महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में भारतीय क्रिकेट टीम ने साल 2007 में टी-20 विश्व कप अपने नाम किया था. इस
टीम में टीम इंडिया के ओपनर रॉबिन उथप्पा भी शामिल थे. उथप्पा एक आक्रामक ओपनर के तौर पर अपनी पहचान बना रहे थे. हालांकि बाद में प्रदर्शन में निरंतरता की कमी के कारण उन्होंने अपना स्थान गंवा दिया. उथप्पा आज भी अपने एक फैसले को लेकर काफी चिंतित रहते हैं. Also Read - अगस्त-सितंबर में टीम इंडिया का कैंप लगाने के बारे में सोच रही है बीसीसीआई

दरअसल, उथप्पा को लगता है कि 25 साल की उम्र में टेस्ट क्रिकेट में खेलने की महत्वाकांक्षा के कारण उन्होंने अपनी बल्लेबाजी तकनीकी में बदलाव करने की गलती की थी. Also Read - फ्लॉप XI में मनोज तिवारी का नाम देख भड़की पत्नी सुष्मिता

2015 में अंतिम बार खेला इंटरनेशनल क्रिकेट  Also Read - Global day of parents पर सचिन तेंदुलकर की सलाह- इस मुश्किल समय में माता-पिता का ध्यान रखें

34 साल के इस भारतीय खिलाड़ी ने अपना आखिरी इंटरनेशनल मैच 2015 में जिम्बाब्वे के खिलाफ खेला था. उन्हें अपनी आक्रामक बल्लेबाजी के लिए जाना जाता है.

उन्होंने आईपीएल फ्रेंचाइजी राजस्थान रॉल्स के पोडकास्ट सत्र के दौरान कहा, ‘मेरा सबसे बड़ा लक्ष्य भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेलना था. अगर मैं 20-21 की उम्र में ऐसी कोशिश करता तो टेस्ट क्रिकेट खेल लिया होता. मैं अपने करियर के आखिर में पछताना नहीं चाहता था और अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ करना चाहता था.’

उथप्पा ने प्रवीण आमरे की सेवाएं ली और अपनी तकनीकी में कुछ बदलाव किया लेकिन इससे उनकी नैसर्गिक लय खो गई.

प्रवीण आमरे की देखरेख में की बल्लेबाजी तकनीक में बदलाव

बकौल उथप्पा, ‘इसलिए मैंने 25 साल की उम्र में प्रवीण आमरे की देखरेख में अपनी बल्लेबाजी तकनीक में बदलाव करने का फैसला किया जो तकनीकी तौर पर पहले से बेहतर बल्लेबाज हो और लंबे समय तक क्रीज पर टिककर खेल सके. इस प्रक्रिया में मैंने अपनी बल्लेबाजी की आक्रामकता खो दी.’

उथप्पा ने भारत की तरफ से 46 वनडे और 13 टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले हैं.

उन्होंने कहा, ‘मैं सोचता था कि भारत की तरफ से टेस्ट क्रिकेट खेलने के लिए मुझे अपनी तकनीकी बदलनी होगी. मुझे लगता है कि मैंने 25 साल की गलत उम्र में ऐसा करने की कोशिश की.’