरी करते हुए अब उन्हें भविष्य की चिंता सताने लगी है.

उन्होंने कहा, ‘मैंने 2004 से 2013 तक झारखंड की लड़कियों की टीम को कोचिंग दी. इसके बाद झारखंड राज्य खेल कोऑर्डिनेटर का काम मिला हालांकि मन अब भी मैदान में ही रमता है. दफ्तर का काम रास नहीं आता लेकिन नौकरी है करनी तो पडे़गी वरना ये 30000 रुपये महीना तनख्वाह कहां से मिलेगी. यह नहीं मिलेगी तो काम कैसे चलेगा.’

इस वेतन के अलावा उन्हें केंद्रीय खेल मंत्रालय से ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता के तौर पर 10000 रुपये मासिक भत्ता मिलता है. क्रिकेट की तरह हॉकी में अभी पूर्व खिलाड़ियों के लिए पेंशन की कोई योजना नहीं है. इतने साल बाद पिछले साल मेजर ध्यानचंद पुरस्कार पाने वाले डुंगडुंग ने कहा, ‘पूर्व खिलाड़ियों के लिए पेंशन का इंतजाम जरूर होना चाहिए. हमारी कोई जमा पूंजी तो है नहीं. जिंदगी खेल को देने के बाद बाकी समय मुफलिसी में ही कटता है.’